कूटनीतिक मानदंडों से दूर और भारत के साथ घनिष्ठ संबंधों को नजर अंदाज कर अंतरिम सरकार का यह निर्णय बांग्लादेश की विदेश नीति में एक हैरतअंगेज और विवादास्पद बदलाव का प्रतीक है, जिसने इतिहासकारों और रणनीतिकारों, दोनों को चकित कर दिया है। इसका कारण भारत की दोषपूर्ण विदेश नीति को माना जा सकता है, जिसके तहत उसने बेदखल नेता शेख हसीना को संरक्षण दिया, जिनसे उस मुल्क की अन्य राजनीतिक ताकतें अलग-थलग हो गईं। अगले माह पाकिस्तानी सैन्य प्रशिक्षक बांग्लादेश की चार छावनियों में काम करेंगे। बांग्लादेश का यह कदम न केवल अपने इतिहास से धोखा है, बल्कि क्षेत्रीय गतिशीलता में बदलाव का परेशान करने वाला संकेत भी है।
नैतिक और ऐतिहासिक निहितार्थों से परे, यह समझौता विशेष रूप से भारत के लिए महत्वपूर्ण रणनीतिक परिणाम देने वाला है। मोहम्मद यूनुस के इस्लामाबाद से बेहतर रिश्ते बनाने के प्रयास बांग्लादेश और भारत के मजबूत संबंधों को कमजोर करने का खतरा पैदा करते हैं। नई दिल्ली ने बांग्लादेश के विकास में निर्णायक भूमिका निभाई है, जिसके तहत आर्थिक मदद, बुनियादी सहयोग और आतंकवाद से निपटने से लेकर व्यापार तक के मुद्दों पर महत्वपूर्ण सहयोग प्रदान किया है। बांग्लादेशी सेना पर पाकिस्तानी सेना की काली छाया का प्रभाव अपने पूर्वी पड़ोसी देश में स्थिरता बनाए रखने के भारत के प्रयासों के लिए सीधी चुनौती है।
पाकिस्तानी सेना का भारत विरोधी भावनाओं को भड़काने का लंबा इतिहास रहा है। पाकिस्तानी प्रशिक्षकों की बांग्लादेशी सेना तक पहुंच भारत विरोधी विचारधारा की जड़ों को मजबूत करने का काम करेगी। इससे भारत-बांग्लादेश साझा सीमा पर तनाव बढ़ सकता है। भारत, जो बांग्लादेश को अपनी ‘पड़ोसी पहले’ नीति के तहत एक प्रमुख सहयोगी मानता है, अब इस नए तालमेल के संभावित नतीजों को कम करते हुए ढाका के प्रति अपने नजरिये को फिर से संतुलित करने का चुनौतीपूर्ण कार्य कर रहा है।
यह निर्णय बांग्लादेश की घरेलू प्राथमिकताओं और उसके नेतृत्व पर भी सवाल उठाता है। भारत के प्रति सकारात्मक रुख रखने वाली पूर्व प्रधानमंत्री हसीना को बांग्लादेश में आर्थिक विकास और क्षेत्रीय स्थिरता का श्रेय दिया जाता है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इसका उद्देश्य भारत पर कथित अति-निर्भरता को संतुलित करना हो सकता है, जबकि अन्य इसे उन मतदाताओं को संतुष्ट करने के प्रयास के रूप में देखते हैं, जो भारत विरोधी भावनाओं को प्रश्रय देते हैं। इस समझौते के समय से पता चलता है कि राष्ट्रीय चुनाव के मद्देनजर राजनीतिक विचारों की भी इसमें भूमिका होगी।
बांग्लादेश की अंतरिम सरकार द्वारा किए जा रहे पाठ्यपुस्तकों के पुनर्लेखन से भी विवाद खड़ा हो गया है। आलोचकों ने सरकार पर विपक्षी दृष्टिकोण को मिटाने और पक्षपातपूर्ण एजेंडे को आगे बढ़ाने का आरोप लगाया है, तो समर्थकों का तर्क है कि इससे समावेशिता सुनिश्चित होती है और ऐतिहासिक विकृतियों को सुधारा जा रहा है। इसके परिणाम गंभीर होंगे, यह युवाओं के मन को आकार देने, सामाजिक एकजुटता को प्रभावित करने और अकादमिक स्वतंत्रता पर बहस को बढ़ावा देने का काम करता है। फिर भी, यह रणनीति जोखिमों से भरी है। आर्थिक उथल-पुथल और आंतरिक अस्थिरता से जूझ रहा पाकिस्तान शायद ही आदर्श साझेदार बन पाए। उसकी सेना मानवाधिकारों के हनन और आतंकी गतिविधियों को समर्थन देने के आरोपों से घिरी है। उससे जुड़ना बांग्लादेश की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा को धूमिल करने के साथ ही चरमपंथ से निपटने की उसकी प्रतिबद्धता को कमजोर कर सकता है। घरेलू स्तर पर, इस समझौते को नागरिक समाज, बुद्धिजीवियों और आबादी के उन वर्गों के विरोध का सामना करना पड़ सकता है, जो 1971 में पाकिस्तानी नरसंहार से काफी खफा हैं।
भारत के लिए यह घटनाक्रम एक कूटनीतिक दुविधा और बहुत बड़ा सिरदर्द है। सख्त प्रतिक्रिया से ढाका के अलग-थलग पड़ने का खतरा है, जबकि चुप रहने से इस्लामाबाद का मनोबल बढ़ सकता है। ऐसे में सही संतुलन कायम करना नई दिल्ली के लिए अहम होगा, जिसे अब अपने पूर्वी पड़ोसी के साथ तेजी से जटिल होते संबंधों से निपटना होगा। 1971 के अत्याचारों को भूलना न केवल उन लोगों का अपमान है, जिन्होंने बलिदान दिया, बल्कि उस राष्ट्र के लिए भी एक खतरनाक मिसाल है, जिसकी पहचान उसके मुक्ति संघर्ष से गहराई से जुड़ी हुई है। इस समझौते के निहितार्थ बांग्लादेश से परे हैं, क्योंकि इसे दक्षिण एशिया के उभरते भू-राजनीतिक परिदृश्य के व्यापक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव के साथ, बांग्लादेश की पाकिस्तान से दोस्ती को बहुध्रुवीय दुनिया में कई साझेदारियों का लाभ उठाने की एक बड़ी रणनीति के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि, इसके अपने अंतर्निहित खतरे भी हैं।
भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में आई खटास के पीछे हसीना का मामला भी काम कर रहा है। 1975 में जब शेख हसीना के परिजनों की हत्या हुई थी, तब भी भारत ने उन्हें शरण दी थी। हालांकि अभी हसीना को शरण देने से सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन और जल-बंटवारे, जैसे मुद्दों को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं। भारत बांग्लादेश के साथ 4,096 किलोमीटर की सीमा साझा करता है। बांग्लादेश के सशस्त्र बलों के भीतर भारत विरोधी भावनाओं के उभरने से द्विपक्षीय संबंधों में तनाव पैदा होने और सीमा स्थिरता बाधित होने का खतरा है, जिससे क्षेत्रीय शांति बनाए रखने के भारत के प्रयासों को चुनौती मिलेगी। बांग्लादेश के ताजा फैसले ने पहले से ही नाजुक क्षेत्रीय समीकरण में एक अस्थिर तत्व शामिल कर दिया है और इसके नतीजों पर न केवल उसके पड़ोसियों, बल्कि वैश्विक समुदाय की नजर रहेगी।