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पप्पू के हैं बुरे दिन

Tue, 12 Aug 2014 07:16 PM IST
सुधाकर आशावादी
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पप्पू बांहें चढ़ाना भूल चुका है। उसे पता चल चुका है कि बांहे चढ़ाने से कुछ भी हासिल नहीं हो सकता। एंग्रीमैन बनने के लिए एंग्रीमैन जैसे काम भी करने पड़ते हैं। बांहें चढ़ाकर किसी कागज के टुकड़े को फाड़ने भर से कोई एंग्रीमैन नहीं बन जाता।
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मम्मी ने कई बार समझाया भी था, कहा था, बेटा, तुम्हारा लालन-पालन इस प्रकार से नहीं हुआ, जिस प्रकार से किसी एंग्रीमैन का होना चाहिए। वह मां अलग ही होती हैं, जो अपने बच्चों को पत्थरों पर नंगे पैर चलना सिखाती हैं। तुम एयर कंडीशन में रहने वाले; तुम्हे तपती धूप भला कैसे सहन हो सकती है! पर पप्पू को कुछ नहीं सूझा, सो मां से ही भिड़ गया। वह बोला, मां तुम्हीं बताओ आखिर कब तक मैं पप्पू बना रहूंगा। तुमसे अच्छे तो वह अंकल हैं, जो अपने बयानों और नए-नए एपिसोड में अपने आप को हीरो बनाकर पेश करते हैं और बार बार मुझे प्रेरणा देते हैं कि मैं भी उन जैसे काम करके बड़ा बन जाऊं।

यह सुनकर मम्मी के चेहरे पर मुस्कराहट रेंग गई, वह कुछ सोचकर बोली, तेरी बचकाना बातों पर मुझे हंसी आती है। तुझे बड़ा बनाने के लिए मैंने क्या-क्या नहीं किया। अपने पास बिठाकर ओहदेदार बनाया, पर तूने ओहदे को भी लजाया। एड़ी-चोटी का जोर लगाकर तूने बांहें चढ़ा-चढ़ाकर खुद को युवाओं का आइकॉन दिखाना चाहा, मगर बात नहीं बनी। लोगों ने माना ही नहीं कि कोई एंग्रीमैन पूरे मोहल्ले की किस्मत बदलने का प्रयास कर रहा है।
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खैर, अब वह चौवालीस पर सिमट कर रह गया है छप्पन इंची सीने के सामने। उसके सामने यही समस्या है कि वह बड़ा कैसे बने। इसके लिए वह कभी-कभी अपनी ही पैदा की हुई समस्याओं के विरोध में चिल्लाने लगता है। मम्मी समझाती भी है, पप्पू शैतानी मत करो, पड़ोसी खिल्ली उड़ा रहे हैं, पर पप्पू नहीं मानता, कहता है, मम्मी मुझे मत रोको, मुझे बड़ा बनना है। मम्मी अपना माथा पीटने लगती है, नासपिटे... तू बड़ा होता, तो तेरी अब तक शादी हो गई होती।
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