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खुद से पस्त कांग्रेस

Tue, 08 Sep 2015 07:44 PM IST
रशीद किदवई
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कांग्रेस के लिए अच्छी खबर यह है कि फिलहाल इसकी जो दशा है, उससे ज्यादा खराब कुछ हो नहीं सकता। देश की इस सबसे पुरानी पार्टी ने अपने संविधान में संशोधन करके सोनिया गांधी को फिलहाल पार्टी अध्यक्ष बनाए रखने फैसला किया है। गौरतलब है कि पार्टी के संविधान में संशोधन का फैसला उस कार्यसमिति ने लिया है, जिसके सदस्यों का चुनाव स्वयं सोनिया गांधी ने किया था और जिसका कार्यकाल पहले ही खत्म हो चुका है। बदले में पार्टी अध्यक्ष ने पार्टी के उन प्रमुख चेहरों को बनाए रखा है, जो 2014 के आम चुनाव में पार्टी के सबसे खराब प्रदर्शन के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार थे। इससे देश भर के पार्टी कार्यकर्ताओं को निश्चित रूप से निराशा हुई होगी।
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पार्टी अध्यक्ष के तौर पर सोनिया ने पहले ही 17 वर्ष पूरे कर लिए हैं, जो पार्टी के 130 वर्षों के इतिहास में सबसे लंबा कार्यकाल है। सत्तर वर्ष की उम्र के बाद सार्वजनिक जीवन में बने रहने के प्रति सोनिया की अनिच्छा से तमाम पार्टी नेता अच्छे-से वाकिफ हैं। वह नौ दिसबंर, 2016 को सत्तर वर्ष की होंगी।

सोनिया को पार्टी अध्यक्ष बनाए रखने का मतलब है कि पार्टी नेताओं को राहुल की नेतृत्व क्षमता पर भरोसा नहीं है। कई कांग्रेसी नेताओं को राहुल की नेतृत्व क्षमता, शैली और परिणाम देने की काबिलियत पर गंभीर आपत्ति हो सकती है। अब मौजूदा स्थितियों में राहुल एवं सोनिया समर्थकों ने यथास्थिति बनाए रखने को स्वीकार कर लिया है, जहां कांग्रेस की चुनावी संभावनाएं धूमिल हैं। कम से कम 2018 तक तो यही आशंका है कि पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों को छोड़कर आगामी सभी राज्य विधानसभाओं के चुनावों में कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो जाएगा। ऐसे हालात में अगले एक और वर्ष के लिए कांग्रेस में दो प्रमुख नेता बने रहेंगे- सोनिया और राहुल। इस तरह कांग्रेस में दो सुप्रीम नेता होंगे-सोनिया और राहुल गांधी। मोहन प्रकाश, मधुसूदन मिस्त्री, मोहन गोपाल, जयराम रमेश, अजय माकन और राहुल टीम के अन्य स्वयंभू नेता मोतीलाल वोरा, जनार्दन द्विवेदी, अहमद पटेल, गुलाम नबी आजाद और अंबिका सोनी सरीखे नेताओं के साथ सह-अस्तित्व में रहेंगे। वास्तव में सभी कांग्रेसी महासचिवों, राज्य प्रमुखों और राज्य विधानसभा के नेताओं के पास या तो सोनिया या राहुल गांधी के खेमे के साथ जुड़ने का विकल्प होगा। गौरतलब है कि राहुल की टीम और वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के बीच जो मतभेद हैं, वे अब किसी से छिपे नहीं रह गए हैं।
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कांग्रेस खेमे में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के महासचिव मोहन प्रकाश को 'उलटा पारस' कहा जाता है, जो कथित तौर पर हर अवसर को विफलता में तब्दील कर देते हैं (पारस एक मिथकीय पत्थर है, जो लोहे को सोने में बदल देता है)। प्रकाश महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तर प्रदेश और कुछ अन्य राज्यों में पार्टी मामलों के प्रभारी थे, जहां कांग्रेस बुरी तरह हारी थी। जो पार्टी की जमीनी हकीकत से वाकिफ हैं, उन्हें कर्नाटक, मध्य प्रदेश और राजस्थान के नगरपालिका चुनाव में कांग्रेस की विफलता से हैरानी नहीं हुई। कांग्रेस के जनाधार खोने की वजह मध्यस्थ जातियों (सवर्णों से ठीक नीचे की जातियां) का भाजपा की तरफ झुकाव और अन्य कांग्रेस विरोधी ताकतों का उभार है।

