आखिर क्या मिला प्रख्यात लोकगायक राहुल आनंद के 140 साल पुराने घर पर हमला कर और उनके तीन हजार से ज्यादा दुर्लभ वाद्ययंत्रों को जला देने से? कई देशों से ये वाद्ययंत्र उन्होंने संकलित किए थे। घर के एक कमरे को राहुल ने संग्रहालय में तब्दील कर दिया था। कमरे में ही उनका ‘जोलेर गान’ ग्रुप अभ्यास और रिकॉर्डिंग करता था। वह किसी तरह पत्नी और बेटे को लेकर पीछे के दरवाजे से निकल सके। अन्यथा भीड़ फिल्म निर्माता सलीम खान और उनके बेटे शांतो खान की तरह उनका भी वही हाल कर सकती थी। बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर रहमान की प्रतिमा को तोड़ दिया। जब हम किसी शहर में जाते हैं, तब किसी न किसी महान हस्ती की प्रतिमा देखने को मिल जाती है। यह कालांतर में धरोहर बन जाती है। भीड़ ने इंदिरा गांधी भारतीय सांस्कृतिक केंद्र पर हमला किया। सुनामगंज में बंगबंधु लिबरेशन वॉर म्यूजियम में रखीं दुर्लभ तस्वीरों और दस्तावेजों आदि को क्षति पहुंचाई।
ढाका एक शहर ही नहीं, बल्कि दुनिया के प्रमुख सांस्कृतिक केंद्रों में से एक रहा है। धन संपदा क्षति की भरपाई हो सकती है, लेकिन धरोहर और पुरातात्विक वस्तुओं की नहीं। सभ्यता और संस्कृति को तहस-नहस करने का सिलसिला दुनिया में सैकड़ों वर्षों पहले से चला आ रहा है। यूनेस्को के वर्ल्ड हेरिटेज सेंटर गठित किए जाने के बाद भी इसे रोकने के ठोस उपाय नहीं किए गए। धरोहर नष्ट करने की पहली घटना इतिहास में 330 ईस्वी की मिलती है, जब सिकंदर ने फारस की राजधानी पर्सेपोलिस पर हमला कर वहां की सभ्यता को भारी क्षति पहुंचाई। भारत में खिलजी, गुलाम, तुगलक, मुगल और फिर अंग्रेज हुकूमत ने यही किया। अंग्रेजों ने तो मुगलों की कई इमारतों के प्रमुख हिस्सों को तोड़कर अपनी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल किया। लाल किले में रंग महल को सैनिकों की रसोई में तब्दील कर दिया। वर्ष 1193 में दीन मुहम्मद बिन अख्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय को क्षति पहुंचाई।
ओपयम युद्ध के दौरान वर्ष 1860 में ब्रिटेन और फ्रांस की सेनाओं ने चीन के युवानमिंगयुन स्थित ग्रीष्मकालीन शाही महल में आग लगा दी और यहां रखीं कलाकृतियां, स्वर्ण व चांदी जड़ित कलात्मक वस्तुएं लूट ले गईं। 14 अगस्त, 1900 को चीन में बॉक्सर विद्रोह को कुचलने के लिए ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस, ऑस्ट्रिया, हंगरी, इटली के 19 हजार सैनिकों ने बीजिंग पर कब्जा कर पुराताित्वक महत्व की हजारों वस्तुएं लूटीं। ऐसी कई घटनाओं के बाद 1899 में हेग सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें मसौदा तैयार कर सभी देशों से अपील की गई कि युद्ध के दौरान ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक स्थलों और स्मारकों को क्षति नहीं पहुंचाएं। हालांकि इस समझौता पत्र पर बेनिन और चीन ने हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया था।
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नाजियों ने सोवियत संघ और पोलैंड में कला व संस्कृति से संबंधित वस्तुएं लूटीं और जर्मनी ले जाकर तहस-नहस कर दीं। 1917 में रूस की बोल्शेविक हुकूमत ने महलों, संग्रहालयों, चर्चों से प्राचीन कलाकृतियां जब्त कर लीं। चीन में माओत्से तुंग के नेतृत्व में कम्युनिस्ट सत्ता ने 1966 में मठों, म्यूजियम आदि पर पहरा बिठा दिया। कम्युनिस्ट सत्ता ने सबसे ज्यादा क्षति तिब्बत में पहुंचाई। 1949 से पहले तक यहां छह हजार से अधिक मंदिर और मठ थे, अब केवल 13 बचे हैं। 2012 में इस्लामी आतंकियों ने माली के टिंबुकटू शहर पर हमला कर ज्यादातर समाधियां नष्ट कर दीं। अफगानिस्तान में बामियान स्थित बुद्ध की विशाल प्राचीन प्रतिमा को तालिबान ने विकृत कर दिया। रूस और फ्रांस क्रांति में भी यही हुआ।
अब प्रश्न यह उठता है कि इन अमूल्य संपदाओं को कैसे स्थायी तौर पर संरक्षित किया जाए? वर्ल्ड हेरिटेज सेंटर की भूमिका धरोहरों की सूची बनाने तक सीमित है। वहशी भीड़ का शिकार ये न बनें। संरक्षण का काम संबंधित देश की सरकारों का है। ध्यान देने की बात है कि जब हमलावर भारी पड़ते हैं, तब सरकारें भी लाचार हो जाती हैं। चूंकि इस मामले में सभी देश प्रभावित रहे हैं, इसलिए संयुक्त राष्ट्र को ठोस और प्रभावी भूमिका निभानी चाहिए। धरोहरों को क्षति पहुंचाने के कृत्यों को गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए।