ऐसे वक्त में जब संसदीय चुनाव के दौरान लोकतंत्र का यह उत्सव एक उन्माद में तब्दील हो गया, घोटालों व कुशासन को लेकर आरोप-प्रत्यारोप, व्यक्तिगत हमले और एक-दूसरे के खिलाफ अस्पष्ट धमकियों का सिलसिला तेज हो गया, हजारों प्रतिभाशाली एवं महत्वाकांक्षी युवक-युवतियां एकाग्रचित्त होकर आईएएस की अंतिम बाधा साक्षात्कार की तैयारी में लगे हैं। हरियाणा में अशोक खेमका के (कथित) उत्पीड़न और ग्रेटर नोएडा में रेत माफिया के खिलाफ दुस्साहसी अभियान छेड़ने वाली दुर्गा शक्ति के चर्चित मामले भी उनके हौसले को कम नहीं कर पा रहे हैं। यहां तक कि घोटाले की जांच का मामला गरमाने पर राजनेताओं द्वारा वरिष्ठ नौकरशाहों पर आरोप मढ़े जाने के बाद भी आईएएस के प्रति उनके आकर्षण में कोई कमी नहीं आई है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों, विदेशी बैंकों और बड़े भारतीय कारोबारी समूह ने प्रतिभाशाली युवाओं को अपनी तरफ खींचने के लिए प्रलोभन दिए, फिर भी यह आकर्षण कम नहीं हुआ। आईएएस का आकर्षण न सिर्फ पहले की तरह बरकरार है, बल्कि और भी मजबूत हुआ है। आखिर ऐसा क्या है कि युवा आईएएस को रोजगार के पहले विकल्प के रूप में चुनते हैं?
इस सीधे से सवाल कि 'तुम क्यों आईएएस अधिकारी बनना चाहते हो' का हर बार घिसा-पिटा जवाब दोहराया जाता है कि 'देश की सेवा करना चाहता हूं','व्यापक स्तर पर लोगों की सेवा करना चाहता हूं', 'समाज के लिए कुछ करना चाहता हूं', यह सेवा मुझे फैसले लेने का अधिकार देगा, जिससे मैं लोगों की जिंदगी संवार सकता हूं', आदि-आदि। इन दावों में थोड़ी-सी सच्चाई जरूर है, पर ये सबसे महत्वपूर्ण कारक को प्रकट नहीं करते हैं। कई अभ्यर्थी प्रतिष्ठित कंपनियों की मोटी तनख्वाह वाली नौकरी छोड़कर आईएएस में किस्मत आजमाना चाहते हैं। इसकी मुख्य वजह है कि जब वे अपने वातानुकूलित कार्यालयों से बाहर निकलते हैं, तो उनकी अपनी कोई पहचान नहीं होती, वे भीड़ में खो जाते हैं। जबकि एक आईएएस अधिकारी का रुतबा हमेशा कायम रहता है। चाहे वास्तविक हो या काल्पनिक, सत्ता एवं शक्ति की यही भावना आईएएस का सबसे बड़ा आकर्षण है। इससे सामाजिक प्रतिष्ठा में भी इजाफा होता है। दक्षिण भारत के कुछ राज्यों में एक आईएएस दुल्हे के दहेज की दर करीब 15 करोड़ रुपये तक जा पहुंची है! खुलेआम न सही, लेकिन परोक्ष रूप से दावा किया जाता है कि 'राजनेता तो आते-जाते रहते हैं, पर देश को तो हम ही चलाते हैं।
जितने अभ्यर्थियों को साक्षात्कार के लिए बुलाया जाता है, उनमें से करीब आधे इंजीनियरिंग पृष्ठभूमि के होते हैं और उसके बाद डॉक्टर। आईआईटी संस्थानों से डिग्री लेने के बाद वे भूगोल, मनोविज्ञान, समाज विज्ञान, लोक प्रशासन, नृतत्वशास्त्र एवं इतिहास जैसे ऐच्छिक विषय लेकर इस परीक्षा में किस्मत आजमाते हैं। वे उन विषयों को शायद ही अपनाते हैं, जिनकी पढ़ाई आईआईटी के दौरान उन्होंने की होती है। कमोबेश यही स्थिति डॉक्टरों के साथ है। विडंबना देखिए कि वे अपनी चिकित्सीय विशेषज्ञता के बजाय आईएएस बनकर लोगों की सेवा करना चाहते हैं।
आईएएस के उम्मीदवार देश के सभी हिस्सों से आते हैं, जो उसकी विविधता को दर्शाते हैं। पिछड़े वर्गों को आरक्षण मिलने की वजह से बिहार, छत्तीसगढ़ और झारखंड के छोटे-छोटे गांवों के दृढ़निश्चयी युवक-युवतियों के लिए संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की तरफ से बुलावा आ रहा है। सबसे खुशी की बात है कि चपरासी, ड्राइवर, पटवारी और डाकिये के बच्चों को भी अपने सपने साकार करने का मौका मिल रहा है। हालांकि मंडल कमीशन की सिफारिशों को उसके आलोचक अब भी दुर्भाग्यपूर्ण बताते हैं, लेकिन वह एक गतिशील और समावेशी समाज का निर्माण कर रहा है। सिविल सेवा के जरिये सशक्तिकरण भारतीय लोकतंत्र की सर्वाधिक स्पष्ट एवं रचनात्मक सफलता है।
ऐसे वक्त में जब महत्वपूर्ण घटनाओं, निर्णयों, व्यक्तित्वों, जगहों, तिथियों, रिकॉर्डों, समझौतों, संधियों आदि की जानकारी कंप्यूटर पर एक क्लिक करने से हासिल हो सकती है, आईएएस उम्मीदवारों की क्षमता की जांच के लिए ऐसे सवाल पूछना व्यर्थ है। व्यक्तित्व परीक्षण के लिए यूपीएससी का मौजूदा रवैया दोषपूर्ण है, क्योंकि यह लिखित परीक्षा एवं साक्षात्कार में प्राप्त अंकों के आधार पर उम्मीदवारों को सफल घोषित करता है। इससे यह कैसे साबित होगा कि जिसने ज्यादा अंक प्राप्त किए हैं, वह निश्चय ही एक सफल प्रशासनिक अधिकारी होगा?
ऐसे वक्त में जब नौकरशाही की लाल फीताशाही, लोगों की जरूरतों को पूरा करने के प्रति संवेदनहीनता, बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार, राजनीति के अपराधीकरण, प्रशासनिक अधिकारियों की राजनीतिक आकाओं के साथ गठजोड़, सुशासन का अभाव, बेलगाम अपराध की खबरें हम आए दिन सुनते हैं, इन समस्याओं के समाधान के लिए क्या उम्मीदवारों की क्षमता के परीक्षण के लिए हमें कल्पनाशील, अभिनव और लीक से हटकर चयन प्रक्रिया नहीं अपनानी चाहिए?
यही वक्त है जब हम समाज की जरूरतों के मुताबिक प्रशासनिक अधिकारियों की भर्ती की प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं। अंक किसी की असली प्रतिभा और क्षमता का मानदंड नहीं होता है। विश्वविद्यालय की पढ़ाई बीच में ही छोड़ देने के कारण बिल गेट्स एवं स्टीव जोब्स को कभी सिविल सेवा परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं मिलती। और महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल संघ लोक सेवा आयोग की व्यक्तित्व परीक्षा में विफल हो गए होते! इससे भी विचित्र और कुछ हो सकता है!