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जेल के आगे बेल है

Tue, 14 Apr 2015 07:06 PM IST
सुरजीत सिंह
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सत्य के साथ प्रयोग करने से कोई गांधी बनता है, और 'सत्यम' के साथ प्रयोग करने से रामलिंग राजू। लेकिन कोई कितना ही राजू बन ले, कानून के हाथ बहुत लंबे और बलिष्ठ होते हैं। अब सात साल के लिए गए न अंदर! घर के अंदर घुसते ही उन्होंने जोश में कहा।
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मैंने उन्हें समझाया, मगर भले ही सजा अंदर जाने की गारंटी है, लेकिन इसके साथ बाहर आने की वारंटी भी मिलती है। पर लगता है कि वह न समझने का इरादा करके आए थे। वह बोले, कैसी बातें करते हो, जेल हुई है, वह भी सात साल की, इससे सिद्ध होता है कि कानून के हाथ बहुत लंबे होते हैं। इनसे रसूखदार और चिकनी गर्दनें भी नहीं बच सकतीं।

मैंने कहा, मुहावरे में तो आपकी बात ठीक है। परंतु हकीकत में जैसे डर के आगे जीत है, वैसे ही जेल के आगे बेल है।
उन्होंने चिहुंकते हुए पूछा, मतलब!

मतलब साफ है, जेल जाओ, बेल पाओ। यह बाहर रहने का स्थायी प्रावधान है। रसूखदारों के लिए सजा बाईपास की तरह है, और जिन लंबे हाथों से वे अंदर पहुंचते हैं, उन्हीं हाथों की उंगलियां पकड़कर वे बाहर आने का रास्ता भी जानते हैं। कई बंदे तो इस इंतजार में सजा को उत्सुक रहते हैं कि कब जेल की सजा हो, ताकि वे बेल के सहारे मजे से बाहर आएं।
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तो क्या जेल मतलब जेल नहीं होता? वह अविश्वास से मुझे देखने लगे।

बेशक होता है, लेकिन खास लोगों के लिए नहीं! अब देखिए, सलमान को हिरण के शिकार मामले में पांच साल की जेल हुई, आज यह दबंग शेरखान बना घूम रहा है। लालू को चारा घोटाले में जेल हुई, वह आज जनता परिवार को एक करने में जुटे हैं। संचार घोटाले में सुखराम को सजा हुई, बेल के सहारे वह सुख से राजनीतिक वनवास काट रहे हैं। हथियार रखने के आरोप में संजय दत्त दो साल के लिए अंदर गए, लेकिन दो सौ बार वह पैरोल पर बाहर भी आ चुके हैं। आय से अधिक संपत्ति के लिए जयललिता को चार साल की सजा हुई, अब वह सशर्त बाहर हैं।
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बात अब उनकी समझ में आई। वह सजा पाए की तरह रुआंसे हो उठे, और बेल पाए की तरह बाहर चले गए।
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