कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जो भूली नहीं जा सकतीं। वर्ष 2013 की एक घटना मेरे लिए ऐसी ही दर्दनाक घटना है, जिसमें बिहार के सारण जिले के एक प्राथमिक स्कूल में तेईस बच्चे सिर्फ इसलिए मरे थे, क्योंकि उन्होंने स्कूल में दोपहर का भोजन किया था। उन बच्चों को जहर में पका खाना खिलाया गया था।
सो पिछले सप्ताह जब मैं चुनाव प्रचार देखने बिहार पहुंची, तो तय किया कि उस गांव में जरूर जाऊंगी, जहां वह घटना घटी थी। धरमसाती-गंडामन पहुंचना आसान नहीं था। पटना से जब मैं निकली, तो सबने कहा कि दो-ढाई घंटे से ज्यादा नहीं लगने चाहिए, लेकिन सड़कें इतनी बेहाल थीं कि पांच घंटे लगे मशरख पहुंचने में, जो उस गांव के आसपास सबसे बड़ा कस्बा है। वहां से धरमसाती-गंडामन दस किलोमीटर की दूरी पर है, पर वहां एक ऐसी सड़क जाती है, जिस पर चलना कठिन है।
मैं सड़कों का हाल इसलिए बता रही हूं, क्योंकि जहरीला भोजन करने के बाद बच्चों की हालत जब खराब हुई, तो उनको पहले मशरख के छोटे-से अस्पताल में ले जाया गया। और वहां जब उनका इलाज नहीं हो पाया, तो कइयों को पटना तक ले जाना पड़ा। आज तक लोग समझ नहीं पाए हैं कि उस दिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बच्चों को पटना ले आने के लिए हेलीकॉप्टर उपलब्ध क्यों नहीं करवाया। उन्होंने ऐसा किया होता, तो संभवतः कई बच्चों की जान बच जाती।
गांव में घुसते ही मैं पहले उस स्कूल को देखने गई। वह उस दिन बंद था, पर स्कूल के सामने मृत बच्चों के नाम पर बने स्मारक के पास बरगद के पेड़ के नीचे कुछ बच्चे खेल रहे थे। वहां मौजूद बड़े लोगों ने बताया कि स्कूल नया बना। जब यह स्मारक बन रहा था, तब स्कूल की नई इमारत भी बना दी गई थी। पहले यह स्कूल इतना अच्छा नहीं था।
स्मारक और स्कूल देखने के बाद मैं वापस गांव में गई, जहां बाजार में गांववाले इकट्ठा हो गए। उनमें सुंदर प्रताप भी थे, जो अपनी बेटी ममता कुमारी की जान उस दिन बचा नहीं पाए थे। सुंदर प्रताप की आंखों में आंसू थे और गुस्सा भी था। गुस्सा बेटी गंवाने का तो है ही, इसलिए भी है कि पिछले महीने स्कूली बच्चों के लिए जब बाहर से मिड डे मील आया, तो उन्होंने दूसरे लोगों के साथ उसका विरोध किया, जिस पर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई है। स्कूल में बाहर से मंगवाए जाने वाले भोजन का ग्रामीण विरोध कर रहे हैं, क्योंकि उन्हें चिंता है कि यह भोजन भी जहरीला न हो। इस गांव के ज्यादातर लोग इतने गरीब हैं कि इतने बड़े हादसे के बाद भी अपने बच्चों को इस सरकारी स्कूल में भेजना उनकी मजबूरी है।
बिहार की इस एक कहानी में वे सारे पहलू हैं, जो साबित करते हैं कि इस राज्य को परिवर्तन, विकास और सुशासन की जितनी आवश्यकता है, उतनी देश के किसी दूसरे राज्य को नहीं है। दो साल पहले इतना बड़ा हादसा होने के बाद भी इस राज्य की स्वास्थ्य सेवा वैसी की वैसी है। स्मारक से पहले इस गांव में स्वास्थ्य केंद्र नहीं बनना चाहिए था? स्कूल की इमारत को बेहतर करने से पहले क्या सड़क को नहीं सुधारना चाहिए था?
फिर भी बहुत लोग नीतीश कुमार के कार्यकाल को अच्छा मानते हैं, क्योंकि जो भी थोड़ा-बहुत विकास हुआ, उनके समय में ही हुआ। लेकिन लोग यह भी कहते हैं कि नीतीश कुमार को लालू के साथ मिलकर चुनाव नहीं लड़ना चाहिए था, क्योंकि लालू का राज जंगलराज था।