अमेरिका सहित पश्चिमी शक्तियां एक गैर-पक्षपाती अंतरिम सरकार की निगरानी में चुनाव कराए जाने की विपक्ष की मांग का समर्थन कर रही हैं। दरअसल 2010 तक बांग्लादेश में अंतरिम सरकार की निगरानी में ही चुनाव कराने की परिपाटी थी, लेकिन उसी साल अवामी लीग की सरकार ने उस व्यवस्था को समाप्त कर दिया, जिसके पास संसद में भारी बहुमत था। हालांकि अवामी लीग के पास 2006-08 के अनुभव के बाद अंतरिम सरकार के बारे में आशंकित होने के ठोस कारण हैं, जब सैन्य समर्थन से दो शक्तिशाली महिलाओं (शेख हसीना वाजेद और खालिदा जिया) को हटाकर पिछले दरवाजे से नोबेल पुरस्कार विजेता मुहम्मद यूनुस को सत्ता सौंपी गई थी।
मोहम्मद यूनुस अमेरिका के चहेते हैं, जिन्हें बांग्लादेश का अशरफ गनी भी कहा जा सकता है। पर पश्चिमी समर्थन, बांग्लादेश में ग्रामीण बैंक लघु ऋण लाभार्थी नेटवर्क और नोबेल पुरस्कार जैसी विराट उपलब्धि को वह राजनीतिक रूप से रूपांतरित करने में स्पष्ट रूप से विफल रहे हैं। अब उन पर श्रम अदालत में मुकदमे भी चल रहे हैं। पर आश्चर्यजनक यह है कि इसके बावजूद वह अपने पश्चिमी संबंधों को बनाए रख सकते हैं। यूनुस के वकील ने तो अदालत में यह दावा तक किया है कि उन्हें दूसरा नोबेल मिल सकता है। ऐसा लगता है कि अमेरिका बांग्लादेश में यूनुस को आगे रखकर, सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर सरकार विरोधी अभियान चलाकर तथा मानवाधिकार व लोकतंत्र के मुद्दे उठाकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। यह वैसा ही अभियान है, जैसा उसने 2013 में यूक्रेन में किया था। पर पश्चिमी दबाव बढ़ने से शेख हसीना चीन के करीब आ सकती हैं, संयुक्त राष्ट्र में जिसका वीटो बांग्लादेश के खिलाफ लगने वाले प्रस्तावों को रोकने में सक्षम है। भारत की यहां दो स्पष्ट सीमाएं हैं- उसके पास संयुक्त राष्ट्र का वीटो नहीं है, और चीन का मुकाबला करने के लिए अमेरिका के साथ रणनीतिक गठजोड़ भारत को बांग्लादेश के मुद्दे पर वाशिंगटन से जवाब-तलब करना मुश्किल बना देगा। फिर भारत में अब प्रणब मुखर्जी जैसे अनुभवी राजनीतिज्ञ की कमी है, जो बांग्लादेश को अच्छी तरह से जानते थे।
यदि बांग्लादेश म्यांमार (और श्रीलंका) के रास्ते पर चला जाता है, तो फिर पड़ोस में भारत के लिए क्या बचेगा? वैसे में, अपने सबसे बड़े एशियाई प्रतिद्वंद्वी को रणनीतिक रूप से घेरने का चीन का काम लगभग पूरा हो जाएगा। और यदि बांग्लादेश में यूक्रेन जैसा एक अमेरिकी ऑपरेशन काम करता है, तो भारत को बांग्लादेश में एक इस्लामी व्यवस्था के साथ तालमेल बिठाना होगा, जो अवामी शासन के पिछले 14 वर्षों के दौरान हुए बहुत से लाभों पर पानी फेर सकता है। बीएनपी अध्यक्ष खालिदा जिया ने धमकी दी ही है कि सत्ता में आने पर वह हसीना द्वारा भारत के साथ किए तमाम समझौतों की समीक्षा करेंगी।
इस साल हुए गोपनीय सर्वेक्षण के मुताबिक, अगर अवामी लीग अपने मौजूदा सांसदों के साथ चुनाव मैदान में उतरती है, तो 300 सदस्यों के सदन में उसे केवल 32-47 सीटें मिलेंगी। लेकिन सर्वे, जिसकी रिपोर्ट इस लेखक ने देखी है, यह भी बताता है कि अगर अवामी लीग अपने सबसे लोकप्रिय उम्मीदवारों के साथ चुनाव मैदान में उतरती है, तो वह 83-117 सीटों पर जीत हासिल कर लेगी। लेकिन यदि सरकार अगले छह महीने में अच्छा प्रदर्शन करती है और कुछ महत्वपूर्ण कार्रवाई के जरिये भ्रष्टाचार और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर रोक लगाती है, तो सर्वे के मुताबिक, अवामी लीग 140 सीटों के करीब पहुंच सकती है, क्योंकि तब 37 फीसदी मतदाता अपना मन बदल सकते हैं।
इसलिए हसीना पर भ्रष्ट और अक्षम मंत्रियों को बदलने तथा पार्टी में विशेष रूप से गृह, वित्त, विदेश, सूचना, उद्योग, वाणिज्य और जल संसाधन मंत्रालय में साफ-सुथरे चरित्र वाले नेताओं को जगह देने का दबाव बढ़ रहा है। कुछ लोगों ने अमीर हुसैन अमू और बहाउद्दीन नसीम जैसे दिग्गजों को मंत्रिमंडल में शामिल करने का सुझाव दिया है, ताकि सरकार को कानून और व्यवस्था के बढ़ते संकट से उबारने में मदद मिल सके। इस वजह से भारतीय दबाव भी बढ़ गया है, क्योंकि भारत अवामी लीग को सत्ता में वापस देखना चाहता है, लेकिन निष्पक्ष चुनाव के जरिये, जिससे न सिर्फ पश्चिमी जुमलेबाजी बंद हो सकती है, बल्कि वह स्थिति बांग्लादेश को एक-दलीय शासन में जाने से भी रोकेगी, जिससे चीनी वर्चस्व बढ़ने की ही आशंका है।
भारत को सबसे ज्यादा चिंता वहां एक भ्रष्ट और शक्तिशाली सिंडिकेट (राजनेता, नौकरशाह, सेनानायक और उद्योगपति) के बढ़ते असर से है, जो पाकिस्तान समर्थक उद्योगपति के नेतृत्व में प्रधानमंत्री को सलाह देता है और चीन तथा अमेरिका, दोनों के साथ है। यह वह गिरोह है, जो व्यापक मनी-लॉन्ड्रिंग, बैंक धोखाधड़ी और लूट के अपने शासन को बनाए रखने के लिए किसी भी तरह से सत्ता में वापसी चाहता है और जिस कारण वैश्विक मंदी के बीच बांग्लादेश के विदेशी मुद्रा भंडार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
भारत केवल यह उम्मीद कर सकता है कि हसीना अपने पिता शेख मुजीबुर रहमान के उस प्रयोग को नहीं दोहराएंगी, जिसके तहत सांविधानिक परिवर्तन के जरिये उन्होंने बांग्लादेश कृषक श्रमिक अवामी लीग को देश की इकलौती पार्टी घोषित कर दूसरी पार्टियों को गैरकानूनी ठहरा दिया था। साफ है कि बांग्लादेश को बांग्लादेश ही बने रहना चाहिए, बंगाली पाकिस्तान नहीं।
-बीबीसी के पूर्व संवाददाता और दक्षिण एशियाई संघर्षों पर पुस्तकों के लेखक।