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अपने बुनियादी लक्ष्य की ओर भाजपा : राज्यसभा में बहुमत हासिल करने की जल्दबाजी में है

नीरजा चौधरी Published by: नीरजा चौधरी Updated Thu, 01 Aug 2019 02:01 AM IST
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संसद - फोटो : a

अपने दूसरे कार्यकाल में भाजपा ने अब तक जो भी कदम उठाया है, उससे पता चलता है कि वह राज्यसभा में बहुमत हासिल करने की जल्दबाजी में है। पांच विफल प्रयासों के बाद आखिरकार बीएस येदियुरप्पा कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस सरकार को हटाने में सफल रहे और राज्य की सत्ता संभाल ली है।

भाजपा अन्य दलों के विधायकों को सामूहिक रूप से या व्यक्तिगत रूप से अपनी पार्टी से अलग कर रही है, जैसा कि गोवा में हुआ, जहां कांग्रेस के 15 में से दस विधायक (दो तिहाई हिस्सा) भाजपा में मिल गए, जिसे दलबदल विरोधी कानून अनुमति देता है। तृणमूल कांग्रेस, तेलुगू देशम पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के कुछ विधायक भी भाजपा के खेमे में आ गए हैं, जहां वे अपना भविष्य देखते हैं।



यहां तक कि समाजवादी पार्टी के नीरज शेखर और कांग्रेस के संजय सिंह जैसे राज्यसभा के मौजूदा सांसदों ने भी अपनी पार्टी और उच्च सदन से इस्तीफा दे दिया है। जाहिर है, वे उपचुनाव में भाजपा के टिकट पर राज्यसभा के लिए चुनाव लड़ेंगे और भाजपा की संख्या बढ़ाएंगे। सामान्य तौर पर, भाजपा नवंबर 2020 तक उच्च सदन में बहुमत हासिल करने की उम्मीद कर रही थी।

सूचना का अधिकार कानून में संशोधन या उसे कमजोर करने और तीन तलाक को अपराध बनाने संबंधी जो दो विवादास्पद विधेयक इस सप्ताह पारित हुए हैं, वे दर्शाते हैं कि औपचारिक रूप से बहुमत हासिल किए बिना ही भाजपा ने राज्यसभा में गणित साध लिया है। टीआरएस, बीजद, अन्नाद्रमुक, वाईएसआर कांग्रेस जैसी तथाकथित असंबद्ध पार्टियों  ने भाजपा के पक्ष में मतदान किया। नीतीश कुमार की जदयू ने प्रकट तौर पर अपनी आपत्ति जताने के लिए सदन का वॉकआउट किया, लेकिन व्यावहारिक उद्देश्य से वे भाजपा की मदद कर रहे थे।

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संसद - फोटो : a
अपने दूसरे कार्यकाल में भाजपा ने अब तक जो भी कदम उठाया है, उससे पता चलता है कि वह राज्यसभा में बहुमत हासिल करने की जल्दबाजी में है। पांच विफल प्रयासों के बाद आखिरकार बीएस येदियुरप्पा कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस सरकार को हटाने में सफल रहे और राज्य की सत्ता संभाल ली है।

भाजपा अन्य दलों के विधायकों को सामूहिक रूप से या व्यक्तिगत रूप से अपनी पार्टी से अलग कर रही है, जैसा कि गोवा में हुआ, जहां कांग्रेस के 15 में से दस विधायक (दो तिहाई हिस्सा) भाजपा में मिल गए, जिसे दलबदल विरोधी कानून अनुमति देता है। तृणमूल कांग्रेस, तेलुगू देशम पार्टी और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के कुछ विधायक भी भाजपा के खेमे में आ गए हैं, जहां वे अपना भविष्य देखते हैं।

यहां तक कि समाजवादी पार्टी के नीरज शेखर और कांग्रेस के संजय सिंह जैसे राज्यसभा के मौजूदा सांसदों ने भी अपनी पार्टी और उच्च सदन से इस्तीफा दे दिया है। जाहिर है, वे उपचुनाव में भाजपा के टिकट पर राज्यसभा के लिए चुनाव लड़ेंगे और भाजपा की संख्या बढ़ाएंगे। सामान्य तौर पर, भाजपा नवंबर 2020 तक उच्च सदन में बहुमत हासिल करने की उम्मीद कर रही थी।

सूचना का अधिकार कानून में संशोधन या उसे कमजोर करने और तीन तलाक को अपराध बनाने संबंधी जो दो विवादास्पद विधेयक इस सप्ताह पारित हुए हैं, वे दर्शाते हैं कि औपचारिक रूप से बहुमत हासिल किए बिना ही भाजपा ने राज्यसभा में गणित साध लिया है। टीआरएस, बीजद, अन्नाद्रमुक, वाईएसआर कांग्रेस जैसी तथाकथित असंबद्ध पार्टियों  ने भाजपा के पक्ष में मतदान किया। नीतीश कुमार की जदयू ने प्रकट तौर पर अपनी आपत्ति जताने के लिए सदन का वॉकआउट किया, लेकिन व्यावहारिक उद्देश्य से वे भाजपा की मदद कर रहे थे।

