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धारणा की जंग में उलझी भाजपा

Fri, 10 Apr 2015 08:41 PM IST
एम के वेणु
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राजग सरकार अपने हाव-भाव में आखिर क्यों इतनी रक्षात्मक दिखाई दे रही है? राजग नेता मुख्यधारा के मीडिया पर आरोप लगा रहे हैं कि उसकी वजह से भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के किसान विरोधी होने की धारणा मजबूत होती जा रही है। वे इस बात का ख्याल नहीं करते कि मीडिया शायद ही कभी किसानों की भावनाओं को महत्व देता है! मीडिया को इस धारणा को बढ़ाने के लिए भी जिम्मेदार ठहराया जा रहा है कि मौजूदा शासन में ईसाई सुरक्षित महसूस नहीं करते हैं। खुफिया ब्यूरो चुनींदा तरीके से ऐसे सरकारी दस्तावेज लीक कर रहा है (राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को इससे कोई समस्या नहीं है), जो यह दिखाते हैं कि संप्रग के शासन काल में चर्चों में कहीं ज्यादा तोड़फोड़ की गई थी। फिर भी भाजपा के नेता कह रहे हैं कि मीडिया ऐसी धारणा बनाने पर तुला हुआ कि अल्पसंख्यक सुरक्षित नहीं हैं।
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इस तेजी से बदलती कहानी का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि मात्र नौ महीने पहले प्रधानमंत्री मोदी ने, जिन्हें चुनावी सर्वे में हर फन का उस्ताद बताया गया था, विशेष तौर पर अपनी सरकार की मीडिया रणनीति तैयार की थी। सामान्य रूप से रणनीति यही थी कि वह मुख्यधारा के निजी मीडिया की जहां तक संभव हो, अनदेखी करेंगे और लोगों से सीधे संवाद करेंगे, जिन्होंने उन्हें वोट दिया है। संक्षेप में वह मीडिया को उसकी औकात बताना चाहते थे और संदेश देना चाहते थे कि प्रधानमंत्री के पास लोगों से संवाद करने का अपना माध्यम है। अगर वास्तव में यही मामला था, तो फिर सरकार मुख्यधारा के मीडिया पर इस धारणा को बढ़ावा देने का आरोप क्यों लगा रही है कि राजग सरकार गरीब समर्थक नहीं है या यह अल्पसंख्यकों को पर्याप्त सुरक्षा का एहसास नहीं करा रही है?

अपनी मूल रणनीति के तहत मोदी भाजपा को वोट देने वाले करोड़ों मतदाताओं को सरकार के कामकाज की जानकारी देने के लिए सोशल मीडिया या आकाशवाणी अथवा दूरदर्शन जैसे सरकारी मीडिया का उपयोग करने के लिए स्वतंत्र हैं। तो फिर मीडिया पर यह आरोप मढ़कर, कि वह सरकार के बारे में नकारात्मक धारणा फैला रहा है, उसे इतना महत्व क्यों दे रहे हैं? आखिर मोदी के उस आत्मविश्वास का क्या हुआ, जिसके दम पर उन्होंने लोगों से सीधे संवाद करने की बात की थी? यह वास्तव में भाजपा द्वारा लड़ी जा रही धारणा की लड़ाई में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव है।
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यह अकारण नहीं है कि एक अंग्रेजी दैनिक में छपे अपने पहले लंबे इंटरव्यू में प्रधानमंत्री ने कहा है कि सरकार ने कारोबार जगत के लिए नीतियां नहीं बनाई हैं। उन्होंने कहा कि नीतियां व्यापक लोगों के लिए बनाई जाती हैं और कारोबार जगत इसका फायदा उठाने के लिए स्वतंत्र है। उन्होंने विशेष रूप से उल्लेख किया कि श्रम कानूनों में सुधार को व्यवसाय जगत को फायदा पहुंचाने के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह मजदूरों के हित में है। प्रधानमंत्री की भाषा इतनी स्पष्ट थी कि लगता था, वह कठघरे में हैं। मोदी तब भी रक्षात्मक नजर आए, जब उन्होंने यह तर्क दिया कि कारोबार जगत यह शिकायत करता है कि सरकार उसके लिए पर्याप्त काम नहीं कर रही है, जबकि 'कांग्रेस कहती है कि मैं व्यवसायियों का समर्थक हूं। दोनों तो सही नहीं हो सकते।'

