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बांग्लादेश: इस्कॉन संत की गिरफ्तारी बहाना है... मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार को ध्यान भटकाने में मदद मिलेगी

सुबीर भौमिक
Updated Mon, 02 Dec 2024 07:38 AM IST

सार

इस्कॉन संत ने मुल्क के हिंदुओं को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सरकार को पता था कि संत की गिरफ्तारी से नाराज हिंदू प्रदर्शन करेंगे और छात्र समूहों के मुखौटे के पीछे छिपे कट्टरपंथी उनका विरोध करेंगे। इससे सरकार को महंगाई और अव्यवस्था से लोगों का ध्यान भटकाने में मदद मिलेगी।
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बांग्लादेश की आम जनता और सुरक्षाबलों का टकराव (फाइल) - फोटो : अमर उजाला / एजेंसी


इस्कॉन संत ने मुल्क के हिंदुओं को संगठित एवं एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, इसलिए यूनुस की मंडली को पता था कि संत चिन्मय की गिरफ्तारी से नाराज हिंदू जमकर विरोध-प्रदर्शन करेंगे। एक ऐसे मुल्क में, जहां मुस्लिम बहुसंख्यक हैं और कुल आबादी में जिनकी 93 फीसदी की हिस्सेदारी है, वहां हिंदुओं के विरोध प्रदर्शन के खिलाफ प्रतिक्रिया होने की पूरी आशंका है, क्योंकि इस समय छात्र-युवा समूहों के मुखौटे के पीछे इस्लामी कट्टरपंथियों का बोलबाला है। इसलिए जब सरकार जरूरी वस्तुओं की बढ़ती कीमतों को रोकने या कानून-व्यवस्था में गिरावट को नियंत्रित करने में असमर्थ हो, तो अपनी विफलताओं से ध्यान भटकाने के लिए सांप्रदायिक भावनाओं को भड़काने से बेहतर उपाय और क्या हो सकता है!


इस्कॉन संत की गिरफ्तारी के बाद हिंदुओं के विरोध प्रदर्शन और चटगांव में एक मुस्लिम वकील की रहस्यमय परिस्थितियों में हत्या ने यूनुस सरकार के तात्कालिक उद्देश्यों को पूरा कर दिया। अचानक पूरे मुल्क का ध्यान हिंदू विरोध प्रदर्शनों पर चला गया और सोशल मीडिया पर सांप्रदायिक टिप्पणियों ने लोगों का ध्यान अर्थव्यवस्था पर से हटा दिया, जो निरंतर चरमरा रही है। इस्कॉन पर प्रतिबंध लगाने के लिए अदालती याचिकाएं और चिन्मय प्रभु पर मुकदमा चलाने की सरकार की योजनाएं अन्य खबरों को सुर्खियों से दूर रखने में मदद करेंगी।


सांप्रदायिक भावनाएं बढ़ने के साथ ही मुल्क में पहले से कम होती धर्मनिरपेक्ष राजनीति और बंगाली राष्ट्रवादी ताकतों को हाशिये पर धकेल देगी और इस तरह इस्लामी पार्टियों को अपनी स्थिति मजबूत करने में मदद मिलेगी। इन पार्टियों ने पहले ही यूनुस सरकार को मुल्क के भाषायी-धर्मनिरपेक्ष लोकाचार को कम करके मुक्ति संग्राम की विरासत को कमजोर करने के लिए प्रेरित किया है। मुक्ति संग्राम संग्रहालय में भी तोड़फोड़ के साथ महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेजों को नष्ट कर दिया गया है।


