पिछले वर्ष 16 दिसंबर को पाकिस्तान के पेशावर में पूरी दुनिया न सिर्फ 150 मासूमों के बर्बर नरसंहार की गवाह बनी, बल्कि उसका सामना इस अफसोसनाक सच्चाई से भी हुआ कि पाकिस्तान के दूसरे संस्थानों और इमारतों के उलट वहां के स्कूलों में आतंकवादी हमले के समय सुरक्षा का कोई बंदोबस्त नहीं है।
शहर के स्कूलों समेत यहां के ज्यादातर स्कूलों में सुरक्षा के नाम पर हाथ में डंडा पकड़े एक सामान्य-सा 'चौकीदार बाबा' होता है, जिसकी जिम्मेदारी महज इतनी होती है कि सभी बच्चों को स्कूल के गेट के अंदर पहुंचा दे। गौरतलब है कि खैबर पख्तूनवा वह क्षेत्र है, जहां, खासकर जनजातीय क्षेत्रों में ज्यादातर पुरुष बंदूक लेकर चलते हैं। मगर पेशावर कांड के बाद यहां की महिला शिक्षकों को भी हथियार रखने और उन्हें चलाने का प्रशिक्षण देने की मंजूरी दी गई है, ताकि आतंकवादी हमलों की सूरत में वे कुछ हद तक सुरक्षा मुहैया करा सकें।
ऐसे पुरुष शिक्षक, जिनके घर पर बंदूक है, और जिन्हें इसे चलाना आता है, उन्होंने पहले ही हथियार लेकर कक्षा में पढ़ाना शुरू कर दिया है। बहुतों का मानना है कि पेशावर कांड के बाद सहमे हुए बच्चे अपने शिक्षक के हाथ में हथियार देखकर ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। शिक्षकों को हथियार रखने की सरकारी अनुमति के बाद से एक विवाद पैदा हो गया है, जिसके मूल में सवाल है कि क्या पुस्तकों और बंदूकों में विरोधाभाष नहीं है?
इस मामले में सामान्य सोच यह है कि विद्यार्थियों को सुरक्षा मुहैया कराना शिक्षकों की नहीं, सरकार की जिम्मेदारी है। 'अमर उजाला' से बातचीत के दौरान एक राजनेता ने कहा, 'एक शिक्षक के बैग में पुस्तकें होनी चाहिए, क्योंकि उसका कर्तव्य ज्ञान बांटना है, न कि आतंकवादियों को मारना। आखिर किताबों के साथ बंदूक नहीं रखी जा सकती। और फिर एक महिला शिक्षक के लिए यह कैसे मुमकिन है कि वह तालिबान जैसे आतंकियों से निपटे, जो आत्मघाती जैकेट पहने हुए खुद ही मरने को तैयार हो।'
दिवंगत बेनजीर भुट्टो की सबसे छोटी बेटी आसिफा भुट्टो जरदारी ट्वीट करती हैं, 'पेशावर की महिला शिक्षकों को ज्ञान, पुस्तकों और विभिन्न कोर्सेज का प्रशिक्षण मिलना चाहिए, न कि बंदूकों का।'
खैबर पख्तूनवा में 50,000 पंजीकृत स्कूल हैं, और यहां भी दूसरे प्रांतों की तरह तालिबान के खिलाफ लड़ाई जारी है। क्या यह माना जाए कि हथियार रखने की अनुमति देकर शिक्षकों को यह भरोसा दिया जा रहा है कि वे खुद अपनी सुरक्षा कर सकते हैं? इस प्रांत में महज 65 हजार पुलिसवाले हैं, जिनमें से रोजाना कुछ पुलिसकर्मी आतंकवादियों का शिकार बन जाते हैं।
