जैश-ए-मोहम्मद के खैबर फख्तुनख्वा स्थित कैंप में भारतीय वायुसेना के हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव काफी गहरा गया है। इन पंक्तियों को लिखते वक्त तक पाकिस्तान ने दावा किया है कि उसने भारतीय वायु सेना के दो विमान गिराए हैं, लेकिन हमारी सरकार ने इससे इनकार करते हुए कहा है कि हमने पाकिस्तान के हवाई हमले की कोशिश को नाकाम किया है और पाकिस्तान के एक लड़ाकू विमान को गिरा दिया है। इस प्रक्रिया में हमने एक विमान खोया है और हमारा एक पायलट लापता है, जिसके बारे में पाकिस्तान दावा कर रहा है कि वह उसके कब्जे में है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि हम पाकिस्तानी दावे की तस्दीक करेंगे। स्पष्ट है कि पाकिस्तान का बढ़-चढ़कर दावा करना उसके दुष्प्रचार की रणनीति का हिस्सा है। इन सबके बावजूद तथ्य यह है कि दोनों तरफ सैन्य गतिविधियां बढ़ गई हैं और कुछ समय के लिए आठ हवाई अड्डों पर यात्री विमानों के संचालन को भी रोकने का आदेश दिया गया था, जिसे बाद में वापस ले लिया गया।
भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने विदेश यात्रा के दौरान रूस और चीन के साथ मिलकर एक संयुक्त वक्तव्य जारी किया है, जिसमें आतंकवाद की पूरी निंदा की गई है। मेरा मानना है कि यह पाकिस्तान के लिए एक सख्त संदेश है। जाहिर है, इस तनातनी के माहौल में दोनों देशों के बीच एक परिपक्व व्यवहार की आवश्यकता है। बालाकोट में आतंकी शिविर पर हवाई हमले के बाद विदेश सचिव ने जो बयान दिया था, उसमें यह खुलासा कर दिया गया था कि यह एक गैर-सैनिक अभियान है और इस आतंकवाद विरोधी अभियान के जरिये जैश-ए मोहम्मद के कैंप को तबाह कर दिया गया है। संभवतः भारत सरकार सिर्फ पाकिस्तान को ही नहीं, पूरे विश्व को यह संदेश देना चाह रही थी कि भारत का उद्देश्य आतंकवादी संगठनों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करना था, जिससे भारत पर समय-समय पर होने वाले आतंकी हमलों पर सफलतापूर्वक अंकुश लगाया जा सके। अब यह देखना महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान और पाकिस्तानी सेना इसको कैसे देखती है। यहां एक बात को ध्यान में रखना आवश्यक है कि हमने जो आतंकी शिविर पर हवाई हमले किए वह पाकिस्तान की धरती पर था और खैबर पख्तुनख्वा प्रधानमंत्री इमरान खान का इलाका है। इसका एक असर यह हो सकता है कि इसे उनके लिए एक व्यक्तिगत हमला समझा जाए, और पाकिस्तानी जनता और पाकिस्तान की सेना उन्हें उकसाने में सफलता पा ले। हालांकि अभी तक पाकिस्तान ने यह स्वीकार नहीं किया है कि भारतीय वायु सेना की कार्रवाई उनके लिए कोई खासियत रखती है। उनके दृष्टिकोण से उस कार्रवाई में न तो कोई हताहत हुआ है और न ही कोई नुकसान पहुंचा है।
