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देश और पार्टी पहले या नेता!

Mon, 18 Mar 2013 11:03 AM IST
जगदीश उपासने (वरिष्ठ पत्रकार)
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बात पहले करें भाजपा की ताकत की। ‘नेशन फर्स्ट, पार्टी नेक्स्ट, सेल्फ लास्ट’ जैसा लुभावना घोषवाक्य। कांग्रेस के उलट नेतृत्व पार्टी नेताओं का। कार्यकर्ता आधारित जन संगठन। राष्ट्रवादी विचारधारा को पार्टी की नीति-रीति का आधार बनाए रखने के कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे अनेक संगठनों के कई कार्यकर्ताओं के समर्थन का हाथ पार्टी की पीठ पर। संगठन मशीनरी चुस्त-दुरुस्त, सक्रिय और पार्टी की लाइन पर बनाए रखने के लिए देश भर में पूर्णकालिक संगठन मंत्रियों की अनोखी व्यवस्था, जिसका जोड़ सिर्फ साम्यवादी दलों में।
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165 सांसद, देश भर की विधानसभाओं-विधान परिषदों में 900 से ज्यादा विधायक, छह मुख्यमंत्री, एक उप-मुख्यमंत्री और देश के विभिन्न राज्यों के नगर निगमों, नगर पालिकाओं, जनपद-ब्लॉक-ग्राम पंचायतों-सभाओं में सत्तारूढ़। पांच प्रमुख राज्यों में पूरी सरकारें; कर्नाटक में येदियुरप्पा के बाहर निकलने के बाद एक अधूरी सरकार और बिहार, पंजाब, तथा झारखंड में आधी सरकारें। पार्टी की मौजूदगी देश के लगभग हर राज्य में। कांग्रेस के मुकाबले कार्यकर्ताओं के लिहाज से एक मजबूत ताकत। पार्टी के शीर्ष पर तपे-तपाए और देश भर में परिचित नेताओं की लंबी और प्रभावी कतार।

पार्टी के विभिन्न मोर्चे जाने-माने पार्टी नेताओं की अगुआई में कांग्रेस के फ्रंट संगठनों के मुकाबले ज्यादा सक्रिय। राष्ट्रीय और प्रदेशों से जुड़े महत्वपूर्ण मसलों पर पार्टी की चौकस नजर तथा इनको जोर-शोर से उठाने की तेजी। दोनों सदनों में पार्टी की संसदीय विंग का प्रदर्शन कमोबेश शानदार। पार्टी की पूरी, आधी और अधूरी सरकारों वाले राज्यों में सुशासन, शांति और विकास की उद्धृत की जा सकने वाली कई कहानियां। पार्टी के अधिकतर मुख्यमंत्रियों-उप-मुख्यमंत्रियों की साफ-सुथरी छवि।
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ऐसी ताकतवर प्रमुख विपक्षी पार्टी के लिए अवसर भी कम नहीं। भाजपा मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ को बनाए रखते हुए राजस्थान और दिल्ली जैसे कुछ राज्यों में भी जरा-सी कोशिश से अपनी सरकारें बना सकती है। गुजरात और हिमाचल भी पार्टी के पास बने रहने की भरपूर संभावना है। अगला, बड़ा अवसर 2014 में केंद्र की सत्ता हासिल करने का और अर्थव्यवस्था तथा राजकाज के लिहाज से इस मुश्किल घड़ी में अपनी रीति-नीतियों के हिसाब से नया भारत रचने का।

कांग्रेस की अगुआई वाली यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल में उठे भ्रष्टाचार के बड़े मामलों ने देश के मानस को मथकर रख दिया। देश में 35 वर्ष से कम के युवाओं की 67 फीसदी बेचैन आबादी, जिनमें 25 वर्ष से कम उम्र के ही 50 करोड़ उतावले युवा, तमाम आधुनिक रंग-ढंग और सोच-विचार के बावजूद जिनके लिए सचमुच है ‘नेशन फर्स्ट’! और जिनको भाजपा के नेतृत्व में एनडीए के सत्ता में आने से कोई गुरेज नहीं, बल्कि जो समझ नहीं पा रहे कि ऐसे मजबूत विपक्ष के बावजूद असली मुद्दों पर लड़ने का कौल अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं को ही क्यों उठाना पड़ रहा है? यूपीए के शासन के विकल्प के रूप में पार्टी और एनडीए के पास गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा बिहार के सुशासन और विकास के बेहतरीन मॉडल और स्वच्छ छवि वाले लोकप्रिय नेता।

