गलती हमारी है, हमारी सरकारों की नहीं। हमने उनको शुरू से अधिकार दे रखा है अपने लिए एक स्तर की सेवाओं का और हमारे लिए दूसरे स्तर की सेवाओं का। चाहे स्वास्थ्य सेवाओं की बात हो, चाहे शिक्षा की, चाहे बिजली-पानी और आवास की, हमारे जन प्रतिनिधि यह मानकर चलते हैं कि उनके और उनके परिजनों को बेहतरीन सेवा हासिल करने का अधिकार है, चाहे आम नागरिक को ऐसी सेवाएं सपनों में भी न मिलती हों। इस गलत आदत की शुरुआत तब हुई, जब हमने इसकी इजाजत दे दी कि राजनेता बीमार होने पर हमारे पैसों से दुनिया के अच्छे और महंगे अस्पतालों में इलाज करवा सकते हैं। ऐसा अन्य लोकतांत्रिक देशों में नहीं होता है और न ही होना चाहिए।
आज पहली बार दिल्ली में रहने वाले राजनेता मजबूर हैं उस गंदे, प्रदूषित वातावरण में सांस लेने के लिए, जो उन्होंने हमको और हमारे बच्चों को बख्शा है। पिछले वर्ष से मालूम था सबको कि अगर वायु प्रदूषण को लेकर युद्ध स्तर पर कुछ किया नहीं जाता है, तो दिल्ली में सांस लेना मुश्किल हो सकता है। इसके बावजूद अगर हमारी सरकारों ने समस्या का समाधान ढूंढने की कोशिश नहीं की है, तो इसलिए कि उनको ऐसे मामलों में लापरवाही बरतने की आदत है। उनकी संवेदनहीनता का उदाहरण केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने पिछले सप्ताह यह कहकर दिया कि दिल्ली को ‘गैस चैम्बर’ कहना गलत है, क्योंकि कम से कम इसका वह हाल तो नहीं है, जो कभी भोपाल का हुआ था। ऐसा कहकर मंत्री जी ने दिल्ली वालों का मजाक तो उड़ाया ही, भोपाल त्रासदी में मारे गए लोगों का भी मजाक उड़ाया है। लेकिन अपने इस संवेदनहीन वक्तव्य के लिए क्या उनको दंडित किया जाएगा? जी नहीं, ऐसा नहीं होगा, क्योंकि संवेदनहीनता के लिए अगर राजनेता को हम दंडित करने लगेंगे, तो यह सिलसिला लंबा चलेगा।
हम परिवर्तन चाहते हैं, तो हमें तय करना होगा कि हम अपने जनप्रतिनिधियों से बिल्कुल वही सुविधाएं और सेवाएं मांगें, जो वे अपने लिए हासिल करते हैं। अगर हमने अपने जनप्रतिनिधियों को शुरू से नियंत्रण में रखा होता, तो शायद हमारे यहां भी ऐसा ही होता। लेकिन हमने उनको हर तरह से बिगाड़ा है। हमने उन्हें आलीशान कोठियों में रहने की इजाजत दी, जब आम भारतीय झोपड़ी में रहते थे। ऊपर से बिजली, पानी का पैसा भी जनता ने दिया, जबकि उनके अपने घरों में ये सुविधाएं नहीं थीं।
सो आज पहली बार हमारे जनप्रतिनिधियों को उस प्रदूषित वायु में सांस लेना पड़ रहा है, जो बदकिस्मत दिल्ली वाले वर्षों से बर्दाश्त कर रहे हैं। समस्या कल पैदा नहीं हुई है, वर्षों से बढ़ती रही है धीरे-धीरे। पहली बार इसकी चर्चा कोई बीस साल पहले शुरू हुई थी, लेकिन इलाज ढूंढने के बदले दिल्ली की सरकारों ने मरहम-पट्टी कर बार-बार मामला टाल दिया। हमको हंगामा करना चाहिए था, लेकिन हमने कुछ नहीं कहा या अगर कहा कुछ भी, तो दबी जबान से कहा। सो अब समाधान के लिए हजारों करोड़ रुपये लगेंगे, पर यह जरूरी खर्च मानकर अगर हम आगे नहीं चलते, तो अगले वर्ष तक संभव है कि देश की राजधानी दुनिया भर में इतनी बदनाम हो जाए कि यहां न विदेशी पर्यटक आने को तैयार होंगे और न ही विदेशी दूतावास यहां रहेंगे। कुछ राजदूत अभी से दिल्ली छोड़कर अपने दफ्तर बंगलूरू जैसे शहरों में खोलने की कोशिश कर रहे हैं। यह दुख की बात है, लेकिन दूसरी तरह से देखा जाए, तो अच्छा है कि हमारे राजनेता हमारी तरह सांस लेने पर मजबूर हुए हैं।