दक्षिण एशिया में पहली बार राष्ट्रीय सीमाओं के पार जाने वाली एक नई तेल पाइपलाइन का भारत और नेपाल के बीच उद्घाटन भारत से उस नकारात्मक लाभ को छीन लेता है, जिसका इसने 1973 से चारों तरफ से जमीनी सीमा से घिरे पड़ोसी देश से उठाया है। भारत अब नेपाल की नाकाबंदी करने की स्थिति में नहीं रहेगा, जैसा कि इसने पहले 1988 में और फिर 2015 में किया था। एक ऐसे देश के लिए, जो अपनी ईंधन आपूर्ति के लिए पूरी तरह से भारत पर निर्भर हो, अच्छे पड़ोसी धर्म का इससे बड़ा और बेहतर आश्वासन नहीं हो सकता।
बिहार की बरौनी रिफाइनरी से दक्षिण-पूर्वी नेपाल के अमलेखगंज में ईंधन की आपूर्ति करने वाली 69 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन का हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने वीडियो कांफ्रेंसिग के जरिये संयुक्त उद्घाटन किया। यह द्विपक्षीय रिश्तों में एक उल्लेखनीय विकास है और भविष्य की दृष्टि से इसके महत्वपूर्ण संकेत हैं।
इस उद्घाटन के बाद जल्द ही उन ट्रकों और कंटेनरों के काफिले के समाप्त होने की संभावना है, जिनके जरिये नेपाल में ईंधन की आपूर्ति हो रही थी। इन काफिलों की आवाजाही खराब सड़कों, बाढ़, भूस्खलन और अन्य प्रकृति व मानव निर्मित संकटों के अधीन थी। अब एक भूमिगत पाइपलाइन सुचारू ढंग से और तेजी से ईंधन की आपूर्ति करेगी। यह ईंधन स्वाभाविक रूप से सस्ता है और नेपाली प्रधानमंत्री ओली को अपने नागरिकों को लाभ पहुंचाने की जल्दी है। इससे भारत के प्रति जबर्दस्त सद्भावना पैदा होगी, जिसे विशेष रूप से नेपाल के शिक्षित शहरी मध्यवर्ग के बीच संदेह और शत्रुता की भावना के साथ देखा जाता है।
यह आपसी लाभ के लिए है। भारत को भी इससे फायदा होगा, नेपाल ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड (एनओसीएल) को नई पाइपलाइन से सालाना 200 करोड़ रुपये बचत की उम्मीद है। भारत ने इस पाइपलाइन के निर्माण में बहुत तेजी दिखाई है। इसे तीस महीनों में पूरा करना था, लेकिन पिछले वर्ष भारत की सबसे बड़ी रिफाइनरी की निर्माण शाखा इंडियन ऑयल कार्पोरेशन लिमिटेड (आईओसीएल) ने इसे 17 महीनों के भीतर पूरा किया। इसकी शुरुआत अप्रैल, 2018 में हुई थी। दो टुक कहें, तो भारत इतनी जल्दी और कुशलता से परियोजनाओं को पूरा नहीं करता है। आईओसीएल ने इस परियोजना पर 325 करोड़ रुपये खर्च किए और इसकी बारीकी से निगरानी की गई। विदेश मंत्री एस. जयशंकर संयुक्त आयोग की बैठक के लिए पिछले महीने काठमांडू गए थे और यह परियोजना एजेंडे में सबसे ऊपर थी। भारत समय से पहले काम पूरा करने को लेकर खुशी और गर्व का अनुभव कर सकता है। इस परियोजना पर 1996 में ही विचार किया गया था, लेकिन इसे क्रियान्वित नहीं किया जा सका। इसका श्रेय मोदी सरकार को ही जाता है, जिसने इसे 2014 में बातचीत की मेज पर वापस लाया।
यह परियोजना आर्थिक और सामरिक रूप से काठमांडू को नई दिल्ली के करीब लाने का प्रयास करती है। गौरतलब है कि इस पाइपलाइन का उद्घाटन ठीक उसी दिन हुआ, जब चीन के विदेश मंत्री वांग यी काठमांडू में अपने नेपाली समकक्ष प्रदीप कुमार ग्यावली से बात कर रहे थे। भारत का उद्देश्य इस हिमालयी राष्ट्र में चीन द्वारा निर्मित प्रमुख अवरोधों का मुकाबला करने के लिए भारत-नेपाल संबंधों को मजबूत बनाना है। ऐसा नेपाल और चीन के बीच हिमालय से होकर रेल संपर्क स्थापित करने की हालिया योजनाओं की पृष्ठभूमि में किया गया है। हिमालय से होकर गुजरने वाली एक ऊर्जा पाइपलाइन के जरिये भी नेपाल और चीन को जोड़ने की योजना थी। इन दोनों योजनाओं को 2015 के तनाव की पृष्ठभूमि में नेपाल द्वारा भारत पर अपनी निर्भरता का विकल्प खोजने के साधन के रूप में देखा गया था।
भारत ने तब कहा था कि ईंधन, दवा और अन्य जरूरी चीजों से लदे ट्रकों को मधेशियों द्वारा रोका गया था, जो नेपाली संविधान के कुछ प्रावधानों से नाराज थे। हालांकि, नेपाल ने भारत की ओर से आपूर्ति की नाकेबंदी को संविधान के उन प्रावधानों को संशोधित करने के लिए काठमांडू पर भारत द्वारा दबाव बनाने के रूप में देखा, जिससे नेपाल की तकरीबन आधी आबादी मताधिकार से वंचित हो सकती थी।
पाइपलाइन के बाद दोनों देश अमलेखगंज डिपो में अतिरिक्त भंडारण की सुविधा के निर्माण पर भी काम कर रहे हैं। नेपाल के विकास के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दोहराते हुए मोदी ने कहा कि दोनों देशों द्वारा परिकल्पित द्विपक्षीय परियोजनाएं अच्छी प्रगति कर रही हैं और उन्हें आने वाले दिनों में अपने नेपाली समकक्ष के साथ उनका संयुक्त उद्घाटन करने की उम्मीद है। मोदी ने कहा कि 'लोगों से लोगों का रिश्ता द्विपक्षीय संबंधों की नींव है।' अपनी तरफ से ओली ने इस पाइपलाइन को व्यपार और पारगमन सहयोग का सबसे बेहतर उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि नेपाल ने भारत के साथ अपने संबंधों को काफी महत्व दिया है और इसमें हमेशा विस्तार की गुंजाइश है।
इस पाइपलाइन के महत्व को समझने के लिए वर्ष 2015 के घटनाक्रम की ओर लौटना होगा, जब दोनों देशों के बीच संबंध तनावपूर्ण थे। नेपाल के लोगों की मनोदशा भारत विरोधी थी। नाकाबंदी के कारण ईंधन और अन्य वस्तुओं की भारी कमी हो गई, क्योंकि नेपाल उस वर्ष पहले आए विनाशकारी भूकंपों से उबरने के लिए जूझ रहा था। उस संकट ने नेपाल को चीन के साथ पहली बार ईंधन आपूर्ति समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए प्रेरित किया। भारत को चीन से नेपाल को दूर रखने के लिए सतर्क और तेजी से काम करने की जरूरत होगी। यह आसान नहीं है, क्योंकि नेपाल ने बेल्ट ऐंड रोड इनीशिएटिव (बीआरआई) पर हस्ताक्षर किया है।