लोकतंत्र में किसी विपक्षी दल या गठबंधन को इससे अधिक और क्या  चाहिए? अफसोस कि ‘सेल्फ लास्ट’ यानी ‘व्यक्ति अंत में’ का घोष करने वाली पार्टी में व्यक्ति ही आज अहम हैं। पार्टी के मुख्यमंत्री, राज्यों के पदाधिकारी और आम कार्यकर्ता हैरान-परेशान हैं कि उनका कौन नेता कहां और किस दिशा में है? उन्हें समझ नहीं आ रहा कि पार्टी का शीर्ष भ्रष्टाचार, काला धन तथा महंगाई जैसे ज्वलंत मुद्दों पर लगातार लड़ने और अगले विधानसभा और फिर लोकसभा चुनावों की तैयारी के बजाय प्रधानमंत्री पद पर क्यों रार मचाए हुए है?

येदियुरप्पा जैसे अपने भी किन नेताओं के कारण छिटक जाते हैं? पार्टी अध्यक्ष पर दूसरे कार्यकाल की बात आते ही क्यों नितिन गडकरी को अपने बिजनेस पर सफाइयां देते और दोषी न होने या कोई भी जांच करा लेने का खम ठोकते हुए पार्टी नेताओं की ड्योढ़ियां लांघनी पड़ रही है? लालकृष्ण आडवाणी क्यों खामोश हैं?

गडकरी के विरुद्ध अभियान पार्टी में लंबे अरसे से चल रही खींचतान और वैचारिक दिशाहीनता का एक तरह से चरम था। अब वह पार्टी में कुछ नेताओं की नापसंदगी और अपने खिलाफ चले अभियान के बावजूद दोबारा अध्यक्ष की कमान संभालें, तो कोई अचंभा नहीं। लेकिन क्या पार्टी के आला नेता उनकी अगुआई में फिर से काम करने को राजी होंगे?

प्रधानमंत्री पद पर जबानी लड़ाई और दुरभिसंधियां अपनी जगह, लेकिन गुजरात की जीत नरेंद्र मोदी को पार्टी में उनकी कार्यशैली को लेकर गाहे-बगाहे उठती आशंकाओं तथा जनता दल (यू) जैसे सहयोगियों के घोषित विरोध के बावजूद अगली कतार में तो ले ही आएगी। आखिर मौन हिंदुत्व के साथ विकास और सद्भावना के जरिये सांप्रदायिक अमन-चैन का उनका ताजा फॉर्मूला दोस्तों-दुश्मनों, दोनों को रास आता है और युवा भारत को लुभा रहा है।

परंतु पार्टी-गठबंधन में किचकिच से बचने के लिए लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री पद पर निर्णय लेने के भाजपा-एनडीए नेताओं के बयानों का तब कोई मतलब नहीं रह जाएगा, जब कांग्रेस राहुल गांधी को नेता घोषित कर देगी।

युवा भारत के सामने बुजुर्ग के बजाय कारगर मध्यवयीन नेता को प्रधानमंत्री के प्रत्याशी के तौर पर पेश करने का विचार नुकसानदेह तो कतई नहीं है। पर भाजपा को ऊपर से अपना घर दुरुस्त करने की कवायद पहले करनी होगी। ‘नेशन फर्स्ट, पार्टी नेक्स्ट, सेल्फ लास्ट’ क्या महज बेवसाइट पर झलकाने के लिए ही है? पार्टी के शुभचिंतक उसे सलाह ही दे सकते हैं, अपनी रिसती छत का जीर्णोद्धार तो पार्टी को ही करना होगा।
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