एक ऐतिहासिक चुनाव के बाद सोलहवीं लोकसभा की पहली बैठक शुरू हो चुकी है। चूंकि सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में पिछले तीस वर्षों के बाद कोई प्रधानमंत्री पूरी बहुमत लेकर आया है, इसलिए भारत का नाम अदब से लिया जाना चाहिए दुनिया के दरबारों में, लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और उनके परिवार की सोच के कारण ऐसा नहीं हो रहा है। यह सोचने वाली बात है कि बदायूं की दुखद घटना पर संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की मून को भी टिप्पणी करनी पड़ी। बान की मून ने मुलायम सिंह यादव के उस बयान को नकारात्मक और अनुचित करार दिया, जिसमें उन्होंने बलात्कार के कुछ मामलों में मृत्युदंड के प्रावधान पर कहा था, लड़के हैं, लड़कों से गलतियां तो होती हैं।
बदायूं में उन बच्चियों की दर्दनाक, बर्बर हत्या के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश का कहना था कि इस तरह की घटनाएं अन्य राज्यों में भी होती हैं, लेकिन जब उत्तर प्रदेश में ऐसा होता है, तो उसका ज्यादा प्रचार किया जाता है। वरिष्ठ समाजवादी पार्टी नेता डॉ रामगोपाल यादव ने यह कहते हुए सारा दोष टीवी चैनलों पर डाला कि उन पर जो अश्लीलता दिखाई जाती है, उसके कारण ही लड़के बिगड़ गए हैं। बड़े और अनुभवी नेताओं के मुंह से इस तरह की बातें सुनकर उत्तर प्रदेश की पुलिस के बीच क्या यह संदेश नहीं जाता कि महिलाओं के प्रति अपराध, चाहे वे बलात्कार या हत्या क्यों न हों, दर्ज न किए जाएं?
उत्तर प्रदेश में यह संदेश छोटे से छोटे थाने तक पहुंचा है ऐसे कि चुनाव अभियान के दौरान मैं जहां भी गई, मुझे सुनने को मिलीं शिकायतें चुनाव व्यवस्था के बिगड़ जाने की। सपा समर्थक भी यह स्वीकार करते हैं कि अखिलेश यादव के आने के बाद स्थिति बिगड़ी है देश के सबसे बड़े राज्य में। जंगल राज का बुनियादी उसूल है, जिसकी लाठी, उसकी भैंस, सो शिकार बनते हैं जंगल में सिर्फ कमजोर। महिलाओं और बच्चों से ज्यादा कौन कमजोर है हमारे समाज में? जाहिर है, वही शिकार बनेंगे ऐसे माहौल में। और अगर ये महिलाएं और बच्चे निचले तबके के होते हैं, तो उनका शिकार करना और भी आसान हो जाता है।
बदायूं में जब उन बच्चियों के परिजन थाना पहुंचे, तो उनसे पहले उनकी जाति पूछी गई थी। जब वहां तैनात पुलिसकर्मियों को मालूम हुआ कि वे पिछड़ी जाति से हैं, तो शिकायत दर्ज करने के बदले उनको कह दिया कि लड़कियां दो घंटे में मिल जाएंगी। लेकिन उसके बदले उनकी लाश मिली। अब साबित हो गया है पोस्टमार्टम रिपोर्ट से कि जिंदा थीं वे दोनों बच्चियां, जब बलात्कारियों ने उन्हें पेड़ से लटकाया था। यानी वे बच सकती थीं, अगर उन बेरहम पुलिसवालों ने उन्हें बचाने की कोशिश की होती। तस्वीर उन बच्चियों की दुनिया भर के अखबारों में छपी और भारत की छवि इतनी कलंकित हुई कि अमेरिकी राष्ट्रपति के प्रवक्ता को भी कहना पड़ा कि उस तस्वीर को देखकर उन्हें दुख हुआ, लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार अपनी निष्क्रियता छिपाने में लगी है।
अफसोस कि उत्तर प्रदेश राज्य सरकार की निष्क्रियता की वजह से पूरी दुनिया में अपने देश का नाम बदनाम हो रहा है, और वह भी ऐसे समय, जब विश्व हमेशा अपेक्षा कर रहा है कि भारत में एक नई शुरुआत होने जा रही है। सत्ता में आने के बाद से अखिलेश सरकार का कामकाज जिस तरह का रहा है, उसे देखते हुए अगले विधानसभा चुनाव में सपा का जाना तय लगता है। लेकिन उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अभी काफी समय है। ऐसे में, देश के नए प्रधानमंत्री को इस राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने के बारे में सोचना नहीं चाहिए? क्या पानी सिर के ऊपर से नहीं गुजर गया है?