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गली-गली भारत रत्न

Sun, 01 Dec 2013 07:26 PM IST
मनु पंवार
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मेरे मोहल्ले में हजामत करने वाले कल्लू को पुत्र रत्न हुआ। कल्लू के भीतर देशभक्ति की भावना कुछ ज्यादा ही मात्रा में है। लिहाजा उसने नामकरण संस्कार में बेटे का नाम रखा भारत। इस तरह कल्लू को भारत रत्न की प्राप्ति हुई। कल्लू को भारत रत्न के लिए लॉबिंग नहीं करनी पड़ी। न ही सरकार को कायदे-कानून बदलने की जरूरत पड़ी। पूरा मोहल्ला अपने बीच भारत रत्न पाकर फूला नहीं समा रहा है।
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रोशन ढाबेवाले को भी आइडिया जम गया। उसने सोच लिया है कि अपने नवजात पोते का नाम ‘पद्मश्री’ रखेगा। नाम का नाम और एवार्ड का एवार्ड। भविष्य में किसी की खुशामद करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। ‘पद्मश्री’ तो अपने घर में है। यही ट्रेंड रहा, तो अब पद्म भूषण, पद्म विभूषण घर-घर मिला करेंगे। आगे चलकर संतान नालायक निकली भी तो क्या, नाम का तो ‘पद्मश्री’ रहेगा ही। ऐसे में सरकार की टेंशन तो कुछ कम होगी। वरना उसे हर साल सम्मान देने के लिए पात्र या तो खोजने पड़ते हैं या फिर थोपने पड़ते हैं। उसके चुनाव पर फिर भी हर बार सवाल उठ खड़े होते हैं।

अपने यहां नाम की बड़ी महिमा है। कई लोगों को नाम सूट कर जाता है। जिनको नाम सूट नहीं करता, उनकी दुर्गति पर मार्केट में मुहावरे और लोकोक्तियां चल पड़ी हैं। मसलन, आंख के अंधे नाम नैनसुख, नाम बड़े और दर्शन छोटे आदि। जरा सोचिए, लक्ष्मी अगर चौराहे पर भीख मांगती फिरे, अमरनाथ जी पचास बरस की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते हार्ट अटैक से मर गए या आनंद बाबू डिप्रेशन का शिकार हो गए, तो यह नामों के साथ बड़ी ज्यादती होगी।
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इसी तरह की स्थिति से बचने के लिए अमूमन लोग अपने बच्चे का नाम एकलव्य रखना पसंद नहीं करते। इसमें हमेशा यह खतरा बना रहता है कि कहीं कोई गुरु उससे अंगूठा न मांग ले। दु:शासन नाम भी प्रचलन में नहीं आ पाया। कुछ नामों में बड़ा विरोधाभास दिखता है। मसलन, मुलायम सिंह। यह नाम सिंह प्रजाति की मूल प्रवृत्ति के खिलाफ जाता है। सोचिए, ‘सिंह’ अगर मुलायम हो जाए, तो जंगल में राजकाज कैसे करेगा?

शायद इसीलिए शेक्सपीयर बरसों पहले कह गए हैं कि नाम में क्या रखा है! लेकिन आज हम यह नहीं कर सकते। वरना हजामत बनाने वाले कल्लू बुरा मान जाएगा। आखिर उसके पास भारत रत्न जो है। हमें शेक्सपीयर को झुठलाना पड़ेगा। नाम में बहुत कुछ रखा है।
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