मनरेगा के लंबे अनुभव से पता चलता है कि हर ग्रामीण परिवार को वर्ष में 100 दिनों के रोजगार का मूल वादा कई बार कागजों पर ही सीमित रह जाता है। इसमें भुगतान में देरी, मांग-आधारित रोजगार की अनदेखी और बजट आवंटन में कटौती जैसी चुनौतियां भी सामने आईं। ऐसे में, प्रस्तावित विधेयक में रोजगार के दिनों को 100 से बढ़ाकर 125 करने का प्रावधान सराहनीय है। इसके अतिरिक्त, धोखाधड़ी का पता लगाने के लिए बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण, ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम, मोबाइल आधारित कार्यस्थल निगरानी से लेकर एआई जैसी तकनीकों तक के उपयोग के प्रावधान भी स्वागतयोग्य हैं। जो प्रमुख बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं, उनमें कृषि के चरम मौसमों के दौरान योजना को रोकना और इसे केंद्र द्वारा वित्तपोषित मॉडल से हटाकर राज्यों के साथ लागत-साझाकरण व्यवस्था में बदलना भी शामिल है।
कांग्रेस समेत विपक्ष इसके लिए सरकार की आलोचना कर तो रहा है, लेकिन दिलचस्प बात यह है कि ये मुद्दे संप्रग काल में भी बहस के केंद्र में रहे थे। संप्रग के दूसरे कार्यकाल में 2011 में तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार ने मनरेगा कार्यों को बुआई व कटाई के वक्त रोकने की मांग की थी, क्योंकि इससे खेतों में जरूरत पड़ने पर मजदूर नहीं मिल पाते थे। इसी तरह मनरेगा के बजट का कुछ हिस्सा राज्यों द्वारा वहन किए जाने का सुझाव भी संप्रग के भीतर से ही निकला था। लागत में साझेदारी से निस्संदेह राज्यों में जवाबदेही बढ़ेगी और दुरुपयोग भी कम होगा। लिहाजा प्रस्तावित विधेयक पहले से दिए जा रहे इन्हीं सुझावों का विस्तार ही अधिक दिखता है। विकसित भारत के सपने के पूरा होने के लिए जरूरी है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत और समावेशी बने। उतना ही जरूरी यह भी है कि राजनीतिक द्वंद्व से ऊपर उठकर सरकार और विपक्ष मिलकर इस दिशा में काम करें।