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समाज: इजाजत लेने में क्या परेशानी है, प्रस्तावित नियमों की सफलता के लिए जरूरी है जागरुकता

विराग गुप्ता
Updated Mon, 06 Jan 2025 07:05 AM IST

सार

नए नियमों का विरोध करने वालों को यह समझने की जरूरत है कि 18 साल से कम उम्र के बच्चों को मोबाइल के इस्तेमाल की इजाजत है, पर वे अपने नाम से सिम कार्ड नहीं ले सकते। प्रस्तावित नियमों को सफल बनाने के लिए अभिभावकों के साथ समाज को भी जागरूक होने की जरूरत है।
 
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सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : Freepik.com


रिसर्च फर्म ‘रेडसियर’ के सर्वे के मुताबिक, भारत में यूजर्स रोजाना 7.3 घंटे स्मार्टफोन और सोशल मीडिया पर समय बिताते हैं, जबकि अमेरिका में यूजर्स का औसत स्क्रीन टाइम 7.1 घंटे और चीन में 5.3 घंटे है। सोशल मीडिया बच्चों का बचपन और नींद छीन कर उन्हें सुस्त, चिड़चिड़ा और आक्रामक बना रहा है। किशोरों और युवाओं का बड़ा वर्ग सोशल मीडिया पर रोजाना स्तरहीन कंटेंट देखता है, जिससे उनका शैक्षणिक स्तर खराब हो रहा है। रील बनाने के चक्कर में जान गंवाने के साथ गेमिंग में पैसे हारने पर बच्चे आत्महत्या कर रहे हैं। यही नहीं, अश्लीलता के साथ साइबर ठगी भी बढ़ रही है।


एम्स के डॉक्टरों के मुताबिक, बच्चों द्वारा सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर सख्ती जरूरी है। ‘लोकलसर्कल’ के सर्वे के मुताबिक, 368 शहरों में 61 फीसदी से ज्यादा अभिभावकों ने बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर कानून बनाने की मांग की है। भारत के अलावा, दुनिया के अधिकांश देशों में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर कानून बन रहे हैं। ऑस्ट्रेलियाई सांख्यिकी ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार, सोशल मीडिया की वजह से युवा अपराध में छह फीसदी की बढ़ोतरी हुई। ऑस्ट्रेलिया की संसद में पारित नए कानून के अनुसार, 16 साल से कम उम्र के बच्चों को शामिल करने वाली सोशल मीडिया कंपनियों को लगभग पांच करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर यानी करीब 275 करोड़ रुपये का जुर्माना देना पड़ेगा। पिछले कुछ वर्षों में यूरोप में नार्वे, जर्मनी, बेल्जियम, इटली और फ्रांस जैसे कई देशों में इस बारे में सख्त कानून बने हैं।


भारत में बच्चों के लिए सोशल मीडिया को नियंत्रित करने से जुड़े ड्राफ्ट नियमों के तीन बड़े पहलू हैं। पहला, संविधान के अनुसार बच्चों के जीवन को सुरक्षित रखने के साथ उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण का विकास करना सरकार और संसद की सांविधानिक जिम्मेदारी है। दूसरा, डाटा सुरक्षा और साइबर स्पेस में बच्चों की सुरक्षा से जुड़े विषयों पर यूपीए सरकार के समय में ही शुरुआत हो गई थी। दिल्ली हाईकोर्ट ने केएन गोविंदाचार्य की याचिका पर 11 साल पहले साल 2013 में अनेक आदेश पारित किए थे। तीसरा, साल 2017 में निजता के अधिकार मामले में सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों ने सर्वसम्मति से ऐतिहासिक फैसला दिया था। वर्ष 2023 में संसद से पारित डाटा सुरक्षा कानून के अनुसार, 18 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया पर प्रतिबंध से जुड़े प्रावधान पहले से हैं। उस कानून के अनुसार, अभिभावक की सहमति के बगैर बच्चों के व्यक्तिगत डाटा के इस्तेमाल, प्रसंस्करण और बिक्री पर तत्काल रोक लगाने के साथ टारगेटेड विज्ञापन पर प्रतिबंध होना चाहिए। नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर कानून के अनुसार 250 करोड़ रुपये के जुर्माने का प्रावधान होना चाहिए।


 आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव के अनुसार, परामर्श के बाद अंतिम नियमों को मंजूरी के लिए मानसून सत्र में संसद में रखा जाएगा। शिकायतों के पंजीकरण और निपटारे के लिए डिजिटल कार्यालय स्थापित किए जा रहे हैं। उसके बाद टेक कंपनियों को अपनी प्रणाली सुधारने और कानून का पालन करने के लिए दो साल का समय मिलेगा। अब ज्यादा विलंब किए बगैर डाटा सुरक्षा कानून को लागू करने की जरूरत है। नए नियमों के अनुसार, बच्चों के साथ सभी भारतीयों का डाटा सुरक्षित रहना चाहिए। डाटा के स्थानीयकरण से अर्थव्यवस्था के सशक्तीकरण के साथ साइबर अपराधों में भी कमी आएगी।


एक अनुमान के मुताबिक, भारत में 18 साल से कम उम्र के 15 करोड़ बच्चे सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं। संविधान के अनुसार, बच्चों के शारीरिक, मानसिक और शैक्षणिक विकास को दुरुस्त रखने के लिए सरकार को अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी ही चाहिए। जैसे वाहन चलाने के लिए ड्राइविंग लाइसेंस, सीट बेल्ट, हेलमेट और इंश्योरेंस समेत कई नियमों के पालन की जरूरत होती है। इसीलिए जैसे 18 साल से कम उम्र के बच्चों को सिगरेट, शराब, ड्रग्स, गुटखा और सेक्स आदि से दूर रखने के लिए सख्त कानून बनाए गए हैं, उसी तरह सोशल मीडिया में बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए सख्त नियम होने ही चाहिए। इन नियमों के लागू होने के बाद भी ईमेल और गूगल सर्च के माध्यम से बच्चे अपनी शिक्षा और व्यक्तित्व विकास से जुड़े प्रोजेक्ट्स बखूबी करते रहेंगे।


जो लोग इन प्रस्तावित नियमों का विरोध कर रहे हैं, उन्हें यह समझने की जरूरत है कि 18 साल की उम्र के पहले नाबालिग बच्चे कोई भी कानूनी एग्रीमेंट नहीं कर सकते। इसीलिए बच्चों को मोबाइल के इस्तेमाल की इजाजत है, पर वे अपने नाम से सिम कार्ड नहीं ले सकते। नए नियम लागू होने के बाद फर्जी तरीके से पंजीकरण और वीपीएन के इस्तेमाल से सोशल मीडिया से जुड़ने के तरीके ईजाद हो जाएंगे। सिर्फ कानून के डंडे से ही बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखना मुश्किल है। इसलिए प्रस्तावित नियमों को सफल बनाने के लिए अभिभावकों के साथ समाज को भी जागरूक होने की जरूरत है। दिल्ली में चुनावों की घोषणा के पहले सरकारी योजनाओं के लिए निजी तौर पर डाटा इकट्ठा करने पर जांच और पुलिस कार्रवाई हो रही है। नए नियमों की आड़ में बच्चों की उम्र की जांच के नाम पर विदेशी टेक कंपनियां गैर जरूरी डाटा और कागजात इकट्ठा नहीं कर पाएं, इसके लिए सरकार को प्रभावी नियामक व्यवस्था भी बनानी होगी।            

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