प्रथम राष्ट्रीय जलमार्ग के उद्घाटन के अवसर पर हल्दिया से वाराणसी तक सोलह कंटेनरों को लाने वाला जहाज इतिहास के उन धूमिल हो चुके पृष्ठों को खोल गया है, जिनमें 19 वीं सदी के उत्तरार्ध में रेलपथ और गंगा के जलमार्ग की गैर बराबरी की दौड़ का विवरण दर्ज था। इस दौड़ में हारकर गंगा के उत्तरी तट पर बसा पूर्वांचल अपनी समृद्धि से हाथ धो बैठा। गाजीपुर जैसा समृद्ध शहर पूर्वांचल के पिछड़ेपन का नमूना कैसे बन गया, यह समझने के लिए डेढ़-दो शताब्दी पीछे जाना होगा, जब कोलकाता ईस्ट इंडिया कंपनी के व्यापार का एक समृद्ध केंद्र था। गंगा के चौड़े पाट में तैरते बड़े-बड़े स्टीमर और बजरे कोलकाता की नवोन्मेषी समृद्धि को पटना, वाराणसी और प्रयाग से जोड़ते थे। इन दोनों छोरों के बीच स्थित गाजीपुर नदीमार्ग से आए माल को सड़क मार्ग से उत्तरी बिहार और नेपाल पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण केंद्र था। गाजीपुर स्वयं गुलाबजल, केवड़ा जल और गुलाब, चमेली के अतर आदि के उत्पादन के लिए विख्यात था। वहां के खेतों में उपजे पोस्ते से अफीम बनाकर उसे कोलकाता से समुद्री मार्ग द्वारा चीन के बाजारों तक पहुंचाने की सुविधा के लिहाज से अंग्रजों ने वहां अफीम की कोठी स्थापित की। अमिताव घोष के सी ऑफ पोपीज में तो इसका बेहतरीन विवरण है ही, रुडयार्ड किपलिंग ने अफीम की कोठी के कार्यकलाप को देखकर इसका विस्तृत विवरण 1888 में द पायोनियर में दिया था। हालांकि उसके बाईस साल पहले 1866 में जब ईस्ट इंडिया रेलवे (ईआईआर) ने दिल्ली में यमुना रेल पुल का निर्माण कर कोलकाता को दिल्ली से रेलपथ से जोड़ा, तभी गंगा में स्टीमरों द्वारा माल ढुलाई की मौत की घंटी बज चुकी थी। देखते-देखते साहिबगंज-मुगलसराय होकर हावड़ा से दिल्ली जाने वाली रेलगाड़ियों ने गाजीपुर की समृद्धि में पलीता लगा दिया। कुछ ही वर्षों में नई रेल लाइन की गति और हर मौसम में सुलभता ने गंगा के जलपथ को वीरान कर दिया। लगता है, गाजीपुर की संपन्नता की डूबती नाव को देख ही रवींद्रनाथ के मन में अपने उस उपन्यास का नाम नौकाडूबी कौंधा, जो उन्होंने गाजीपुर में गंगा के तट पर रहकर लिखा था।