एक धनिक सेठ भगवान बुद्ध के पास पहुंचा। उसने हाथ जोड़कर कहा, महाराज, मैं आत्मज्ञान प्राप्त करने के लिए साधना का प्रयास करता हूं, परंतु मेरा मन ध्यान में एकाग्र नहीं हो पाता। भगवान बुद्ध ने कहा, मैं कल तुम्हारे घर आ रहा हूं। वहीं ज्ञान प्राप्ति का सरल साधन बताऊंगा। सेठ यह सुनकर गद्गद हो उठा। घर पहुंचते ही पत्नी को आदेश दिया, भगवान बुद्ध के लिए स्वादिष्ट खीर बनाना। यह हमारा सौभाग्य है कि तथागत हमारे निवास स्थान पर पधार रहे हैं।
भगवान बुद्ध कमंडल लिए अगले दिन सेठ के यहां जा पहुंचे। पूरे परिवार ने श्रद्धा भावना से उनका हार्दिक स्वागत किया। कुछ ही देर बाद पत्नी सोने की थाली में खीर परोस कर वहां ले आई। सेठ ने हाथ जोड़कर तथागत से खीर ग्रहण करने की प्रार्थना की। तथागत ने सेठ के सामने कमंडल रखकर कहा, खीर इसमें डाल दो।
सेठ ने देखा कि कमंडल में गोबर भरा हुआ है। यह देखकर वह बोला, भगवन, गोबर भरे कमंडल में खीर डालने से तो खीर खराब हो जाएगी। तथागत यह सुनकर बोले, वत्स, तुम ठीक कहते हो। सबसे पहले पात्रता विकसित करो, तभी तो आत्मज्ञान के योग्य बन पाओगे। यदि मन-मस्तिष्क में विकार तथा कुसंस्कार भरे हैं, तो वे आत्मज्ञान को आत्मसात कैसे कर पाएंगे? सेठ जी ने उसी समय संकल्प ले लिया कि वह शुद्ध आचरण तथा परोपकार के जरिये सबसे पहले सुपात्र बनेंगे, ताकि उन्हें आत्मज्ञान सहजता से प्राप्त हो सके।