लोकसभा चुनाव की घोषणा को अब एक पखवाड़ा से ऊपर बीत चुका है। चुनाव की घोषणा के ठीक बाद बहस इन मुद्दों पर थी कि क्या बालाकोट और पुलवामा मामले ही इस चुनाव पर हावी रहेंगे, जो सत्तारूढ़ दल को हावी बनाएंगे या बेरोजगारी और किसानी के मुद्दों की भी चर्चा होगी। दूसरी चर्चा यह गर्म रही कि सात चरणों की लंबी चुनावी अवधि में छोटे दलों का टिक पाना मुश्किल होगा। यह भी माना गया कि अमूमन सत्तारूढ़ दल को ही इसका भी कुछ फायदा मिलेगा। लेकिन अब राजनीतिक बहस और नोक-झोंक तेज हो गई है। लगभग सभी दलों ने राष्ट्रीय, क्षेत्रीय या उप क्षेत्रीय दलों के साथ अपना गठजोड़ बना लिया है। चुनावी चर्चा की शुरुआत गठबंधन को महामिलावट या ठगबंधन बताकर हुई थी, पर यह तय है कि सबका हाथ किसी न किसी के साथ जुड़ा ही हुआ है। किस राजनीतिक दल ने कब किस नेता पर आक्षेप किया, किस मुद्दे पर किसने किसकी सरकारी गिराई-ये सारे मामले अब शोध का विषय हैं। वर्तमान यह है कि न तो कोई राष्ट्रीय दल और न ही कोई क्षेत्रीय दल अपने दम-खम पर इस चुनावी मैराथन में भाग लेने को तैयार है।
अब अगर राजनीतिक मामलों पर आएं, तो गठजोड़ की विविध शैली पर नजर घुमाना सबसे महत्वपूर्ण है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में, जहां 80 लोकसभा सीटें दांव पर रहेंगी, सपा, बसपा और रालोद ने अपना गठबंधन समय पर घोषित कर दिया। लेकिन इसमें कांग्रेस को आमंत्रित नहीं किया गया और शालीनता के साथ केवल दो सीटें-रायबरेली व अमेठी की-बख्श दी गईं, क्योंकि अनुमानित था कि यहां से क्रमशः सोनिया गांधी और राहुल गांधी चुनाव लड़ेंगे। अभी इस पर चर्चा आगे भी नहीं बढ़ी थी कि प्रियंका गांधी चंद्रशेखर आजाद रावण से जाकर मिलीं। रावण एक उभरते हुए दलित नेता हैं और युवा वर्ग में उनके लिए जुनून है। अगले ही क्षण मायावती का करारा बयान आया कि इस गठबंधन की कांग्रेस से मेलजोल की अब कोई संभावना नहीं है। रही-सही कसर कांग्रेस ने पूर्व बसपा नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी को बिजनौर से कांग्रेस का टिकट देकर पूरी कर दी। यानी विपक्षी दलों का पूर्ण गठबंधन होते-होते रह गया। वहीं भाजपा में भी अनुप्रिया पटेल ने दबाव बनाकर अपने सीटों की संख्या बढ़वाई। और आज भी यह स्पष्ट नहीं है कि ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी इस चुनाव में भाजपा के साथ है या विरोध में।
वहीं दूसरे बड़े राज्य बिहार में आएं, तो वहां भाजपा, जदयू और लोजपा ने अपने गठबंधन की काफी पहले ही घोषणा कर दी। लालू यादव और कांग्रेस के पुराने संबंध रहे हैं, इसलिए लोगों का अनुमान था कि यह गठबंधन तो बड़ी आसानी से होगा, लेकिन हुआ बिल्कुल विपरीत। कांग्रेस ज्यादा सीटों की मांग करती रही और जेल के भीतर बैठे लालू यादव ने मुकेश सहनी के विकासशील इंसान पार्टी और उपेंद्र कुशवाहा के आरएलएसपी और जीतन राम मांझी के हम पार्टी को कहीं ज्यादा दिलवा दीं। पू्र्व में वामपंथी दलों के चहेते रहे लालू यादव जेएनयू के छात्र नेता कन्हैया कुमार की बेगूसराय सीट पर दावेदारी पर नहीं माने और भाकपा की मांग उन्होंने खारिज कर दी। इन सबके बावजूद सबने यह स्वीकारा कि सबकी मुख्य चुनावी चुनौती नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार है। यानी लक्षित शत्रु होने के बावजूद आंतरिक प्रतिस्पर्धा बरकरार है।
