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सरकार का आधार

विराग गुप्ता
Updated Thu, 27 Sep 2018 06:50 PM IST
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आधार

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ द्वारा अल्पमत के फैसले में आधार की आलोचना के बावजूद चार-एक के बहुमत के फैसले से सरकार के हाथ मजबूत हुए हैं। सर्वोच्च न्यायालय के पुराने फैसले आज भी नजीर माने जाते हैं। आधार मामले में छह साल की सुनवाई के बाद 1,448 पेज के भारी-भरकम फैसले से यदि उलझनंे बढ़ जाएं, तो यह न्यायपालिका के लिए आत्मचिंतन का अवसर भी होना चाहिए। मनी बिल के तौर पर पारित कानून को मान्यता देने के साथ सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आधार से निजता के अधिकार का हनन नहीं होता। फैसले में यह भी कहा गया कि आधार की व्यवस्था को सरकार की निगरानी नहीं कहा जा सकता। देश में लगभग 36 करोड़ पैन कार्ड हैं, जिन्हें इस फैसले के बाद आधार के साथ जोड़ना अब जरूरी हो गया है। बैंक खातों, बीमा और अन्य वित्तीय लेन-देन में पैन नंबर का इस्तेमाल जरूरी होने से मध्यवर्ग और अमीरों के लिए पिछले दरवाजे से आधार की अनिवार्यता बनी रहेगी। सरकारी योजनाओं और सब्सिडी के लिए आधार जरूरी रहने से निचले वर्ग की अधिकांश आबादी आधार के दायरे में रहेगी। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद आधार न होने के बावजूद गरीबों को सरकारी योजनाओं से महरूम नहीं किया जा सकता, तो फिर आधार की अनिवार्यता पर उलझनें क्यों नहीं बढ़ेंगी? 



फैसले के अनेक पहलुओं से साफ है कि आधार के लिए यूनिक सिस्टम बनाने में सरकारें सफल नहीं रहीं। यूपीए सरकार ने 2006 में आधार योजना को आईटी मंत्रालय के तहत शुरू करने के बाद 2009 में यूआईडीएआई संस्था बनाकर उसे योजना आयोग के हवाले कर दिया। एनडीए सरकार ने राज्यसभा में बहुमत न होने की वजह से आधार कानून को मनी बिल के तौर पर पारित कराने की जुगत भिड़ाई, जिसे न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने संविधान के साथ धोखाधड़ी कहा है। इन आलोचनाओं के बावजूद, बहुमत के फैसले से सुप्रीम कोर्ट ने आधार को विशिष्ट पहचान माना है, जो सरकार के लिए राहत की बात है।


टेलीकॉम समेत सभी निजी कंपनियों द्वारा आधार डाटा के इस्तेमाल पर रोक से आधार के खतरनाक विस्तार पर इस फैसले के बाद लगाम लगेगी। सरकार द्वारा एकत्रित डाटा की सुरक्षा के लिए यूआईडीएआई को जवाबदेह बनाने के साथ इस फैसले में पीड़ित व्यक्तियों को भी शिकायत निवारण के लिए कानूनी अधिकार दिए गए हैं। केंद्र सरकार की तर्ज पर निजी कंपनियां और फिर राज्य सरकारें भी आधार के माध्यम से डाटा इकट्ठा करने के खेल में शामिल हुईं, जिससे यह योजना संकट की शिकार हुई। दिल्ली में केजरीवाल सरकार ने स्कूली बच्चों के डाटा इकट्ठा करने की शुरुआत की, जिसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत छह से 14 साल के बच्चों को शिक्षा के मौलिक अधिकार के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद स्कूलों में आधार की अनिवार्यता समाप्त हो गई है। बालिग होने पर बच्चों को आधार की व्यवस्था से बाहर निकलने का विकल्प भी शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में दिया है। इससे साफ है कि सैद्धांतिक तौर पर अब आधार लेना जरूरी नहीं है।


आधार जैसे मामलों में निजता और डाटा सुरक्षा के मुद्दों पर रिटायर्ड जज एपी शाह समिति द्वारा 2012 में पेश की गई रिपोर्ट के बावजूद पूर्ववर्ती यूपीए सरकार कानून बनाने में विफल रही। डिजिटल इंडिया के दौर में आधार, डिजिटल बैंकिंग, ई-कॉमर्स और सोशल मीडिया से बड़े पैमाने पर डाटा सुरक्षा की चुनौती खड़ी हुई है। सर्वोच्च न्यायालय की नौ जजों की पीठ ने निजता के अपने फैसले में डाटा को बहुमूल्य बताते हुए इसकी सुरक्षा के लिए कानून बनाने के निर्देश दिए थे। सरकार ने न्यायमूर्ति श्रीकृष्णा की नई समिति बना दी, पर उसकी विस्तृत रिपोर्ट के बावजूद अभी तक कानून नहीं बना। कानूनी व्यवस्था न होने से जनता में असमंजस होने के साथ यूआईडीएआई और ट्राई जैसे नियामकों की कार्य प्रणाली में अराजकता की स्थिति बढ़ रही है, जिसका निजी कंपनियों द्वारा बेजा फायदा उठाया जा रहा है। बैंक और टेलीकॉम कंपनियों समेत अनेक संस्थाओं द्वारा आधार का जो डाटा इकट्ठा किया जा चुका है, उसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद डिलीट करना भी बड़ी चुनौती है। क्या इसके लिए व्यक्तिगत आवेदन करने होंगे या सरकार इसकी पहल करेगी, इसका फैसला आने वाले समय में होगा।


शुरुआती दौर में आधार को राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर से जोड़ने की योजना थी। लेकिन बाद में देश में रहने वाले सभी लोगों को आधार नंबर से जोड़ने की योजना बना दी गई। फैसले के अनुसार, घुसपैठियों और विदेशी शरणार्थियों को आधार नंबर नहीं दिया जा सकता, जिससे इस योजना के क्रियान्वयन पर अनेक सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। गृह मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, देश में करोड़ों घुसपैठिये मौजूद हैं, जिन्हें यदि आधार नंबर मिल गया हो, तो फिर उसकी पड़ताल और वापसी कैसे होगी? सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर विदेशी घुसपैठियों की पड़ताल के लिए असम में लागू राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर या एनआरसी की व्यवस्था से पहले ही अनेक विवाद हैं। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद नागरिकता की दोबारा पड़ताल यदि हुई, तो चुनावों से पहले राजनीतिक विवादों का नया दौर फिर शुरू हो सकता है। सवाल यह है कि हजारों करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद पहचान और नागरिकता को साबित करने के लिए अधिकृत कार्ड की व्यवस्था को हमारी अफसरशाही अब तक क्यों नहीं विकसित कर पाई।


आधार की पुख्ता व्यवस्था पर सवाल उठाने वाले लोग भी इसकी उपयोगिता से सहमत हैं। लेकिन आधार योजना से 90 हजार करोड़ की बचत होने का दावा और इसे हर मर्ज की दवा बताना भी मिथ्या ही माना जाएगा। सरकारी दावों को यदि सही माना जाए, तो फिर बड़ा सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर पकड़े गए भ्रष्टाचार के मामलों में सभी आरोपियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई क्यों नहीं हुई। निराधार योजनाओं से आधार की अनिवार्यता खत्म करने के साथ इसे सिस्टम का ठोस आधार यदि मिल सके, तभी शीर्ष अदालत का यह फैसला विशिष्ट साबित होगा।

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