चौदह नवंबर को फिर चाचा नेहरू की याद आएगी। यह बताया जाएगा कि नेहरू जी बच्चों को कितना प्यार करते थे। स्कूलों में बाल दिवस के कार्यक्रम होंगे। कुछ भाषण भी। बचपन से यह देख रही हूं। मेरे बच्चों ने भी यह देखा होगा और उनके बच्चे भी शायद ऐसा ही देखेंगे। यह हम सबकी कहानी है। हाल ही में युनिसेफ ने बताया कि कुपोषण के कारण भारत में 69 प्रतिशत बच्चे पांच साल की उम्र से पहले ही मर जाते हैं। बड़ी संख्या में लड़कियां खून की कमी का शिकार बनती हैं। एक तरफ बच्चों में मोटापे की महामारी फैल रही है। इसके कारण बच्चों में हाइपर टेंशन, गुर्दे की बीमारियां, मधुमेह आदि जगह बना रही हैं। दूसरी तरफ अधिसंख्य बच्चे ऐसे हैं, जो पर्याप्त भोजन के अभाव में दम तोड़ रहे हैं। एक तरफ इतने साधन, दूसरी तरफ इतनी साधनहीनता।
यदि इन तमाम संकटों के बावजूद बच्चे किसी तरह जी लें, तो अपराध उनका पीछा नहीं छोड़ते। चाइल्ट राइट्स ऐंड यू संगठन ने हाल में कहा था कि 2017 में रोज 350 बच्चों के साथ अपराध हुए। सबसे ज्यादा अपराध उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में हुए। पिछले एक दशक में बच्चों के साथ अपराध 1.8 प्रतिशत से बढ़कर 28.9 फीसदी हो गए हैं। कुपोषण का शिकार हों या अपराधों का, बच्चे किसी भी आपदा को सबसे पहले झेलते हैं। गरीबी और साधनहीनता की मार सबसे पहले इन्हीं पर पड़ती है। साधन संपन्न और साधनहीन के बीच इतना बड़ा फासला क्यों है और यह कैसे दूर हो सकता है? सरकार की बहुत-सी योजनाएं बच्चों के लिए बनाई जाती हैं, पर वे उन तक नहीं पहुंच पातीं। कुपोषण रोकने के लिए मिड डे मील योजना है, पर यह भी अक्सर भ्रष्ट्राचार का शिकार हो जाती है। इसके बारे में एक परिचित लड़की ने बताया था कि जब वह मध्य प्रदेश के एक स्कूल में इसकी जांच करने गई, तो देखा कि एक ड्रम पानी में एक कुकर दाल मिला दी जाती थी। हाल ही में ये खबरें भी आई थीं कि इस योजना के अंतर्गत कैसे नमक के साथ रोटी परोसी जा रही थी। एक जगह दाल के नाम पर हल्दी मिला पानी परोसा जा रहा था।
इन दिनों बहुत से स्वयंसेवी समूह साधन संपन्न लोगों से मांग करते रहते हैं कि वे अपनी खुशहाल दुनिया से निकलकर कुछ देर उन बच्चों के बारे में भी सोचें, जिनके पास जीने के मामूली उपाय भी नहीं हैं। कई बार ये संगठन अमीरों से लेकर गरीबों में बांटने की जुगत भी भिड़ाते रहते हैं। इस तरह के प्रयोग कुछ देर के लिए राहत तो दे सकते हैं, कुछ गरीब बच्चों की मदद भी कर सकते हैं, पर इससे तस्वीर बहुत अधिक नहीं बदलती। बच्चों की स्थिति बदले, इसके लिए साझा प्रयास की दरकार है। सबसे पहले तो नीति नियामकों को बच्चों के बारे में सोचना चाहिए। बच्चे तो नेताओं को चुनाव को वक्त भी याद नहीं आते, क्योंकि वे वोटर नहीं होते। इसीलिए वे न किसी दल के घोषणापत्र का हिस्सा बनते हैं, न चुनावी सभाओं में उनसे वायदे किए जाते हैं। इसीलिए उनके हित की बात अक्सर पृष्ठभूमि में रहती है।
कायदे से तो माता-पिता को वोट मांगने आए दलों और उनके नेताओं से पूछना चाहिए कि वे उनके बच्चों के लिए क्या करेंगे, क्योंकि हर माता-पिता का सपना अपने बच्चे को सुरक्षित भविष्य देना होता है। हमारे नीति नियंता अगर चाहें, तो बच्चों को ऐसा वातावरण दे सकते हैं, जहां वे आराम से पढ़-लिख सकें और बड़े होकर देश के लिए भी कुछ कर सकें। कोई बच्चा न कुपोषण का शिकार हो, न अपराध का।