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सत्ता में कोई आए, चुनौती तो रहेगी: अवामी लीग के बिना चुनाव, क्या बीएनपी की जीत वैध मानी जाएगी

आनंद कुमार
Updated Mon, 09 Feb 2026 06:37 AM IST

सार

बांग्लादेश में होने वाले चुनाव के स्पष्ट संकेत हैं कि बीएनपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी, लेकिन देखना होगा कि क्या वह सुधार व स्थिरता और जनादेश व वास्तविकताओं के बीच संतुलन बना पाएगी, या फिर यह चुनाव देश के अस्थिर इतिहास का एक और विवादित अध्याय बनकर रह जाएगा?
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बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना और अंतरिम सरकार के प्रमुख मोहम्मद यूनुस। - फोटो : अमर उजाला


इस चुनाव की पृष्ठभूमि असाधारण परिस्थितियों से बनी है। अगस्त 2024 में हुए छात्र-नेतृत्व वाले जनविद्रोह ने शेख हसीना के 15 वर्षों के शासन का अंत कर दिया और उन्हें भारत में शरण लेने पर मजबूर होना पड़ा। इसके बाद एक अंतरिम प्रशासन की स्थापना हुई, जिसने जवाबदेही व सुधार का वादा किया।


हिंसक दमन में भूमिका के आरोपों के चलते अवामी लीग पर प्रतिबंध लगाया गया, जिससे राजनीतिक परिदृश्य पूरी तरह बदल गया। हालांकि शेख हसीना के पतन का देश के बड़े हिस्से ने स्वागत किया, पर अवामी लीग को चुनाव से बाहर कर देना इस आशंका को जन्म देता है कि लोकतांत्रिक पुनर्निर्माण राजनीतिक सुधार के बजाय राजनीतिक बहिष्कार के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। इस बदले हुए राजनीतिक परिदृश्य का सबसे बड़ा लाभ बीएनपी को मिला है। लगभग 17–18 वर्षों तक सत्ता से बाहर रहने, दमन, जेल और निर्वासन झेलने के बाद पार्टी एक बार फिर सत्ता के करीब दिखाई दे रही है। दिसंबर, 2025 में लंदन से तारिक रहमान की वापसी ने इस पुनरुत्थान को प्रतीकात्मक रूप से मजबूत किया। चुनाव से ठीक पहले जारी बीएनपी का घोषणापत्र गंभीरता, संतुलन और शासन क्षमता दिखाने का प्रयास करता है। इसमें चुनावी सुधार, जवाबदेही, मतदाता की गरिमा और नागरिकों के प्रति उत्तरदायी सरकार की बात की गई है। इसकी भाषा अपेक्षाकृत संयमित है, जो दर्शाती है कि मुल्क का मतदाता टकराव व अस्थिरता से थक चुका है।


घोषणापत्र में भारत का नाम सीधे लिए बिना बीएनपी ने सीमा हत्याओं, जबरन धकेलने, तस्करी और नदी जल-बंटवारे जैसे मुद्दों को उठाया है, जो लंबे समय से बांग्लादेश–भारत संबंधों में संवेदनशील रहे हैं। तीस्ता और पद्मा जैसी नदियों में 'उचित हिस्सेदारी' की मांग, संयुक्त नदी आयोग को सशक्त बनाने की बात और 'बांग्लादेश पहले' का सिद्धांत दर्शाता है कि बीएनपी नई दिल्ली के साथ रिश्तों को बगैर शत्रुता के पुनर्संतुलित करना चाहती है। वहीं, चीन का कोई स्पष्ट उल्लेख न होना इस ओर संकेत करता है कि बीएनपी किसी एक महाशक्ति के साथ खुला झुकाव दिखाने के बजाय रणनीतिक लचीलापन बनाए रखना चाहती है। हालांकि बीएनपी की राजनीतिक स्थिति निर्विवाद नहीं है।


