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रोजगार और विकास का बड़ा अवसर

Sun, 29 Jan 2017 08:36 PM IST
एम के वेणु
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एम के वेणु
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वर्ष 2017-18 का केंद्रीय बजट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए विकास और रोजगार देने का आखिरी बड़ा अवसर होगा, जिसकी बात वह 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार के समय से करते रहे हैं। उनके कार्यकाल का आधे से ज्यादा समय बीत चुका है और रोजगार के साथ विकास में स्पष्ट कमी दिख रही है। विमुद्रीकरण के बाद अर्थव्यवस्था को एक और झटके का सामना करना पड़ा है, हालांकि प्रधानमंत्री ने लोगों को यह समझाने की कोशिश की है कि नोटबंदी का कदम अर्थव्यवस्था से काले धन की सफाई के बड़े उद्देश्य के लिए उठाया गया है। उन्होंने उन लाखों दिहाड़ी मजदूरों के दर्द को कम करने का वायदा भी किया, जिन्हें नोटबंदी के कारण अपना रोजगार खोना पड़ा, जिसके चलते सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों का उत्पादन 40 से 50 फीसदी घटा। इनमें से बहुत से उद्योग उत्तर प्रदेश में है, जहां अगले महीने चुनाव होने वाले हैं।
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इसलिए केंद्रीय बजट प्रधानमंत्री को गरीबों के कल्याण के साथ-साथ गिरती हुई अर्थव्यवस्था में रोजगार के पुनर्सृजन का एक अवसर देगा। रिजर्व बैंक ने हाल ही में जनवरी-मार्च तिमाही के लिए एक सर्वेक्षण किया, जो बताता है कि अर्थव्यवस्था में आगे मांग में और गिरावट की आशंका है। यह सरकार के उस दावे का खंडन करता है, जिसमें कहा गया है कि पुनर्मुद्रीकरण की प्रगति से खपत की मांग बढ़ेगी। रिजर्व बैंक के सर्वे पर नजर डालें, तो ऐसा नहीं लगता कि मांग की स्थिति में कोई त्वरित सुधार होने वाला है। सर्वे यह भी बताता है कि अक्तूबर-दिसंबर की तिमाही में विभिन्न क्षेत्रों की 160 कंपनियों का मुनाफा पिछले तीन वर्षों में सबसे कम रहा है।

यानी संगठित क्षेत्र में भी भविष्य में रोजगार के लिए शुभ संकेत नहीं हैं। लाभप्रदता और निरंतर विकास के मामले में दो दशकों से बाजार की सबसे अग्रणी एचडीएफसी बैंक की रिपोर्ट बताती है कि अक्तूबर से दिसंबर की तिमाही में उसकी लाभ दर 18 वर्षों में सबसे कम रही है और विमुद्रीकरण के बाद वह अपने कर्मचारियों के पदों में पांच फीसदी की कटौती कर रहा है। ध्यान रहे, यह हाल संगठित क्षेत्र का है, जिसकी भागीदारी 47 करोड़ के कुल कार्यबल में पांच फीसदी से भी कम है। आप समझ सकते हैं कि सबसे कमजोर असंगठित क्षेत्रों की क्या स्थिति होगी, जहां कार्यबल का 95 फीसदी हिस्सा कार्यरत है।
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कृषि एवं निर्माण जैसे असंगठित क्षेत्र को, जहां करीब 30 करोड़ लोग काम करते हैं, संभवतः विमुद्रीकरण के सबसे खराब असर का सामना करना पड़ रहा है। व्यापक धारणा है कि प्रधानमंत्री ने कृषि क्षेत्र से संबंधित अपना वह वायदा पूरा नहीं किया, जिसमें उन्होंने किसानों को कृषि लागत पर पचास फीसदी मुनाफे का वायदा किया था। किसान अब भी लाभकारी मूल्य का इंतजार कर रहे हैं और उनकी नाराजगी व हताशा पश्चिमी उत्तर प्रदेश में साफ दिखाई दे रही है।

