हालांकि, उन्होंने सेवानिवृत्ति की अटकलों को खारिज करते हुए हाल ही में कहा कि वह ‘कहीं नहीं जा रहे हैं’, और महिलाओं के लिए राज्य सरकार की नौकरियों में 35 फीसदी आरक्षण की घोषणा करके अपनी उपस्थिति महसूस कराने की कोशिश की, लेकिन यह धारणा बनी हुई है कि वह कमजोर पड़ रहे हैं। ऐसे में हैरानी नहीं है कि राजनीतिक दल, जिनमें उनकी अपनी पार्टी भी शामिल है, पहले से ही नीतीश के बाद के दौर की तैयारी कर रहे हैं और उसी के अनुसार, चुनावी रणनीति बना रहे हैं। इससे एक दिलचस्प जंग देखने को मिल रही है। हालांकि, बिहार चुनाव सिर्फ पटना में अगली सरकार बनने के बारे में नहीं है। यह 1990 के दशक से भारतीय राजनीति को आकार देने वाले मंडल बनाम कमंडल (हिंदुत्व) के संघर्ष की अंतिम सीमा का प्रतिनिधित्व करता है। इसलिए इस जनादेश का असर राष्ट्रीय राजनीति पर भी पड़ने की संभावना है।
नीतीश की स्वास्थ्य समस्याएं भाजपा के लिए उनकी छाया से बाहर निकलने का अवसर है। यही नहीं, उसे उस राज्य में पहली बार अपनी पार्टी का मुख्यमंत्री बनाने के साथ खुद को स्थापित करने का मौका मिलेगा, जो अब तक उसकी पकड़ से बाहर रहा है।
अगर भाजपा बिहार में जीतती है, तो वह हिंदी पट्टी में अपना परचम लहराएगी और मंडल राजनीति के अंतिम अवशेषों को मिटाने के लिए हिंदुत्व को नई गति देगी। वह बिहार की जीत का इस्तेमाल एक और ऐसे राज्य में प्रवेश के लिए करेगी, जो अब तक पहुंच से बाहर है, जैसे पड़ोसी पश्चिम बंगाल, जहां 2026 की पहली छमाही में चुनाव होंगे। भाजपा के लिए बिहार में मुख्य चुनौती राजद, कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां (सीपीआई-एमएल सहित) से मिलकर बना इंडिया गठबंधन है। नीतीश की सेहत ने मंडल वोट बैंक को फिर से एकजुट करके हिंदुत्ववादी ताकतों को दूर रखने की उम्मीदें जगाई हैं।
वर्ष 2006 में भाजपा गठबंधन वाली सरकार के मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश ने 113 उप-जातियों को बाहर निकालकर मंडल ब्लॉक को तोड़ दिया। उन्होंने उन्हें अति पिछड़ा वर्ग बताया और उनके लिए विशेष कल्याणकारी योजनाएं चलाईं। उन्होंने कुछ मुस्लिम समूहों को भी इसमें शामिल किया, जिससे भाजपा के साथ गठबंधन के बावजूद उन्हें अल्पसंख्यकों के एक वर्ग का समर्थन प्राप्त हुआ।
नीतीश सरकार द्वारा 2023 में कराई गई जाति गणना के अनुसार, राज्य में अति पिछड़ा वर्ग की हिस्सेदारी लगभग 36 फीसदी है। इनमें से बड़ी संख्या जद (यू) के वफादार मतदाताओं की है। इसी वर्ग के समर्थन ने नीतीश को बिहार में एक मजबूत ताकत बनाया है, क्योंकि इसी वजह से वह जिस भी गठबंधन से जुड़ते थे, उसके पक्ष में चुनाव नतीजों को प्रभावित कर पाते थे। जब तक नीतीश सक्रिय रहे, बिहार इसी स्थिति में रहा। लेकिन अब, जब उनका स्वास्थ्य खराब हो रहा है और सार्वजनिक उपस्थिति कम हो रही है, तो सभी दल इस महत्वपूर्ण अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) के वोट बैंक पर नजर गड़ाए हुए हैं, ताकि उसे हथियाया जा सके।
जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, बिहार में ईबीसी को अपने पाले में करने की यह होड़ और भी तेज होती जा रही है। हर पार्टी इसमें शामिल है। मिसाल के तौर पर, भाजपा ने फरवरी में नीतीश को अपनी सरकार में सात नए मंत्रियों के लिए राजी किया। हैरानी नहीं कि इनमें से चार नीतीश के मतदाता वर्ग से हैं, जिससे साफ है कि भाजपा की नजर इस वोट बैंक पर है। यही नहीं, नीतीश की रणनीति से सीख लेते हुए मोदी सरकार ने घोषणा की कि एक मार्च, 2027 से शुरू होने वाली राष्ट्रीय जनसंख्या जनगणना में जातिगत गणना को भी शामिल किया जाएगा, जबकि वह इसका विरोध करती रही है।
उधर, राजद ने अपने इतिहास में पहली बार किसी अति पिछड़े वर्ग (ईबीसी) के नेता को अपनी बिहार इकाई का अध्यक्ष नियुक्त किया है। हाल ही में, पार्टी ने धानुक जाति के 70 वर्षीय मंगत राम मंडल को प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त किया है। कांग्रेस भी अति पिछड़े वर्गों को साधने में सक्रिय है। राहुल गांधी इन समुदायों के नेताओं से मिलने के लिए पिछले पांच महीनों में बिहार के चार दौरे कर चुके हैं।
जैसे-जैसे नीतीश कुमार की उम्र बढ़ रही है, दूसरी पार्टियां अपनी जगह बनाने की उम्मीद कर रही हैं। हालांकि, मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री और लोकसभा सांसद होने के बावजूद, लोजपा नेता चिराग पासवान ने अपना ध्यान राज्य की राजनीति पर केंद्रित करने का फैसला किया है और हाल ही में घोषणा की है कि वह भी चुनाव लड़ेंगे। लेकिन एक और महत्वपूर्ण बात है चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर (पीके) की नई पार्टी, जन सुराज, का प्रवेश। यह एक छुपी हुई संभावना है, लेकिन किशोर को नीतीश के नेपथ्य में काम करने के अपने अनुभव से ताकत मिलती है, जब 2015 में राजद और जदयू के महागठबंधन ने भाजपा को हराकर शानदार जीत हासिल की थी।
प्रशांत किशोर पिछले दो साल से बिहार के कोने-कोने में पैदल यात्रा कर रहे हैं। जन सुराज के मुख्य प्रवक्ता पवन वर्मा के अनुसार, वह राज्य के हर गांव तक पहुंच चुके होंगे। किसी भी नई पार्टी को वोट मिलना हमेशा मुश्किल होता है। लेकिन वर्मा का मानना है कि बिहार में बदलाव की प्रबल इच्छा है, जो पीके की सभाओं में भारी भीड़ और एक करोड़ से ज्यादा लोगों की सदस्यता से जाहिर हो रही है। इस राजनीतिक खेल में चुनाव आयोग ने भी मतदान से कुछ महीने पहले मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण करने का फैसला लिया है। इससे भ्रम की स्थिति पैदा हो गई है, क्योंकि चुनाव आयोग आसन्न चुनावों की समय सीमा से पहले इसे कराने की जल्दबाजी में है। 2025 का जनादेश भविष्यवाणी करने के लिहाज से सबसे कठिन चुनावों में से एक साबित हो सकता है।