स्वात में जब मलाला यूसुफजाई पर हमला हुआ, तब इस मुद्दे को जितना साधारण समझा गया, यह उतना है नहीं। हालांकि तालिबान का मनोबल गिराने के लिए यह काफी है कि आज यह युवा लड़की शारीरिक और मानसिक तौर पर पूरी तरह स्वस्थ है, और इतना ही नहीं, वह निडर होकर तालिबान को सलाह भी देती है, 'अगर आज तालिबान मुझसे मिलें, तो मैं उन्हें भी अपने बच्चों को स्कूल भेजने को कहूंगी, क्योंकि यह सभी बच्चों के लिए जरूरी है।'
उत्साह बढ़ाने वाली बात है कि काफी वर्षों से पाकिस्तान में, खासकर जनजातीय क्षेत्रों में खुले स्कूलों में लड़कियों ने भी जाना शुरू कर दिया है। इससे नाराज होकर तालिबान आए दिन स्कूलों पर हमले कर रहे हैं। दरअसल, उनका विरोध लड़के या लड़की से नहीं, बल्कि समूची शिक्षा से है। साफ है कि शिक्षा को लेकर चल रहे इस संघर्ष को पाकिस्तान को जीतना ही होगा, ताकि उसके समाज और संस्कृति की रक्षा हो सके। पेशावर में सैनिक स्कूल में हुए हमले के बाद यह कानून बनाया गया कि जब तक पुख्ता सुरक्षा की व्यवस्था नहीं होती, तब तक पाकिस्तान का कोई भी स्कूल और उच्च शैक्षिक संस्थान नहीं खुलेगा।
आज यहां के स्कूलों को ऊंची दीवारों से घेरा गया है, ताकि कोई इन पर चढ़ न सके। दीवारों पर कंटीले तार लगाए गए हैं। वाहनों के स्कूल गेट के बाहर रुकने की व्यवस्था की गई है। गेट के बाहर ऑटोमेटिक हथियारों से लैस गार्ड की व्यवस्था की गई है। ऐसे बंदोबस्त देखकर लगता है, मानो ज्ञान के किसी केंद्र में नहीं, बल्कि सेना के बैरक में प्रवेश कर रहे हों। स्कूल में प्रवेश से पहले चाहे विद्यार्थी हो, या शिक्षक सभी की जबरदस्त तलाशी होती है। इन सबका, खासकर युवा विद्यार्थियों के मानस पर असर पड़ता है।
सवाल यह है कि अगर स्कूल के भीतर हथियार ले जाने की अनुमति दी जाएगी, तो इनके गलत हाथों में पड़ने और दुरुपयोग की आशंका भी बढ़ेगी।
खैबर पख्तूनवा में सैन्य अधिकारियों से प्रशिक्षण पा रही महिला शिक्षकों की फोटो तमाम अखबारों में छाई हुई हैं। आश्चर्य की बात है कि जिन महिला शिक्षकों ने कभी हथियारों को हाथ भी नहीं लगाया था, उनके बारे में प्रशिक्षक कह रहे हैं कि वे पुरुष शिक्षकों से ज्यादा बेहतर ढंग से हथियार चला रही हैं। ऐसी ही एक महिला शिक्षक बताती है कि जब भी वह बंदूक चलाती है, उसके दिमाग में तालिबान का चेहरा होता है।
पेशावर में हुए नरसंहार के बाद बचे हुए उन बच्चों को देखकर, जिन्होंने साथियों को अपने सामने मरते देखा था, आंखे छलक उठती हैं। इन बच्चों ने 'अमर उजाला' को बताया, 'हम डरे नहीं हैं। हम स्कूल लौटना चाहते हैं। हम तालिबान को संदेश देना चाहते हैं कि हम उनसे डरते नहीं, और हम सभी शिक्षा लेकर दिखाएंगे।'
दरअसल पाकिस्तान की लड़ाई तालिबानी नजरिये से है, और ये पाकिस्तानी युवा हैं, जो शिक्षा पाने को लेकर अपनी मजबूत इच्छाशक्ति के दम पर उन्हें हराएंगे। मलाला यूसुफजाई पर भी हमला हुआ था, मगर तालिबान आतंकी उनकी सोच और सपनों को छू भी नहीं पाए, जिन्होंने अब भी अपनी चमक नहीं खोई है।