हालांकि सच तो यह है कि कारोबार जगत और गरीब, दोनों की मोदी से बड़ी अपेक्षाएं हैं। राजग सरकार अगले महीने  के आखिर में एक साल पूरा करने जा रही है और वास्तव में धारणा यह बन रही है कि भाजपा ने जो बड़े वायदे किए थे, वे सच के निकट नहीं हैं। दूसरा सच यह है कि मीडिया हवा में जनमत तैयार नहीं कर सकता। इसलिए भाजपा को मीडिया पर ऐसा दोषारोपण नहीं करना चाहिए। मीडिया तो केवल पहले से मौजूद जनभावनाओं को ही रेखांकित करता है।

संदेशवाहक पर निशाना साधने के बजाय भाजपा को इस बात का गंभीरतापूर्वक अध्ययन करना चाहिए कि उसके बारे में, खासकर खेती के संकट, भूमि अधिग्रहण अध्यादेश, अल्पसंख्यकों की असुरक्षा जैसे मुद्दों पर क्यों नकारात्मक धारणा बन रही है। पार्टी की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में भी इनमें से कुछ मुद्दों पर बात हुई थी।

मोदी के लिए बेहतर रणनीति यही होगी कि वह कुछ समय तक मीडिया की अनदेखी करें और उन महत्वपूर्ण कामों पर ध्यान दें, जिसका प्रदर्शन अगले छह महीनों में सरकार को करना है। कृषि अर्थव्यवस्था बर्बाद है, क्योंकि कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी के अनुसार, वर्ष 2014-15 में विकास दर शून्य रहने की आशंका है। पिछले डेढ़ दशक में कृषि विकास दर जब भी शून्य या नकारात्मक रही है, समग्र जीडीपी दर पांच फीसदी के आसपास रही है। यह इसलिए, क्योंकि कृषि (जिसका जीडीपी में करीब 15 फीसदी का योगदान है) का उद्योग और सेवा क्षेत्र पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। ध्वस्त होती कृषि अर्थव्यवस्था को बचाना राजग की बड़ी चुनौती है। ऐसा पिछले छह महीनों में, वैश्विक स्तर पर जिंसों की कीमत में भारी गिरावट के बाद हुआ है। बेमौसम बरसात ने तो इस संकट को पिछले महीने से बढ़ाने का ही काम किया है।

मोदी ने किसानों के लिए कुछ राहत उपायों की घोषणा की है, लेकिन जरूरत इस बात की है कि कृषि क्षेत्र के संकट को दूर करने के लिए राजग सरकार एक व्यापक योजना तैयार करे। फ्रांस, जर्मनी और कनाडा के अपने विदेश दौरे से लौटने के बाद मोदी की समझदारी इसी में होगी कि वह देश के नुकसान ग्रस्त कृषि क्षेत्र का दौरा करें और अपनी आंखों से देखें कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में क्या हो रहा है।

जमीनी स्तर पर चुपचाप काम करने और परिणाम देने का विकल्प नहीं है। यदि ऐसा होता है, तो सरकार के बारे में लोगों की धारणा स्वतः बदल जाएगी। अगर जमीनी स्तर पर गंभीरता से काम होगा, तो मीडिया उसे भी कवर करेगा। भाजपा प्रवक्ताओं को यह दावा करने की जरूरत नहीं है कि जो काम 60 वर्षों में नहीं हुआ, उसे उनकी सरकार ने कुछ ही समय में करने की कोशिश की। ऐसी अतिशयोक्ति अमूमन काम नहीं करती। यह बातें कम और काम ज्यादा करने का वक्त है।
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