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अच्छे दिनों के लिए कड़वी दवा

Sun, 13 Jul 2014 06:18 PM IST
सुधीर विद्यार्थी
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साधो, अजीब बौड़म हैं वह। उन्हें पता ही नहीं कि अच्छे दिन आ गए। ओसारे में देर तक सोए पड़े हैं। मैंने लपक कर आवाज दी, उठो धूप निकल आई है। सूरज तपने लगा और आप हैं कि घोड़े बेचकर सो रहे हैं। आंखें मलते हुए वह बोले, मेरे पास घोड़े क्या, कभी गधे भी नहीं रहे। एक तुम हो, जो कभी-कभी दुलत्ती फटकारते चले आते हो।
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मैं उनकी बात सुनकर अपमानित नहीं हुआ। सच तो यह है कि इन्सल्ट फील करने में मेरा कभी भरोसा नहीं रहा। मैंने तो हमेशा फील गुड किया है। पिछली दफे मैं और एनडीए, दोनों इसी मुगालते में रहे और सरकार रुख्सत हो गई। इस बार आई, तो मायके से पोटलियों में बांधकर ढेर सारे अच्छे दिन ले आई।

मैंने मित्र को बताया तो वह बोले, तुम्हारी सरकार है या सेंटा क्लॉज? मैं निरुत्तर हो गया। अपने नए-नए हुए पीएम मुझे हर बार सेंटा ही ज्यादा लगते हैं। झक्क सफेद दाढ़ी और मूंछें। हर मर्ज की दवा इस लुकमान की जेब में है। अब पीएमओ में सूखा रोग के शर्तिया इलाज का साइन बोर्ड टंग गया है।
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मित्र ने पलटकर पूछा, किधर हैं अच्छे दिन? लाओ, मैं भी देखूं। मैंने कहा, अच्छे दिनों को देखने के लिए आंखों की नहीं, दृष्टि की जरूरत होती है, जो तुम्हारे पास नहीं है।

मित्र तिलमिला गए। कविताई जवाब में बोले, नवाज शरीफ ने भेजी साड़ी, एलओसी पर गोलाबारी।

मैंने कहा, तुम निरे बौड़म हो। सीमा पर हुए हमले को साड़ी से जोड़कर कर मत देखो। साड़ी का मैच तो उसमें लगने वाले फॉल से होता है।

वह बोले, आगाज ऐसा है, तो अंजाम क्या होगा?

मैंने कहा, देश अब सुरक्षित है। वह आईसीयू से बाहर आ गया है। उसे दी जा रही ऑक्सीजन के सिलेंडर हटा लिए गए हैं। हमारी सेना दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब देने में सक्षम है। हम जल्दी ही दुनिया के सिरमौर बनेंगे। पर इसके लिए कड़वी दवा देनी होगी। हुनरमंद हकीम की यही फितरत है। थोड़ी महंगाई झेलने की तो हमारी पुरानी आदत है। अच्छे दिनों की उम्मीद में क्या थोड़ी तकलीफ बर्दाश्त नहीं कर सकते? चंगा होने के लिए यह जरूरी है।
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