इन सब बातों के द्वंद्व में इस पूरे प्रकरण की दिशा किस तरफ जाएगी, यह महत्वपूर्ण है। मेरा मानना है कि भारी तनाव की यह स्थिति अभी थोड़े दिनों तक ही चलेगी। हवाई अड्डों को बंद करने का जो फैसला लिया गया था, वह भी सिर्फ एहतियात के तौर पर सुरक्षा के दृष्टिकोण से लिया गया निर्णय था। यह निश्चित है कि शीघ्र ही अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अपना असर दिखाएगी और दोनों देशों पर दबाव डाला जाएगा कि सैनिकों से जुड़े किसी अभियान को ज्यादा तूल न दिया जाए, और दोनों देशों की वायु सेनाएं अपने-अपने बेस में चली जाएं। इन सबके बीच हालांकि, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने फिर से यह कहा है कि हम दोनों देश एक दूसरे से बातचीत का रास्ता निकालें, क्योंकि इसी में हम सबकी भलाई है। इमरान के इस बयान से भारत को सहमत होने में कोई अड़चन नहीं होनी चाहिए। जैश-ए मोहम्मद के ठिकानों पर हमला करके और जैसे कि कहा जाता है, उसे तबाह करके भारत ने अपना उद्देश्य पूरा कर लिया है। साथ ही यह भी आशा है कि न सिर्फ पाकिस्तान को, बल्कि पूरी दुनिया को यह संदेश चला गया है कि आतंकवाद के मामले में भारतीय विचारधारा में और संसार के और देशों की विचारधारा में कोई विरोधाभास नहीं है। इसलिए इमरान खान के इशारों को ठीक से समझ के हमें सकारात्मक दिशा में कदम उठाने चाहिए।
रही बात अपने लापता पायलट को वापस लाने की, तो अगर वास्तव में वह पाकिस्तान के कब्जे में हैं, तो इस मामले में हमें पाकिस्तान को कूटनीतिक संदेश भेजने की आवश्यकता है कि वह उस पायलट को जितनी जल्दी हो सके, छोड़ दे, ताकि वह सुरक्षित वतन लौट सकें। इसके अलावा भारत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान पर इतना दबाव बनाकर रखना चाहिए कि उसे याद रहे कि अगर उसने आतंकवाद को प्रश्रय देना जारी रखा, तो उसकी आर्थिक स्थिति और भी खराब हो सकती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसे अलग-थलग रखना बेहद जरूरी है।
भारत को पाकिस्तान के साथ रिश्ते को एक नए दृष्टिकोण से देखना पड़ेगा। वर्तमान सरकार की इस नीति में पाकिस्तान से वार्तालाप नहीं हो सकता, जब तक कि उनकी तरफ से आतंकवाद पर अंकुश न लगाया जाए। मुझे लगता है कि हमें इस नीति पर पुनर्विचार करना पड़ेगा। साथ ही साथ कुछ पुराने मुद्दों को ठीक से समझने के तरीके निकालने पड़ेंगे। उदाहरण के लिए, कई वर्षों पहले पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति मुशर्रफ ने सुझाव दिया था कि नियंत्रण रेखा को ही दोनों देशों के बीच की सीमा मान ली जाए और आम जनता के बीच एक-दूसरे से मिलने की ढील दी जाए। अटल जी के जमाने में दोनों देशों के बीच शांति व सुलह के जो कदम उठाए गए थे, हमें उन्हीं नीतियों को अपनाने की कोशिश करनी चाहिए।
इन सब प्रयत्नों के साथ हमें याद रखना पड़ेगा कि पाकिस्तान के भीतर अब भी ऐसी ताकतें हैं, जो भारत से गहरा रिश्ता बनाने में खलल पैदा करें। इस संदर्भ में हमें याद करना होगा कि जब भी दोनों देशों ने एक-दूसरे की ओर हाथ बढ़ाया है, तब ये ताकतें उभर के आईं और रास्ते में रुकावटें पैदा कीं। यह सिलसिला एक झटके में समाप्त हो जाए, यह शायद संभव नहीं है। इसलिए हमें संयम बरतना पड़ेगा और पाकिस्तान जो अपने देश में मुश्किलें झेल रहा है, उसमें उसकी मदद करनी पड़ेगी। सत्तर वर्ष का इतिहास एक दिन में बदला नहीं जा सकता, इसे दुरुस्त करने के लिए कदम उठाने होंगे।