भाजपा में भी टिकट बंटवारे को लेकर भरपूर घमासान छिड़ा है। बिहार में किसी एक अगड़ी जाति को जमकर टिकट दिए गए हैं, और इसी सवर्ण जाति (राजपूत) पर भाजपा ने उत्तर प्रदेश में भी अपना भरोसा जताया है। नतीजा यह है कि जहां एक हाथ से भाजपा ने अगड़ों को आरक्षण दिया है, वहीं राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में सवर्णों के बीच तोड़फोड़ की राजनीति को भी बढ़ावा दिया है। इसी दल के मंत्री रहे गिरिराज सिंह को अपनी परंपरागत सीट नवादा से हटाकर बेगूसराय भेज दिया गया है, जहां उन्हें कन्हैया कुमार और राजद के एक तगड़े मुस्लिम उम्मीदवार का सामना करना पड़ेगा। उत्तर प्रदेश में कलराज मिश्र और मुरली मनोहर जोशी को चुनावी प्रक्रिया से दरकिनार कर दिया गया है।
अगर दक्षिण के राज्यों में जाएं, तो मेल-मिलाप का सबसे बड़ा संघर्ष तमिलनाडु में है, जहां कांग्रेस ने द्रमुक के साथ समझौता किया है, पर कैप्टन विजयकांत की पार्टी डीएमडीके को दरकिनार कर दिया है। वहीं भाजपा ने पन्नीरसेलवम और पलानीस्वामी के नेतृत्व में अन्नाद्रमुक से गठबंधन किया है, पर अन्नाद्रमुक का एक मजबूत धड़ा शशिकला और दिनाकरन के पास है। दोनों ही द्रविड़ पार्टियों के दिग्गज नेता करुणानिधि और जयललिता का निधन हो गया है, ऐसे में तमिल उथल-पुथल के नतीजों पर अब सबकी नजरें टिकी रहेंगी।
महाराष्ट्र में जहां भाजपा और शिवसेना का गठबंधन है, वहीं कांग्रेस और एनसीपी ने भी अपना समन्वय बना लिया है। सभी मानते हैं कि भाजपा और शिवसेना का पलड़ा भारी है, पर यह किसी को स्पष्ट नहीं है कि किसको कितनी सीटें मिलेंगी। पश्चिम बंगाल में शासक दल ममता का तृणमूल है, जहां भाजपा भी अपनी दावेदारी ठोक रही है और अच्छे प्रदर्शन की आशा करती है। लेकिन वहां कांग्रेस और वाम दलों के लिए यह अस्तित्व का मामला है। ममता को कितनी सीटें मिलेंगी, क्या वह गठबंधन की सबसे प्रमुख नेत्री बनी रहेंगी और क्या भाजपा पश्चिम बंगाल में अपना पांव जमा पाएगी, इन्हीं सवालों से वहां की चुनावी चर्चा गर्म है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में कांग्रेस 'एकला चलो रे' की नीति अपना रही है, जहां उसके नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री भी हैं। भाजपा ने छत्तीसगढ़ में अपने कई पुराने प्रत्याशियों को बदल दिया है। सवाल यह है कि क्या प्रत्याशी बदलने से राजनीतिक दिशा बदल जाएगी।
इस राजनीतिक कोलाहल के बीच राहुल गांधी ने अपना सबसे बड़ा राजनीतिक एलान न्यूनतम आय के नाम पर कर दिया है। सवाल यह है कि क्या बड़े वादे करके कांग्रेस अपना खोया हुआ जनाधार वापस पा सकेगी या क्या कांग्रेस के नहले पर भाजपा किसी दहले की तैयारी कर रही है। इस सबके बीच देश का मतदाता अभी सोच रहा है। सोच-विचार और मंथन की प्रक्रिया के उपरांत ही चुनाव में वह अपनी मुहर लगाएगा।