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अटल बिहारी वाजपेयी: राष्ट्रहित में कठिन फैसले लेने का साहस, वोट बैंक की राजनीति से कोई संबंध नहीं

शौर्य डोभाल
Updated Sun, 25 Dec 2022 05:39 AM IST

सार

अटल बिहारी वाजपेयी की जयंती को ही हम सुशासन दिवस के रूप में क्यों मनाते हैं, इसका विश्लेषण करने पर हम पाएंगे कि उनके अनेक निर्णय राष्ट्रहित में थे, पर उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों में उनकी सरकार अथवा दल के लिए हानिकारक हो सकते थे।
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अटल बिहारी वाजपेयी। - फोटो : पीटीआई (फाइल फोटो)


परंतु यह असंभव तभी प्रतीत होता है, जब हम शासन और समाज को पाश्चात्य सभ्यता के चश्मे से देखते हैं। पाश्चात्य दर्शन में हर व्यक्ति जहां एक इकाई है, वहीं भारतीय दर्शन में पूरे समाज और पूरे राष्ट्र को एक इकाई के रूप में देखा गया है। भारतीय विचार में राष्ट्र के हित में ही समाज के हर वर्ग का लाभ है, राष्ट्र कल्याण ही व्यक्ति मात्र के कल्याण का पर्याय है, और जब किसी देश का हर व्यक्ति इस सोच के साथ आगे बढ़ता है कि 'इदं न मम, इदं राष्ट्राय' तो हर व्यक्ति का विकास स्वतः ही निश्चित होता है।


हमारे चुने हुए प्रतिनिधि ही विधायिका और कार्यपालिका के रूप में नीतियां बनाने तथा उन्हें क्रियान्वित करने का कार्य करते हैं। किसी योजना को मूर्त रूप देना हो या नीतिगत निर्णय लेना, जब यह कार्य सुशासन की भावना के साथ किया जाता है, तब इसका वोट बैंक की राजनीति से सीधा संबंध नहीं होता।


भारत रत्न, पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी जी की जयंती को ही हम सुशासन दिवस के रूप में क्यों मनाते हैं, इसका अर्थ समझने के लिए यदि हम उनके द्वारा लिए गए निर्णयों का निष्पक्षता से विश्लेषण करें, तो पाएंगे कि उनके अनेक निर्णय राष्ट्रहित में थे, परंतु किसी भी दृष्टिकोण से उस समय की राजनीतिक परिस्थितियों में उनकी सरकार अथवा दल के लिए हानिकारक हो सकते थे। वर्ष 1999 में सरकार गठन के बाद अनेकानेक अंतरराष्ट्रीय और आंतरिक दबावों को धता बताते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा और भारत के गौरव के लिए आवश्यक परमाणु परीक्षण करने का निर्णय लेना हो या 'विनिवेश मंत्रालय' नाम से एक अलग मंत्रालय का गठन करना, वह भी उस माहौल में, जहां समाजवाद की बात किए बिना चुनाव जीतना दिवास्वप्न हो, आपातकाल में लोकतंत्र को दबाते हुए संविधान की प्रस्तावना में जोड़े गए समाजवाद को चुनौती देना किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए नुकसानदायक ही था, जिसकी 2004 के लोकसभा चुनाव में अटल जी ने कीमत भी चुकाई, पर कठिन निर्णय लेने से कभी पीछे नहीं हटे। आजादी मिलने के बाद के आर्थिक फैसलों में उदारीकरण को सबसे बड़ा आर्थिक निर्णय माना जाता है और यह सच भी है, पर यह बात भी विचारणीय है कि भुगतान संतुलन की समस्या, जिसमें भारत के पास महीने भर से भी कम समय का विदेशी मुद्रा भंडार बचा था, के बीच यह अवश्यंभावी था कि उदारीकरण को देश कड़वी दवा के रूप में स्वीकार करे, पर यही बात 1999 से 2004 के कालखंड में लिए गए दूरदर्शी निर्णयों के लिए लागू नहीं होती।

 

आज के समय में केंद्र की मोदी सरकार भी अटल जी द्वारा शुरू किए हुए आर्थिक सुधारों की शृंखला को और तेज गति से नीतिगत निर्णयों के माध्यम से लागू करने के लिए कटिबद्ध नजर आती है। उदाहरण के तौर पर, रेलवे के सालाना बजट किराया कम करने की घोषणा कर लोकप्रियता कमाने का जरिया हुआ करते थे, जो अब आम बजट के साथ पेश होने पर यात्रियों को विश्व स्तरीय सुविधाएं देने, रेल लाइन के विद्युतीकरण, रेल यात्रा को दुर्घटना मुक्त बनाने और चिनाब नदी पर बन रहे विश्व के सबसे ऊंचे पुल के निर्माण जैसे कार्यो पर केंद्रित होते हैं। राष्ट्रहित में दूरगामी फैसले कैसे लिए जाते हैं, इसका उदहारण हाल में ही सरकार द्वारा घोषित सेमी-कंडक्टर/चिप बनाने की नीति से स्पष्ट होता है, जो देश को इस आईटी युग के दौर में आत्मनिर्भर बनाने का काम करेगी, पर इससे कोई चुनावी हित शायद ही सधे।


हाल में ही बहुप्रतीक्षित एयर इंडिया का विनिवेश किया गया, साथ ही बैंकिंग क्षेत्र के सुधार क्रांतिकारी कहे जा सकते है, वह भी तब, जब विपक्ष निजीकरण को लेकर लगातार हमलावर बना हुआ है। अटल जी के नेतृत्व वाली सरकार में जो काम स्वर्णिम चतुर्भुज के साथ शुरू हुआ था, उसे भारतमाला परियोजना के माध्यम से नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया गया। इसी प्रकार दिल्ली एवं आसपास के क्षेत्रो में खराब एयर क्वालिटी की चर्चा और विमर्श से आगे बढ़कर स्थिति में सुधार करने के लिए प्रयास किए गए, जिनमें वाहनों को बीएस-IV से बीएस-VI करना, फ्लेक्स इंजन के माध्यम से बायो फ्यूल को बढ़ावा देना, जो कम प्रदुषण करते हैं या फिर पेरिफेरल रोड का निर्माण करना, जिससे भारी वाहनों को राजधानी क्षेत्र में आने की जरुरत न पड़े। इन सभी प्रयासों का उद्देश्य राष्ट्र निर्माण की दिशा में आगे बढ़ना है।  


अटल जी ने संसद में अपने भाषण में कहा था कि 'सरकारें आएंगी, सरकारें जाएंगी, परंतु राष्ट्र शाश्वत है।'  यही सुशासन की आत्मा है कि देश की नीतियां एवं कार्यक्रम दूरदृष्टि के साथ राष्ट्रहित में और लोक कल्याण को समर्पित हों, न कि त्वरित चुनावी फायदे के लिए। हम 140 करोड़ भारतीयों में से जिसे भी जिस स्तर पर भी शासन संभालने की जिम्मेदारी मिले, और वह इन्हीं आदर्शों के साथ व्यवस्था चलाए, तो भारत को विश्वगुरु बनने से कोई नहीं रोक सकता।

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