उधर अमेरिका बंद है जी और इधर आंध्र प्रदेश के कई इलाके भी बंद जैसी स्थिति से उबर नहीं पाए हैं। इसका अर्थ यह कतई नहीं कि हम अमेरिका हो गए हैं। हालांकि कोशिश हमारी पूरी है अमेरिका होने की। करत-करत अभ्यास के एक न एक दिन हो ही जाएंगे। पर तब तक यह नहीं कहा जा सकता कि हम अमेरिका हो गए हैं, क्योंकि हममें अब भी हिंदुस्तानी संस्कार जड़ें जमाए बैठा है।
फिर यह भी नहीं कह सकते कि कम से कम आंध्र प्रदेश ने ही अमेरिका की बराबरी कर ली है। हालांकि एक जमाना था, जब हैदराबाद की तुलना सिलिकॉन वैली से की जाने लगी थी। तब आंध्र को अमेरिका बनने का ऐसा शौक लगा था कि राज्य के मुख्यमंत्री अपने को सीईओ कहलाना पसंद करते थे। उसके बाद उनका राज ऐसा गया कि आज तक ढूंढते फिर रहे हैं। ढूंढते-ढूंढते इधर वह दिल्ली भी चले आए थे, पर वहां से जबरन वापस भेज दिए गए।
खैर जी, अब इस मामले में तो बराबरी जरूर है कि उधर अमेरिका बंद है, इधर आंध्र प्रदेश में पिछले एक पखवाड़े से कोहराम मचा हुआ है। अमेरिका खुशी-खुशी बंद है। ओबामा प्रशासन ने अपने कर्मचारियों को कह दिया है कि भैया, घर जाओ, आराम करो, ऐश करो। अभी अमेरिका के पास पैसा नहीं है, सो देखो, हमारे पास तुम्हें देने के लिए पैसा तो है नहीं। इसलिए अच्छा है, तब तक तुम ऐश करो। जब हमारे पास पैसा होगा, हम तुम्हें बुला लेंगे। बिना पैसे के ऐश करना ओबामा जी ने अमेरिका को सिखा दिया है।
पर आंध्र में बंद जैसे हालात की वजह दूसरी है। जगनमोहन रेड्डी तेलंगाना बनने की घोषणा से नाराज हैं, चंद्रबाबू नायडु यह बता ही नहीं रहे कि वह क्यों नाराज हैं। बताते हैं कि वह न तेलंगाना वालों को नाराज करना चाहते हैं और न सीमांध्र वालों को। पर यह जरूर दिखा रहे हैं कि वह नाराज हैं।
कांग्रेस के सांसद और विधायक अपनी ही पार्टी से नाराज हैं। सीमांध्र क्षेत्र के कर्मचारी तेलंगाना बनने से नाराज हैं। उससे पहले तेलंगाना क्षेत्र के लोग इसलिए नाराज थे कि सरकार तेलंगाना नहीं बना रही। पहले तेलंगानावाले नाराज थे, तो सीमांध्र वाले खुश थे। अब सीमांध्र वाले नाराज हैं, तो तेलंगाना वाले खुश हैं। पर हैदराबाद वाले न इनसे खुश हैं और न उनसे। लेकिन चूंकि उधर अमेरिका भी बंद है, ऐसे में तो कम से कम बंद के मामले में हमें अमेरिका से बराबरी करने का मौका मिल रहा है।