परीक्षा करीब आते देख मां-बाप पढ़ाई करने के लिए हमेशा डांटते रहते थे। यह वह दौर था, जब कहा जाता था कि पढ़ोगे-लिखोगे बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदोगे होगे खराब। ऐसे में, अक्सर ईश्वर से गुहार लगाते थे कि हे भगवान, वह दिन कब आएगा, जब हमारा भी वसंत होगा! जब मैंने एमए की परीक्षा दी, तब जान में जान आई कि अब परीक्षा का कोई भय नहीं रहा, अब वसंत मनाऊंगा।
लेकिन उसी बीच छात्र जीवन में ही हमने केदारनाथ अग्रवाल की एक कविता पढ़ी थी-वसंती हवा। वह कविता पढ़ने में इतनी अच्छी लगती थी कि वसंत के प्रति मन में एक तरह का अनुराग उत्पन्न हो गया था।
हवा हूं हवा मैं, वसंती हवा हूं से शुरू होकर यह कविता-
चढ़ी पेड़ महुआ
थपाथप मचाया;
गिरी धम्म से फिर,
चढ़ी आम ऊपर,
उसे भी झकोरा,
किया कान में 'कू',
उतरकर भगी मैं,
हरे खेत पहुंची -
वहां, गेहुंओं में
लहर खूब मारी
से होते हुए आखिर में-
मुझे देखते ही
अरहरी लजाई,
मनाया-बनाया,
न मानी, न मानी;
उसे भी न छोड़ा - पथिक आ रहा था,
उसी पर ढकेला;
हंसी ज़ोर से मैं,
हंसी सब दिशाएं,
हंसे लहलहाते
हरे खेत सारे,
हंसी चमचमाती
भरी धूप प्यारी;
बसंती हवा में
हंसी सृष्टि सारी!
हवा हूं, हवा मैं/बसंती हवा हूं!
पर खत्म होती है।
इस विलक्षण कविता की संरचना इतनी अनूठी है, कि इसमें गांव की एक अल्हड़ लड़की, जो अपने सौंदर्य के प्रति असावधान है, का रूपक बनकर वसंत ऋतु के प्राकृतिक सौंदर्य को प्रकट करती है। यह कविता परीक्षा के बुखार के दिनों में भी हमें एक अजीब उल्लास से भर देती थी और खिलखिलाकर हंसने पर विवश कर देती थी।
वसंत पंचमी महाकवि निराला की जयंती भी है। निराला अपना जन्मदिन वसंत पंचमी को ही मनाते थे। अपनी एक प्रसिद्ध कविता 'हिंदी के सुमनों के प्रति' में वह कहते हैं- मैं ही वसंत का अग्रदूत। देवी सरस्वती का संबंध भी वसंत पंचमी से है। हालांकि वसंत का संबंध कामदेव से भी है। कहा जाता है कि जिस दिन वसंत पृथ्वी पर अवतरित होता है, उसे वसंतावतार का दिन कहा जाता है और इसी दिन प्राचीन भारत में 'सुवसंतक' नामक उत्सव मनाया जाता था। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने लिखा है कि 'इसी दिन मदन देवता की पहली पूजा विहित है। अच्छा तमाशा है-जन्म हो वसंत का और उत्सव मदन देवता का।'
खैर, हमारे देश में जितने भी पर्व-त्योहार मनाए जाते हैं, उनका संबंध प्रकृति से और कृषि संस्कृति से जुड़ा हुआ है। उत्तर भारत के कई इलाकों में किसान इस दिन श्रीपंचमी का उत्सव मनाते हैं, जिसमें हल की पूजा की जाती है। धरती का असली शृंगार तो फसलों से ही होता है। कालिदास ने फसलों को कृषिफल कहा है। वसंत के मौसम में ही गेहूं की बालियां परिपक्व होकर
पकने लगती हैं।