यूनुस को घेरने और पश्चिम को नियंत्रित करने के लिए उनका इस्तेमाल करने वाले इन कट्टरपंथी तत्वों ने भारतीय नाराजगी का भी हिसाब लगाया। वे जानते हैं कि चिन्मय की गिरफ्तारी के खिलाफ भारत की सत्तारूढ़ सरकार तीखी प्रतिक्रिया करेगी। भारतीय विदेश मंत्रालय द्वारा चिन्मय की गिरफ्तारी पर कड़ी प्रतिक्रिया की उम्मीद यूनुस सरकार ने इसलिए भी की थी, क्योंकि मोदी सरकार वहां अल्पसंख्यक हिंदुओं के उत्पीड़न के मुद्दे को यूनुस प्रशासन के समक्ष जोरदार तरीके से उठाती रही है। विदेश मंत्रालय के बयान पर यूनुस सरकार की ओर से की गई कड़ी प्रतिक्रिया भारत विरोधी भावनाओं को भड़काने के लिए एक सुनियोजित प्रयास की ओर इशारा करती है।


ऐसा इसलिए हो रहा है, क्योंकि भारत शेख हसीना और उनके कई करीबी सहयोगियों को शरण दे रहा है, जिनमें कुछ पूर्व मंत्री और अवामी लीग पार्टी के नेता शामिल हैं। जब यूनुस या उनकी मंडली में कोई भी अल्पसंख्यक विरोध प्रदर्शनों का उपयोग करके 'निहित स्वार्थों' की बात करता है, तो उनका स्पष्ट मतलब अवामी लीग से होता है। पिछले तीन महीनों में, अवामी लीग को क्रूर प्रतिशोध का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों और कम विश्वसनीय आरोपों पर ढेरों मामलों के बावजूद कुछ वरिष्ठ नेताओं ने जमीनी स्तर पर समर्थकों को एकजुट करने की कोशिश की, जिसे हसीना सरकार के खिलाफ जन-आंदोलन का नेतृत्व करने वाले छात्र-युवा समूहों द्वारा क्रूरता पूर्वक विफल कर दिया गया।


इन समूहों को इस्लामी दलों और उनके कट्टरपंथी कार्यकर्ताओं का समर्थन प्राप्त है। पुलिस अक्सर मूक दर्शक बनकर खड़ी रही है। सेना ने भी ज्यादातर मौकों पर ऐसा ही किया है। यूनुस और उनके साथियों को संदेह है कि अवामी लीग के कार्यकर्ता अल्पसंख्यक उत्पीड़न के मुद्दे पर उनकी सरकार को बदनाम करने के लिए हिंदुओं की रैलियों में शामिल हो सकते हैं। जब इसे अंतरिम प्रशासन द्वारा इस्लामी कट्टरपंथियों को विशेष सहायता देने के साथ जोड़कर देखा जाता है, जिसमें अंदरुल्लाह बांग्ला टीम के प्रमुख जशीमुद्दीन रहमानी जैसे दोषी आतंकवादियों की रिहाई शामिल है, तो यूनुस शासन का असली चेहरा सामने आ जाता है।
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यूनुस भारतीय प्रतिक्रिया को भले ही निराधार बताकर खारिज कर दें, लेकिन जब अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न पर बोलते हैं, तो यूनुस को उन्हें गंभीरता से लेना ही पड़ता है, क्योंकि उनका शासन, केवल पश्चिमी, विशेषकर अमेरिकी समर्थन से ही जीवित रह सकता है।


असल में यूनुस सरकार ब्रिटिश सर्वदलीय संसदीय मंच की एक रिपोर्ट से परेशान है, जिसमें नई अंतरिम सरकार की 'प्रभावकारिता पर सवाल' उठाए गए हैं। उक्त रिपोर्ट में कहा गया है, 'कानून को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की संस्कृति को समाप्त करने और मानवाधिकारों व कानून के शासन को बनाए रखने की आवश्यकता है। इसमें विफलता मोहम्मद यूनुस के नए अंतरिम शासन पर अच्छा प्रभाव नहीं डालेगी।' साथ ही यह भी कहा गया है कि 'हमें सबूत मिले हैं कि अवामी लीग के पूर्व मंत्रियों पर हत्या के आरोप लगाए जा रहे हैं।'


जाहिर है कि, अगर यूनुस सरकार अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न और लोकतंत्र की बहाली के मुद्दे से निपटने में विफल रहती है, तो संदेह का घेरा उस पर और कसेगा।
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