हाल ही में एक स्टिंग ऑपरेशन ने बैंकों द्वारा काले धन को सफेद करने संबंधी खबर दिखाकर एक बार फिर देश की वित्तीय सेवा व्यवस्था की कमियों को उजागर किया है। इस स्टिंग ने उस आसान तरीके का खुलासा किया, जिसमें बैंक अपने बीमा उत्पादों की आड़ में नकद काला धन ले सकते हैं, जो बीमा की परिपक्वता अवधि पूरी होने पर वैध हो जाता है।
व्यवस्था में इस तरह की गड़बड़ियां इसलिए हैं, क्योंकि वित्तीय सेवा प्रदान करने वाली विभिन्न इकाइयों के केवाईसी (नो योअर कस्टमर या अपने ग्राहक को जानें) कायदे अलग-अलग हैं। बैंक एक तरह के केवाईसी चाहता है, जबकि म्यूचुअल फंड अलग तरह के। जीवन बीमा के लिए इस बजट तक बहुत आसान किस्म का केवाईसी नियम था, जो एक कमजोर कड़ी थी।
एक तरफ तो सरकार समावेशी विकास और वित्तीय समावेशन की बात करती है, दूसरी तरफ वह छोटे निवेशकों को वित्तीय व्यवस्था का हिस्सा बनने की प्रक्रिया को काफी कठिन बनाती है। केवाईसी पर जिस तरह जोर दिया जाता है, उससे तो लोग बचत और निवेश के प्रति हतोत्साहित ही होते हैं। यह प्रक्रिया इतनी थकाऊ एवं समय खपाने वाली होती है कि निश्चित रूप से इच्छुक व्यक्ति भी अपने इरादे बदल लेगा।
उदाहरण के लिए, एक अति समृद्ध व्यक्ति के लिए कई तरह की कागजी खानापूरी करके केवाईसी का अनुपालन करना आसान होता है, जबकि एक गरीब व्यक्ति द्वारा, जो वाकई बचत एवं निवेश के प्रति इच्छुक है, अपनी पहचान को प्रमाणित करना मुश्किल हो जाता है और इस प्रक्रिया में वह वित्तीय समावेशन से बाहर रह जाता है।
मसलन, केवाईसी के अनुपालन के लिए जरूरी कागजात को ही लीजिए, तो इसके लिए आवासीय प्रमाणपत्र एवं पैन कार्ड या आयकर रिटर्न भरने संबंधी कागजात जरूरी हैं। लेकिन जब आप बैंक में खाता खुलवाने, म्यूचुअल फंड में निवेश करने या जीवन बीमा खरीदने जाते हैं, तो आपसे अलग-अलग तरह के कागजात की मांग की जाती है।
मसलन, एक म्युचुअल फंड कंपनी या वितरक पैन कार्ड पर जोर देते हैं, जो जरूरी नहीं है। जबकि एक जीवन बीमा कंपनी के लिए उम्र प्रमाण पत्र एवं आवासीय प्रमाणपत्र पर्याप्त हैं। केवाईसी की इसी ढिलाई का कई लोग दुरुपयोग करते हैं, जिसका दावा स्टिंग ऑपरेशन में किया गया है। हालांकि वित्त मंत्री ने इस बार के बजट भाषण में यह कहकर इस कमी को दूर कर दिया है कि बीमा केवाईसी को बैंकों के खाते से जोड़ा जाएगा।
स्टिंग ऑपरेशन में जिस तत्परता से बैंक अपने बीमा उत्पाद को काले धन को सफेद करने के लिए बेचते नजर आए, वह वित्त मंत्रालय के लिए चिंता का विषय होना चाहिए, खासकर तब, जब बैंकों को उनके केवाईसी के साथ काले धन को सफेद करने वालों को बीमा बेचने के लिए विश्वसनीय माना जा सकता है।
म्यूचुअल फंड में तो 20 हजार रुपये तक नकद लेन-देन की अनुमति है, जबकि जीवन बीमा में उसके विपरीत 50 हजार रुपये तक प्रीमियम के तौर पर नकद दिया जा सकता है और इससे ज्यादा की रकम पैन कार्ड को प्रमाण के तौर पर पेश करके नकद जमा की जा सकती है।
वर्ष 2005 में सरकार ने शून्य जमा वाले खाते की पेशकश की थी, जिसमें केवाईसी के कड़े मानदंडों को दूर कर दिया गया था। बाद में इन खातों को बुनियादी बैंक खाते में तब्दील कर दिया गया और बिना कोई अतिरिक्त शुल्क वसूले खाताधारकों को एटीएम-डेविट कार्ड मुहैया कराया गया।
इन खातों का मूल आधार था कि इसमें 50 हजार रुपये से ज्यादा की राशि एक साथ नहीं होगी और पूरे वित्तीय वर्ष में एक लाख रुपये से ज्यादा का लेन-देन नहीं होगा। ये खाते वैसे लोगों के लिए वरदान थे, जिनका कोई बैंक खाता नहीं था और जिन्हें लोकप्रिय कल्याणकारी योजना मनरेगा से भुगतान मिलना था।
इसलिए केवाईसी मानदंडों का मानकीकरण निवेशक, विनियामक एवं वित्त मंत्रालय, सबके लिए बेहतर होगा। एक समान केवाईसी से छोटे बचतकर्ता एवं निवेशकों को वित्तीय व्यवस्था में शामिल करना आसान हो जाएगा। इससे यह भी सुनिश्चित किया जा सकेगा कि जिन वित्तीय उत्पादों की उन्हें बेहद जरूरत है, वे उन्हें मिलेंगे।
सरकार और नियामक संस्थाओं को भी यह समझने की जरूरत है कि एक वित्त वर्ष में 50 हजार रुपये से कम का निवेश एवं बचत करने वालों के लिए केवाईसी मानडंदों में ढिलाई से एक व्यापक बदलाव आएगा। जो निवेशक इस राशि से नीचे निवेश या बचत करते हैं, वे जान-बूझकर या गंभीर रूप से कर-चोरी नहीं कर सकते।
लेकिन इसी के साथ बड़ी मछलियों द्वारा कर चोरी की सूचना मिलते ही कड़ा रुख भी अपनाना होगा। मसलन, बीमा कंपनी या बैंक को अगर यह आशंका होती है कि कोई बड़ी मछली बैंक खाते में व्यवस्थागत खामियों का फायदा उठाकर कर चोरी कर रही है, तो उसे एक साथ कई बीमा पॉलिसियां खरीदने या नियमित लेन-देन करने वाले शख्स के बारे में नियामक संस्था को सूचित करना चाहिए।
संभावित काले धन एवं उसके स्रोत का पता लगाने के लिए सरकार द्वारा गठित वित्तीय खुफिया इकाई एवं खुफिया निकायों की भूमिका कठोर होनी चाहिए। बैंकों के रास्ते काले धन का पता लगाने का बेहतर तरीका यही है कि लोगों को आसान तरीके से व्यवस्था का अंग बनने के लिए प्रेरित किया जाए। इससे वित्तीय समावेशन का लक्ष्य भी पूरा होगा और यह भी सुनिश्चित होगा कि बड़ी मछलियां व्यवस्थागत कमियों का फायदा नहीं उठा सके।