इसके अलावा, भूवैज्ञानिक भी कहते हैं कि घोर शीत ऋतु के बाद वसंत ऋतु में भूमध्य रेखा ठीक सूर्य के सामने आ जाती है। सूर्य की ऊर्जा, सूर्य का प्रकाश और उसकी ऊष्मा पृथ्वी पर सीधे पहुंचने लगती है। इस ऋतु में शीत तो दूर होती ही है, सूर्य की ऊष्मा पाकर पृथ्वी भी जग जाती है। उसकी चेतना जाग उठती है।
जब पृथ्वी यानी प्रकृति जगती है, तो पुरुष भी जगता है, समाज भी जगता है, उसकी इच्छाएं, भावनाएं जगती हैं। उसमें विवेक और काम भावना का संचार होता है। इस तरह से सूर्य और प्रकृति का जो संयोग है, वह प्रकृति पर तो असर डालता ही है, मनुष्य और उसके समाज पर भी उसका असर होता है। पेड़, पौधे, नदियां, पर्वत, मनुष्य, समाज सब की चेतना जाग जाती है। वसंत ऋतु में सिर्फ मनुष्यों की इच्छाएं ही नहीं जागतीं, बल्कि प्रकृति भी इच्छाओं और कामनाओं से भर उठती हैं। वसंत ऋतु में तरह-तरह के फूलों का खिलना प्रकृति की इन्हीं कामनाओं का प्रतीक है। हरे-भरे खेतों में सरसों के पीले फूल प्रकृति की सुषमा में चार चांद लगा देते हैं। इस तरह से वसंत ऋतु सृष्टि के सृजन और विकास को गति देती है। महाकवि निराला ने तो लिखा ही है-रंग गई पग-पग धन्य धरा/ हुई जग जगमग मनोहरा।
कहा जाता है कि वसंत में मन-प्राण खिल उठते हैं। हम लोग बचपन में देखते थे कि वसंत पंचमी के दिन से ही लोग एक-दूसरे को अबीर लगाना शुरू कर देते थे और सामूहिक रूप से होली गाई जाने लगती थी। वसंत के दौरान पूरे गांव-समाज में सामूहिकता की भावना व्याप्त दिखती थी। लेकिन आज सामूहिकता की वह भावना लगभग खत्म होती जा रही है। लोग आत्मकेंद्रित ज्यादा हो चले हैं और अपनी-अपनी दुनिया में सीमित होकर रहने लगे हैं। कहने को तो स्मार्टफोन और इंटरनेट के माध्यम से हम दुनिया में कहीं भी पल भर में संवाद कर सकते हैं, लेकिन अपने आस-पास से कटकर हम अकेले हो चले हैं।
प्रौद्योगिकी के विकास ने हमारे लिए अवसरों के अनेक द्वार तो खोले हैं, लेकिन हमारे सामने एक नया संकट भी खड़ा कर दिया है और वह संकट है-इकहरेपन का संकट। हम आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन अपनी जड़ों से कटते भी जा रहे हैं। माखनलाल चतुर्वेदी की पंक्ति है-आह दबाओ यूं न समय की चट्टानों के नीचे-नीचे। हमारे देखते-देखते भाषा के कितने शब्द लुप्त हो गए। हम अपनी समृद्ध और सकारात्मक परंपरा को भूलते जा रहे हैं। परंपरा इकहरी नहीं होती, वह हमेशा समृद्ध और बहुलतावादी होती है। इकहरापन रचना की भी सबसे बड़ी कमजोरी होती है। चाहे संस्कृति के क्षेत्र में हो या राजनीति के क्षेत्र में, इकहरापन कभी सफल नहीं हो सकता। वसंत पंचमी के दिन हम इन सब चीजों पर जितना चिंतन करेंगे, उतना संभलेंगे। और संभलने का सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि यह आत्म सेवा के साथ समाज सेवा और देश सेवा भी है, क्योंकि जो खुद संभलेगा, वही तो दूसरों को संभाल सकता है।