इसलिए अरुण जेटली की एकमात्र चुनौती उन लाखों लोगों को राहत प्रदान करने की है, जिन्होंने अपना रोजगार खोया, खासकर असंगठित क्षेत्रों में। अब तक मोदी सरकार की सामाजिक-कल्याण नीति तथा दावे में दृढ़ विश्वास की कमी रही है। इसका एक उदाहरण है, मोदी सरकार का बहुचर्चित कार्यक्रम-हर खेत में पानी, जो वायदा करता है कि वर्षा पर निर्भर रहने वाली भारत की 57 फीसदी भूमि पर बनियादी सिंचाई की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। कृषि अर्थशास्त्री अशोक गुलाटी का मानना है कि इसके लिए केंद्र सरकार को तीन से चार वर्षों तक कम से कम प्रति वर्ष 75 हजार करोड़ रुपये देने की जरूरत है। पर वित्त मंत्री ने सालाना करीब छह हजार करोड़ का आवंटन किया है। प्रधानमंत्री मोदी के बहुप्रचारित सामाजिक कार्यक्रमों में आवंटन बहुत कम हुआ है, चाहे वह स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास या डिजिटल समावेशन ही क्यों न हो।

विमुद्रीकरण के बाद विभिन्न सामाजिक परियोजनाओं को पर्याप्त धन देकर सक्रिय करने की व्यापक जरूरत है, क्योंकि अपनी सरकार की कल्याणकारी छवि को बचाने के लिए मोदी के पास यह अंतिम मौका है। सरकार अर्थव्यवस्था को डिजिटल मोड में आगे बढ़ाने के लिए एक नीतिगत ढांचा सामने रखने की कोशिश करेगी। इसके लिए डिजिटल संरचनाओं पर काफी खर्च करने की जरूरत है। ग्रामीण इलाकों में बैंक शाखाएं और एटीएम बढ़ाने की जरूरत है, जो अभी अपर्याप्त हैं। ढाई लाख ग्राम पंचायतों को ऑप्टिक फाइबर नेटवर्क से जोड़ने की योजना अपने तय समय से काफी पीछे है।

उपभोग की मांग में बढ़ोतरी करना अरुण जेटली की पहली चुनौती है। बजट में उपभोग को बढ़ाने के लिए निश्चित रूप से मध्यवर्ग को करों में कुछ राहत दी जाएगी। लेकिन देश में करीब तीन करोड़ लोग ही आयकर चुकाते हैं। ज्यादातर उपभोक्ता कर व्यवस्था के दायरे से बाहर हैं। इसलिए मांग बढ़ने में समय लगेगा, क्योंकि बड़े पैमाने पर नौकरियों का नुकसान हुआ है, जिससे उपभोक्ताओं का विश्वास हिला हुआ है। दूसरी बड़ी चुनौती निजी निवेश को पुनर्जीवित करने की है, जो विमुद्रीकरण से पहले से ही नीचे था। नया निवेश होने  की संभावना तब तक नहीं है, जब तक अर्थव्यवस्था पटरी पर नहीं लौटती।

जीएसटी को लागू करना भी एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि विमुद्रीकरण से पस्त छोटे व्यवसायों पर लागत खर्च बढ़ने से यह अर्थव्यवस्था की राह में बाधक बनेगा। विमुद्रीकरण और जीएसटी, दोनों ऐसे सुधार हैं, जो बड़े व्यवसायों और बहुराष्ट्रीय निगमों के हित में झुके हुए हैं। ऐसे व्यवधानों से बचने के लिए सरकार को छोटे व्यवसायों के लिए कोई रचनात्मक उपाय तलाशना होगा। सरकार ने यह भी वायदा किया था कि विमुद्रीकरण, डिजिटाइजेशन और जीएसटी व्यापक रूप से काले धन से निपटेंगे। यह देखना होगा कि क्या देश की विशाल नौकरशाही और पुलिस प्रशासन रिश्वत लेना बंद कर देगा। यह भी स्पष्ट नहीं है कि क्या राजनीतिक पार्टियां चुनाव में धन का उपयोग करना बंद कर देंगी। यानी अब से 2019 तक मोदी की लगातार परीक्षा होती रहेगी।
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