जमात-ए-इस्लामी के साथ एकता सरकार से इन्कार कर पार्टी ने इस्लामी राजनीति से दूरी बनाने और घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भरोसा कायम करने की कोशिश की है। यह 2001–06 के दौर से अलग है। तारिक रहमान का आकलन है कि जमात से खुला गठबंधन शहरी मतदाताओं, अल्पसंख्यकों और विदेशी साझेदारों के बीच पार्टी की स्वीकार्यता को नुकसान पहुंचा सकता है। इसके बावजूद, बीएनपी को हेफाजत-ए-इस्लाम के जमात-विरोधी रुख से अप्रत्यक्ष लाभ मिला है, लेकिन इससे वैचारिक जटिलताएं भी बढ़ी हैं। मुख्य चुनौती जमात-नेतृत्व वाले गठबंधन से है, जिसमें छात्र आंदोलन से निकली नेशनल सिटिजन पार्टी भी शामिल है। जमात ने खुद को नए सिरे से पेश करने की कोशिश की है, और एक हिंदू उम्मीदवार को भी मैदान में उतारा है। फिर भी महिलाओं के अधिकारों और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर आशंकाएं बनी हुई हैं। नेशनल सिटिजन पार्टी का जमात के साथ जाना उसकी स्वतंत्र सुधारवादी छवि को नुकसान पहुंचाता है और इससे आंतरिक असंतोष तथा सार्वजनिक संदेह, दोनों बढ़े हैं। राजनीतिक दलों से परे, स्थिरता के असली निर्णायक अन्य संस्थानों में निहित हैं। मुख्य सलाहकार के रूप में मोहम्मद यूनुस एक कठिन संतुलन साधने की कोशिश कर रहे हैं—विश्वसनीय चुनाव कराना, सुरक्षा संभालना और जुलाई राष्ट्रीय चार्टर पर जनमत संग्रह कराना। आलोचकों का मानना है कि आम चुनाव के साथ जनमत संग्रह कराना भ्रम और राजनीतिकरण को बढ़ा सकता है, खासकर तब, जब ऊपरी सदन जैसी प्रमुख सिफारिशें पहले ही बीएनपी जैसे दलों के घोषणापत्र से गायब हैं। बांग्लादेश के इतिहास में सैन्य तख्तापलटों की स्मृति अब भी ताजा है, पर 2024 के विद्रोह के दौरान सेना का संयम एक बड़ा बदलाव था। फिर भी कानून-व्यवस्था की कमजोर स्थिति में सेना की तैनाती और चुनाव के दौरान उसकी भूमिका अनिवार्य है। शेख हसीना के शासनकाल में कथित मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए सेवारत अधिकारियों पर मुकदमे सैन्य संस्थान के भीतर असहजता पैदा कर सकते हैं। भावी सरकार को नागरिक-सैन्य संबंधों को सावधानी से संतुलित करना होगा।


मानवाधिकारों का मुद्दा भी चुनावी माहौल को जटिल बना रहा है। अवामी लीग के पूर्व मंत्री और वरिष्ठ हिंदू नेता रमेश चंद्र सेन की हिरासत में मौत ने राजनीतिक प्रतिशोध के आरोपों को हवा दी है। ऐसी घटनाएं अल्पसंख्यकों के बीच भय और असुरक्षा की भावना को मजबूत करती हैं। सरकारी कर्मचारियों के वेतनमान को लेकर प्रदर्शन, चुनाव बहिष्कार की धमकियां और प्रशासनिक पक्षपात के आरोप बताते हैं कि असंतोष गहरा है। जब लगभग हर प्रमुख पक्ष चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहा हो, तो परिणाम चाहे जो भी हों, उनकी वैधता कमजोर हो जाती है। संकेत स्पष्ट हैं कि बीएनपी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरेगी, लेकिन जीत अपने-आप में शासन की गारंटी नहीं है।


नई सरकार विरासत में एक खंडित समाज पाएगी। ऐसे में बांग्लादेश के लोकतांत्रिक घावों को पूरी तरह भर पाना कठिन रहेगा। असली परीक्षा सत्ता में आने के बाद होगी—क्या बीएनपी न्याय और संयम, सुधार और स्थिरता तथा जनादेश और संस्थागत वास्तविकताओं के बीच संतुलन बना पाएगी, या फिर यह चुनाव देश के अस्थिर राजनीतिक इतिहास का एक और विवादित अध्याय बनकर रह जाएगा।  
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