ऐसा नहीं था कि सिर्फ इन्हीं पार्टियों ने मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) कानून के मामले में भाजपा की मदद की, जिसने तत्काल तीन तलाक को अपराध बना दिया, बल्कि कांग्रेस, राकांपा, सपा, बसपा, पीडीपी, तेदेपा और द्रमुक के कुल 23 सांसद (जिनमें शरद पवार और  प्रफुल्ल पटेल जैसे वरिष्ठ नेता भी थे) सदन से अनुपस्थित थे, इस कारण सदन में बहुमत का आंकड़ा गिर गया। भाजपा ने इस तरह सदन का प्रबंधन किया था। विपक्षी खेमे के लिए यह शर्मनाक था कि संख्या होने के बावजूद उन्होंने भाजपा को जीतने दिया।

अपने पचास दिनों के कार्यकाल में मोदी-2 ने दिखाया है कि विपक्ष बंटा हुआ है। क्षेत्रीय दल केंद्र सरकार के पक्ष में रहना चाहते हैं। वे अपने सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों के लिए धन चाहते हैं, जिसके आधार पर उनमें से कुछ सत्ता में आए हैं, जैसे तेलंगाना में। उन्हें डर है कि खिलाफ में जाने पर सरकार प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई, आयकर अधिकारियों को उनके कुछ नेताओं के पीछे परेशान करने के लिए लगा सकती है।

माना जाता है कि प्रधानमंत्री ने व्यक्तिगत रूप से फोन करके के.चंद्रशेखर राव और नवीन पटनायक से समर्थन मांगा। टीआरएस ने भी भाजपा सरकार की मदद की, हालांकि उसका असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी के साथ गठबंधन है, जो बिल का विरोध कर रही थी।

पार्टी अध्यक्ष के पद से राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद पिछले दो महीने से ज्यादा समय से कांग्रेस का कोई मुखिया नहीं है, यह दर्शाता है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी के भीतर अव्यवस्था जारी है। लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व संकट ने विपक्ष के अन्य दलों के मनोबल को प्रभावित किया है, विपक्षी खेमे में से कोई भी सदन के समन्वय की जिम्मेदारी लेने वाला नहीं था, जो भाजपा का रास्ता रोक सकता था।

मोदी-2 ने अपना आत्मविश्वास और आक्रामकता दिखाई है। दूसरे कार्यकाल के पहले सात हफ्तों में भाजपा को कोई काम करने से रोक नहीं पाया है। यह मोदी-1 से अलग है। एक अंतर इसकी कार्यशैली में है। मोदी-1 के पहले महीने में अरुण जेटली मंत्रिमंडल गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे और प्रधानमंत्री को दिल्ली दरबार से परिचित करवा रहे थे। लेकिन आज अमित शाह ही हैं, जो सरकार चला रहे हैं और उनका प्रभाव गृह मंत्रालय से बाहर भी है।

शीर्ष नौकरशाहों की नियुक्तियों में भी उनका हाथ होता है। प्रधानमंत्री फ्रेंड-फिलॉस्फर-गाइड की भूमिका निभाते दिखते हैं और उम्मीद है कि अब वे अंतरराष्ट्रीय मामलों पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करेंगे और विदेशों में भारत की छवि को बढ़ाएंगे तथा देश के विकास एजेंडा पर फोकस करेंगे। कई लोग आज अर्थव्यवस्था की स्थिति को लेकर चिंतित हैं। कई क्षेत्रों में निराशा के बावजूद बजट का स्वागत किया गया। पार्टी जनों का मानना है कि जब शोर बढ़ेगा, तो नरेंद्र मोदी आर्थिक मोर्चे पर बुरी खबरों को राजनीतिक रूप से प्रबंधित करेंगे।

दूसरे कार्यकाल में अमित शाह और उनके मंत्रालय के जरिये भाजपा के बुनियादी एजेंडे को हकीकत में बदलकर सत्ता को प्रभावी बनाया जाएगा। तीन तलाक उसी दिशा में एक कदम है, कश्मीर में अनुच्छेद 35 ए, अनुच्छेद 370 को खत्म करते हुए समान नागरिक संहिता लागू करना भाजपा के एजेंडे में है। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण अब टाला नहीं जाएगा, जैसा कि पहले होता था, वह भाजपा के एजेंडे का हिस्सा है।

कई लोगों का मानना है कि भाजपा के दूसरे कार्यकाल में ऐसा होने की उम्मीद है और राज्यसभा में बहुमत होने पर हिंदू राष्ट्र की तरफ कदम बढ़ाया जाएगा, चाहे धर्मशासित देश बने या नहीं। संघ परिवार चाहेगा कि यह 2025 से पहले हो, जब संघ परिवार के सौ वर्ष हो जाएंगे। इस बीच भाजपा स्वतंत्रता के 75वें साल को मील के पत्थर के रूप में उपयोग करेगी। अपने अंतिम लक्ष्य की ओर बढ़ते हुए वह 2022 में बड़े पैमाने पर उत्सव मनाने की योजना बना रही है।

राहुल गांधी ने ठीक ही कहा था कि यह विचारधारा की लड़ाई है। उन्होंने एक बार कहा था कि अगर भारत एक कंप्यूटर है, तो कांग्रेस पार्टी उसका ऑपरेटिंग सिस्टम है। लेकिन पिछले हफ्ते के घटनाक्रम बताते हैं कि विपक्ष ढह रहा है और सबसे बड़ी चिंताजनक बात है कि वह लड़ना छोड़ रहा है। ऐसे में भाजपा ही इस देश रूपी कंप्यूटर का ऑपरेटिंग सिस्टम बनने के लिए तैयार है।
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