प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दिनों अपनी बर्लिन यात्रा के दौरान नेताजी सुभाष चंद्र बोस से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक करने का आश्वासन उनके पौत्र सूर्य कुमार बोस को दिया। उस आश्वासन के चौबीस घंटे के भीतर केंद्र सरकार ने एक कमेटी का गठन कर इस दिशा में अपनी प्रतिबद्धता का भी परिचय दिया है। इस सक्रियता से यह उम्मीद बढ़ गई है कि मोदी सरकार इस दिशा में सकारात्मक कदम उठा सकती है। दरअसल नेताजी से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक करने की मांग को लेकर कोलकाता में पिछले कुछ समय से जबर्दस्त जन अभियान चल रहा है। इससे यह पता चलता है कि नेताजी को लेकर पश्चिम बंगाल में अब भी कितना गहरा आवेग है। कई राजनीतिक दल इस आवेग का लाभ उठाने की मंशा भी पाले हुए हैं।
मोदी सरकार यदि नेताजी से जुड़ी गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक करती है, तो बंगाल में भाजपा को बड़ा राजनीतिक लाभ मिल सकता है। इसका नुकसान, जाहिर है, सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस को होना है। फिलहाल नेताजी के परिवार के दो सदस्य कृष्णा बोस तथा सुगतो बोस तृणमूल कांग्रेस के साथ हैं। पर नेताजी से जुड़ी फाइलों के मुद्दे पर उन्होंने रहस्यमय चुप्पी ओढ़ रखी है। इस मामले में नेताजी के परिवार वालों में जारी मतभेद का राजनीतिक लाभ भी भाजपा उठा सकती है। जैसी कि संभावना है, वैसे में नेताजी के कुछ परिजन भाजपा के साथ आ सकते हैं।
दरअसल नेताजी के जन्म और मृत्यु से जुड़े दिवस को गोपनीय दस्तावेज सार्वजनिकीकरण दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत पिछले कुछ वर्षों से बंगाल में हुई है। अभियान चलानेवालों का कहना है कि दस्तावेजों को सार्वजनिक करने में व्यापक जनहित जुड़ा है। चूंकि मोदी सरकार ने पहले ऐसा करने से इन्कार कर दिया था, ऐसे में उसके रुख में आए बदलाव को इस जनदबाव का भी नतीजा बताया जा रहा है। हालांकि नेताजी की गुमशुदगी के मुद्दे पर उनके सभी परिजन एकमत नहीं हैं। मसलन, कुछ समय पहले नेताजी की बेटी अनीता बोस ने कहा था कि उनके पिता की मौत विमान दुर्घटना में ही हुई। अगर विमान हादसे के बाद वह जीवित रहते, तब परिवार से संपर्क करने की कोशिश जरूर करते और देश भी लौट आते। वहीं अन्य कई परिजन विमान दुर्घटना में उनके मरने की बात पर भरोसा नहीं करते। उनका मानना है कि नेताजी को वापस देश न लौटने देने के पीछे बड़ा षड्यंत्र था। इन परिजनों एवं 'ओपन प्लेटफार्म फॉर नेताजी' नामक संगठन ने पिछले दिनों प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर नेताजी के रहस्यमय तरीके से गायब होने के मामले की जांच कराने का आग्रह किया था।
असाधारण जीवन की तरह असाधारण मृत्यु ने नेताजी के इर्द-गिर्द रहस्यों का जाल-सा बुन दिया है। कदाचित इसीलिए उनके आदर्शों के अनुसरण के बजाय अंध श्रद्धा अधिक देखने को मिलती है। जांच आयोगों की भूलभुलैया में नेताजी किसी जासूसी कथा के चरित्र बनाकर रख दिए गए हैं। ऐसे में, अब आने वाले दिनों में दो चीजों पर खास नजर रहेगी। एक यह कि नेताजी से जुड़ी गोपनीय फाइलें उनके बारे में कौन-सा नया तथ्य उजागर करेगी। दूसरा यह कि नेताजी की रहस्य गाथा को सार्वजनिक करने जा रही भाजपा को पश्चिम बंगाल में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में क्या सचमुच कुछ लाभ मिलेगा।