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नब्बे के बाद का संघ यानी राम के साथ 'रुपइया'

Sat, 04 Oct 2014 09:53 PM IST
बद्री नारायण
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं संघ के बीच क्या और कैसा संबंध है, इस पर राजनीतिक विचारकों में मुख्यतः दो प्रकार के मत हैं-एक तरफ आशुतोष वार्ष्णेय एवं प्रताप भानु मेहता जैसे राजनीति शास्त्री है, जो मानते हैं कि मोदी संघ के दबाव में नहीं, वरन संघ उनके दबाव में रहेगा। ऐसे विश्लेषक यह बताते हुए नहीं थकते कि कैसे मोदी ने गुजरात में संघ के प्रभाव को अपने सामने निष्प्रभ कर दिया था। दूसरी तरफ मेरे जैसे लोग हैं, जो मानते हैं कि संघ मोदी के प्रभाव एवं करिश्मे को सांगठनिक आधार देने का काम कर रहा है। लोकसभा चुनाव में हमने देखा कि किस प्रकार मोदी के प्रचार तंत्र वाली टीम के साथ बूथ स्तर से लेकर ऊपर तक भाजपा के साथ संघ के काडर्स खड़े थे। फीडबैक से लेकर चुनाव संयोजन तक का कार्य संघ के हाथों में था। तब संघ अपनी शाखाओं से निकल चुनाव मैदान में आ गया था। अगर श्री मेहता एवं वार्ष्णेय जैसे राजनीतिक विश्लेषकों की बात मान भी लें, तो क्या फर्क पड़ता है। यों भी नरेंद्र मोदी संघ के स्वयंसेवक रहे हैं। उनके मानस का बीजसूत्र संघ से पनपा है, जिसमें बाजार, तकनीकी एवं प्रशासकीय गुण बोध मिलाकर उनके व्यक्तित्व का रसायन बनता है।
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संघ एक ऐसा संगठन है, जो एक ही साथ यथार्थ भी है और मिथक भी। उसके बारे में कोई एक अंतिम बात कहना मुश्किल है। वॉल्टर एंडर्सन से लेकर देसराज गोयल, जॉफरेलौ जैसे जितने भी विद्वानों ने संघ का अध्ययन किया है, वे सब लगातार विफल हुए हैं, क्योंकि उन्होंने किसी खास कालखंड में संघ पर अध्ययन किया था, जबकि संघ सतत परिवर्तनशील रहा है।

संघ की दूसरी विशिष्टता है कि वह अपनी एक छवि बने रहने नहीं देता, उसे तोड़ता रहता है। जैसे एक तरफ उसकी सांप्रदायिक छवि रची जाती है, दूसरी तरफ वह समाज सुधार तथा राष्ट्रीय विपत्ति में सेवा कार्यों में शामिल होता है। संघ को जाति से ऊपर माना जाता था, पर पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में संघ ने सोशल इंजीनियरिंग के फॉर्मूले के तहत कार्य करते हुए भाजपा को विजय दिलाई थी। राजनीतिक विरोधी पांचजन्य एवं ऑर्गनाइजर के लेखों का संदर्भ देकर जब संघ को घेरने का कोशिश करते हैं, तो संघ इन अखबारों को संचालित करते हुए भी उनसे अपना कोई संबंध नहीं मानता। हम जानते हैं कि संघ के अनेक सह-संगठन हैं, जिन्हें मिलाकर संघ परिवार बनता है, परंतु अनेक ऐसे छोटे-छोटे समाज सुधार परक संस्कृति दल, शिक्षा संगठन ऐसे भी हैं, जिन्हें संघ का सह संगठन नहीं माना जाता, पर संघ ऐसे संगठनों के माध्यम से अपना तंत्र फैला रहा होता है। विद्या भारती, वंदेमातरम, कथा मंडल के अनेक संगठन, बनवासी कल्याण मंडल जैसे अनेक संगठन अनेक राज्यों में कार्यरत हैं। अतः अगर कोई संघ के प्रचारकों एवं शाखा प्रमुखों को ही उनका सदस्य मान उनकी छोटी संख्या पर खुश होता रहेगा, तो वह गलती करेगा।
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अगर कोई सरस्वती शिशु मंदिर की शाखाओं को ही संघ संचालित स्कूल मानेगा, तो गलती करेगा। हर शहर में संघ प्रभावित अनेक इंटर कॉलेज एवं स्कूल कार्यरत हैं, जिन्हें संघ से जुड़े लोग चलाते हैं। इन स्कूलों में सतत संघ के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। ये कार्यक्रम इतने महत्वपूर्ण होते हैं कि उनमें सरसंघचालक मोहन भागवत भी भाग लेते हैं। दरअसल संघ जितना औपचारिक संगठन है, उससे अनेक गुना बड़ा वह अनौपचारिक संस्थाओं के संजाल से जुड़ा है। बच्चों की शाखा लगाने से लेकर कथा मंडल, कीर्तन मंडल, हिंदू देवी देवताओं के नाम पर बने अनेक संगठनों के रूप में यह कार्यरत हैं। क्षेत्रीय अध्ययन के दौरान संघ के इस अनौपचारिक एवं अनकहे प्रसार को देखकर सिर्फ हैरान हुआ जा सकता है। हमारे राजनीतिशास्त्री संघ की शक्ति को ठीक से न समझ सिर्फ ‘करिश्मा’ को ही चुनावी राजनीति एवं गोलबंदी की राजनीति की निर्णायक शक्ति मानते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में दलित समूह की अनेक जातियों के लोग जो भाजपा से जुड़े, वह कोई करिश्मा नहीं था, उसके पीछे संघ की पिछले कई वर्षों से सघन रूप से दलितों के बीच किए जा रहे काम का योगदान था। संघ ने अब अपना कार्यक्षेत्र बढ़ाया है, गांवों के बागों एवं स्कूलों में शाखाएं लगानी शुरू की हैं,इन सबने संघ की शक्ति में इजाफा किया है। उनकी योजना है कि उत्तर प्रदेश के हर गांव में अगले कुछ वर्षों में संघ की शाखा लगाने लगे।

प्रायः यह धारणा बनी है कि संघ के कार्यकर्ता प्राचीन युगीन और पारंपरिक होते हैं, जबकि आज संघ के कार्यकर्ता फेसबुक पर चैट करते हैं। लेकिन रोचक यह है कि वे दूसरे धर्म की लड़कियों से शादी न करने की बात करते है। उनकी शाखाओं में जो डायरी दी जाती है, उनमें हर सदस्य का सेलफोन दर्ज होता है।

नब्बे के बाद बन रहे इस संघ में ‘राम’ के साथ ‘रुपइया’ का भी महत्व बढ़ा है। यह ‘रुपइया' चंदा, गुरु दक्षिणा, सहयोग एवं अन्य औपचारिक एवं अनौपचारिक रूपों से संकलित होता है। पहले संघ के कार्यकर्ता साइकिल से चलते थे, आज लक्जरी गाड़ियों के इस्तेमाल से उन्हें कोई ऐतराज नहीं। संघ के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता ने मुझसे बातचीत में बताया कि नए संसाधन और नई तकनीक ने हमारे कार्यों को और सुगम बनाया है। संघ के कई काम नरेंद्र मोदी के एजेंडे का हिस्सा हैं, जबकि मोदी के कई कार्यों से अपने को जोड़कर संघ हिंदुत्ववाद की नई राजनीति विकसित करने की दिशा में बढ़ रहा है। इस तरह देखें, तो मोदी एवं संघ एक दूसरे के पूरक हैं।
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