दक्षिण चीन सागर की विशालता और इससे कई महत्वपूर्ण देशों के हित जुड़े होने की वजह से उस क्षेत्र में स्थिति काफी तनावपूर्ण है, जिसमें एक तरफ चीन है, तो दूसरी तरफ ब्रुनई, ताइवान, वियतनाम, मलयेशिया और फिलीपींस जैसे देश हैं। यह विवाद केवल स्प्रैटली और पारासेल द्वीप समूह को लेकर नहीं है, जैसा कि हम समझते हैं। इन दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के द्वीप एवं समुद्री दावों से जुड़े कई विवाद हैं, जिनमें हर विवाद के साथ अलग-अलग देशों के हित जुड़े हैं। लेकिन विवाद का मूल मुद्दा नाइन डैश लाइन क्षेत्र है, जिस पर चीन अपना दावा जताता है, जो दक्षिण चीन सागर के ज्यादातर हिस्सों तक फैला है और चीन ऊपर वर्णित देशों के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र पर आक्रामक तरीके से दावा जताता है। चीन की बयानबाजी से दक्षिण चीन सागर के समुद्री मार्गों पर नियंत्रण करने की उसकी मंशा का पता चलता है। हेग स्थित पर्मानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (पीसीए) की पूरी सुनवाई के दौरान चीनी शासन लगातार मीडिया में उस प्रक्रिया के खिलाफ बयानबाजी करता रहा, जबकि उसमें सार्वजनिक रूप से भागीदारी करने से बचता रहा।
वैश्विक व्यवस्था में राष्ट्रों के बीच संप्रभुता विवाद में इतिहास हमेशा एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। खुद इस विवाद का हिस्सा होने के बावजूद दक्षिण चीन सागर के विवाद में फिलीपींस के शासन द्वारा पीसीए के जरिये मध्यस्थता की तलाश की पहल तार्किक थी। पीसीए का गठन संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि के अनुबंध VII के तहत किया गया था।
यह उम्मीद थी कि चीन के दावे से उपजे सभी विवादों का एक वैधानिक ढांचे के तहत निपटारा हो जाएगा। बीती जुलाई में पीसीए ने चीन के सभी दावों के खिलाफ अपना फैसला सुनाया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन के दावे के 'ऐतिहासिक तथ्यों' को सिरे से खारिज कर दिया गया। चीन ने इस फैसले की वैधानिकता को स्वीकार करने से इन्कार करते हुए इसे खारिज कर दिया और दावा किया कि विवाद का कोई भी समाधान दावेदारों के द्विपक्षीय वार्ता से होना चाहिए। विश्लेषक चीन के इस रवैये को उसकी 'दादागीरी' के रूप में देख रहे हैं।
दक्षिण चीन सागर के समुद्री मार्ग का उपयोग करने वाले भारत समेत सभी राष्ट्र चाहते हैं कि दक्षिण चीन सागर अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र बना रहे। ये सभी देश अमेरिका के साथ इस वैचारिक धारणा के आधार पर अभियान चला रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में नौवहन की स्वतंत्रता होनी चाहिए, जैसा कि संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि में कहा गया है, हालांकि अमेरिका ने इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं किया है।
इस क्षेत्र में भारतीय हितों को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से चीन स्पष्टतः और जानबूझकर इस तरह का आक्रामक तेवर दिखा रहा है। ऐसी खबरें हैं कि भारतीय नौसेना का एक जहाज आईएनएस ऐरावत जब दोस्ताना यात्रा के तहत वियतनाम जा रहा था, तो बताया गया कि वह चीन की समुद्री सीमा में चला गया। यह घटना 22 जुलाई, 2011 की है, जब भारतीय जहाज वियतनाम के तट से करीब 80 किलोमीटर दूर था। जब सूत्रों से संपर्क किया गया, तो उसने पहचाना कि वह चीन की नौसेना का ही जहाज था। हालांकि वहां नौसैनिक पोत को किसी तरह के टकराव का सामना नहीं करना पड़ा, लेकिन इससे अंतरराष्ट्रीय समुद्री क्षेत्र में जाने के अधिकार और नौवहन की स्वतंत्रता को चीन द्वारा बाधित किए जाने का पता चलता है।
उसके कुछ समय बाद सितंबर, 2011 में चीन और वियतनाम ने दक्षिण चीन सागर पर विवाद खत्म करने के लिए एक संधि पर हस्ताक्षर किए। भारत की विदेशों में तेल अन्वेषण शाखा 'ओएनजीसी विदेश लिमिटेड' ने वियतनाम की कंपनी 'पेट्रो वियतनाम' के साथ दक्षिण चीन सागर के कुछ क्षेत्रों में तेल की खोज के लिए तीन वर्षों का अनुबंध किया। इस वैध करार पर चीन ने बहुत मनहूस प्रतिक्रिया व्यक्त की, जब उसके विदेश मंत्रालय ने कहा कि 'दक्षिण चीन सागर और उसके द्वीपों पर चीन की निर्विवाद संप्रभुता है। चीन का यह दावा ऐतिहासिक तथ्यों और अंतरराष्ट्रीय कानून पर आधारित है। चीन की सरकार लंबे समय से दक्षिण चीन सागर पर अपना अधिकार जताती रही है। हम चीन के अधिकार क्षेत्र के भीतर आने वाली समुद्री सीमा में किसी भी देश की विकास गतिविधियों और तेल व गैस अन्वेषण का विरोध करते हैं। हम उम्मीद करते हैं कि कोई भी देश दक्षिण चीन सागर के विवाद में शामिल नहीं होगा।'
और बीते आठ अगस्त को चीन सरकार द्वारा प्रकाशित एक दैनिक अखबार ने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी कि चीनी विदेश मंत्री वांग यी की नई दिल्ली यात्रा के दौरान भारत को दक्षिण चीन सागर के विवाद में अनावश्यक रूप से उलझने से बचना चाहिए, ताकि दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित करने का यह दूसरा कारण न बने। पीसीए द्वारा सुनाए गए फैसले के तुरंत बाद दी गई यह चेतावनी स्पष्ट रूप से दक्षिण चीन सागर पर वैध भारतीय नजरिये को नियंत्रित करने की कोशिश के रूप में देखा गया। यानी इसी बात पर दोनों देशों के बीच सीमा विवाद सुलझाने की प्रगति निर्भर है।
ताजा खबरों के मुताबिक, पूरे सीमावर्ती इलाकों में चीन द्वारा सैन्य ढांचागत विकास और उन्नत एसयू 30 एमकेआई लड़ाकू विमानों के संचालन के लिए सुविधाओं के विकास को देखते हुए अरुणाचल प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्र में उन्नत उड्डयन ढांचा विकसित करने के अलावा भारत के पास कोई विकल्प नहीं बचा था। हालांकि अरुणाचल पर भारत का विधिसम्मत और वास्तविक नियंत्रण है, लेकिन समय-समय पर चीन अरुणाचल की संप्रभुता का राग अलाप कर इस क्षेत्र में सीमा का उल्लंघन करता रहता है।
चीनी मंत्री की नई दिल्ली यात्रा के दौरान उनके साथ आए अधिकारियों ने भारत को लालच देने की कोशिश करते हुए कहा कि परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में भारत के लिए द्वार अब भी खुले हैं। यह एक ऐसा विषय है, जिसका हमारे देश के लिए काफी महत्व है।
-लेखक सामरिक मामलों के जानकार हैं