उदाहरण के लिए, पिछले दो दशक में कांग्रेस ने मध्य प्रदेश में सिंधिया, शुक्ला, सिंह, नाथ, चतुर्वेदी और पचौरी जैसी जातियों के शीर्ष नेताओं को ही आगे बढ़ाया। उच्च जातियों के नेताओं के वर्चस्व के दौर में आदिवासी, पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक नेतृत्व प्रतीकात्मक ही बने रहे, भले ही गांधी परिवार के नेतृत्व में पार्टी खुद को इन गैर अगड़ी जातियों का चैंपियन मानती रही। ठीक यही कहानी उत्तर प्रदेश और बिहार में है, जहां पार्टी के शीर्ष पदों पर ब्राह्मण या राजपूत होते हैं।

व्यापम घोटाले के बावजूद मध्य प्रदेश के निकाय चुनावों में भाजपा की जीत विचारणीय है। शिवराज सिंह चौहान के शासन से मध्यवर्ग में बढ़ रहे मोहभंग को संसाधनों और चुनाव तैयारी की कमी की वजह से राहुल की टीम भुना नहीं पाई। क्षेत्रीय क्षत्रपों सहित पूरा कांग्रेसी नेतृत्व अपनी वफादारी के इनामस्वरूप पार्टी टिकट पाने के लिए चापलूसी करने नई दिल्ली पहुंच गया।

इसके विपरीत सत्तारूढ़ भाजपा एक साल पहले से ही चुनाव की तैयारियों में लगी थी। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर और झारखंड चुनाव की तैयारियों के समय संकल्प अधिवेशन को संबोधित किया। वेंकैया नायडू, प्रकाश जावड़ेकर, नरेंद्र सिंह तोमर और थावर चंद गहलौत-सभी केंद्रीय मंत्रियों ने अनुमानित 25 हजार से ज्यादा चुनावी मशीनरी को सुझाव दिए।

किन्हीं अज्ञात कारणों से राहुल गांधी न तो व्यापम वाले राज्य मध्य प्रदेश गए और न ही उन्होंने करोड़ों के इस संदिग्ध भर्ती और व्यावसायिक परीक्षा घोटाले का मुद्दा लोकसभा में उठाया। वह सिर्फ ललित मोदी प्रकरण से चिपके रहे। सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे सिंधिया के इस्तीफे की मांग को लेकर संसद में गतिरोध और फिर बहस से कांग्रेस की गरिमा में इजाफा नहीं हुआ।

कांग्रेस में सबसे बुरी बात यह है कि सोनिया और राहुल, दोनों ने पार्टी के पदानुक्रम में सभी स्तरों पर मध्यस्थ जातियों को समायोजित करने के बारे में नहीं सोचा। इसके बजाय उन्होंने वही रास्ता चुना, जिसका जिक्र 1997 में शरद पवार कांग्रेस का मजाक उड़ाने के लिए किया करते थे-'तीन में एक मेरा' की पार्टी।

एआईसीसी के प्रमुख पद के लिए सीताराम केसरी के खिलाफ लड़ रहे पवार ने उस वक्त केसरी की अहमद पटेल, गुलाम नबी आजाद, तारिक अनवर और मीरा कुमार पर निर्भरता का उल्लेख किया था। ये सभी तब एआईसीसी के शीर्ष अधिकारी थे। कांग्रेस का कोई भी भीतरी व्यक्ति आपको बता सकता है कि अब भी कुछ नहीं बदला है और आधारहीन लोग ही आज भी फैसले ले रहे हैं।
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- वरिष्ठ पत्रकार और 24 अकबर रोड के लेखक
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