रेल मंत्री सुरेश प्रभु अपने लक्ष्य के प्रति दृढ़ संकल्पित व्यक्ति हैं और उनका लक्ष्य भारतीय रेल को निगमीकृत करना है। अपने छोटे-से कार्यकाल में उन्होंने भारतीय रेल में काफी कुछ करने में सफलता पाई है। वर्षों से भारतीय रेल की सुरक्षा का रिकॉर्ड आकर्षक नहीं रहा है और इसका कारण यह है कि उसका बुनियादी ढांचा पुराना पड़ चुका है। कुछ ही हफ्ते पहले ही भारतीय रेल पर बनी स्थायी समिति ने संसद में सुरक्षा और संरक्षा से संबंधित अपनी रिपोर्ट में मौजूदा नेटवर्क की जड़ता के कारण परिसंपत्तियों के रख-रखाव की कठिनाइयों का उल्लेख किया था।
तथ्य यह है कि भारतीय रेल में कोई सुरक्षा विभाग नहीं है। इसका मतलब यह कि सुरक्षा से संबंधित कामकाज की निगरानी रेलवे के विभिन्न विभागों द्वारा की जाती है। इसलिए हाल की कुछ दुर्घटनाओं के लिए रेल मंत्री पर दोष मढ़ना ठीक नहीं होगा। वास्तव में अपने दो साल के कामकाज के प्रजेंटेशन में रेल मंत्री ने विस्तार से बताया कि उनके नेतृत्व में रेलवे की सुरक्षा किस तरह बढ़ी है। पूर्व सरकार की तुलना में मानव रहित लेवल क्रॉसिंग की संख्या घटी है और रेलवे ओवरब्रिज की संख्या बढ़ी है। लेकिन सुरेश प्रभु के कार्यकाल में 346 रेल दुर्घटनाएं हुई हैं। सितंबर, 2015 से अब तक कम से कम 28 बड़ी रेल दुर्घटनाएं हुई हैं, जिनमें 277 लोगों की मौत हुई है।
इस सरकार के कई अन्य कदमों की तरह जब 92 वर्ष पुरानी रेल बजट की परंपरा को खत्म कर उसका संघीय बजट में विलय कर दिया गया, तो काफी हलचल मची। पर इस कदम की अनुशंसा नीति आयोग ने की थी, जिसका मानना है कि रेल बजट में केवल लोगों को खुश करने के लिए घोषणाएं होती थीं, जिनमें कई नई पहलों की घोषणा तो हुई, मगर ज्यादातर पर अमल नहीं हुआ। समय से पहले बजट का दूसरा कारण सार्वजनिक वित्त योजनाओं पर खर्च की शुरुआत एक अप्रैल से करना था। इस विलय के फायदे हैं, जैसे रेलवे को सालाना लाभांश से छुटकारा मिला है, जो उसे हर साल सरकार से सकल बजटीय सहायता पाने के लिए भुगतान करना पड़ता है। इससे रेलवे को सालाना दस हजार करोड़ रुपये की बचत हुई। पर सुरक्षा विभाग के अभाव का मतलब है कि जो लोग सुरक्षा का काम देख रहे हैं, वे बिना विस्तृत प्रक्रिया के सुरक्षा ऑडिट एवं रिपोर्ट के लिए ऐसा कर रहे हैं। स्वाभाविक रूप से इसका दक्षता पर असर पड़ता है।
साथ ही पूंजी निवेश में तेजी लाने पर ध्यान केंद्रित किए जाने से यह धारणा बनी कि सुरक्षा से ज्यादा निवेश पर ध्यान दिया जा रहा है। वर्ष 2014-15 में पूंजी निवेश 58,718 करोड़ रुपये था, जो 2016-17 में बढ़कर 1.2 लाख करोड़ रुपये के पार चला गया। ऐसे में एक आम आदमी को लग सकता है कि सुरक्षा के मुद्दे पर समझौता किया गया। पर अगर रेलवे के बुनियादी ढांचे में सुधार होता है, तो सुरक्षा से संबंधित कई सारे मुद्दे स्वतः हल हो जाएंगे। बड़ी लाइनों का विस्तार हुआ है, जिस कारण अतीत की तुलना में सुरक्षा में सुधार हुआ है। ऊर्जा प्रबंधन में सुधार की दक्षता भी सही दिशा में उठाया गया कदम है। एकीकृत ऊर्जा प्रबंधन प्रणाली से अगले एक दशक में 41,000 करोड़ रुपये की बचत होगी। इसके अलावा, भारतीय रेल मिशन 41 हजार पहल के अनुसार, अगले पांच वर्षों में 24,000 किलोमीटर रेल लाइन का विद्युतीकरण किया जाएगा।
ट्वीटर पर सक्रिय रेल मंत्री ने यात्रियों की सुविधा और आराम को भारतीय रेल की प्राथमिकता में ला दिया। पर ट्रेन के किराये सामान्य रूप से बढ़ गए, जिसने ज्यादातर ट्रेन यात्रियों को नाराज किया, जो अब भी रेलवे को परिवहन का सबसे किफायती साधन मानते हैं। हममें से ज्यादातर लोग भूल जाते हैं कि डीजल से चलने वाली ट्रेनों को विद्युत ट्रेनों में बदलना महंगा पड़ता है, पर भविष्य में पैसे बचाने में मदद भी करेगा। इससे सुरक्षा में भी सुधार होगा। एक रेलवे अधिकारी ने बताया है कि 2015-16 में ऊर्जा प्रबंधन के जरिये 300 करोड़ रुपये और नवंबर, 2016 तक एक हजार करोड़ रुपये बचाए गए। भविष्य में सौर और पवन ऊर्जा का उपयोग किया जाएगा तथा सभी स्टेशनों, ट्रेनों और कार्यालयों पर एलईडी बलब लगाए जाएंगे, जिनसे पैसे की बचत होगी। यह स्पष्ट दिख रहा है कि रेलवे का दृष्टिकोण व्यावसायिक है, जिससे भविष्य में फायदे होंगे।
प्लेटफॉर्मों पर इंटरनेट उपलब्ध कराकर और कुछ सुविधाओं के लिए शुल्क वसूलकर रेलवे ने अपनी छवि के खिलाफ काम किया है, पर जो ग्राहक रेल से यात्रा करना छोड़ चुके थे, वे भी अब लौट रहे हैं। हालांकि अभी ट्रेन के पटरी से उतरने और दुर्घटनाग्रस्त होने की घटनाएं समय-समय पर हो रही हैं, जो कई संदेहों के कारण भारतीय रेल संचालन के कॉरपोरेट दर्शन पर सवाल उठाएगा। रेल मंत्री द्वारा जारी आंकड़े के मुताबिक, रेलवे सुरक्षा कर्मियों के 1.42 लाख पद रिक्त हैं। यह बड़ी चिंता की बात है और इन रिक्त पदों को युद्ध स्तर पर भरा जाना चाहिए।
यह वाकई दुखद है कि महत्वपूर्ण पदों पर भर्ती के बजाय रेल मंत्रालय भर्ती प्रक्रिया की उपेक्षा कर रहा है और राजस्व बढ़ाने और विस्तार योजनाओं पर पर ही ध्यान दे रहा है। सुरक्षा संबंधी चिंताओं को दूर करने के लिए सबसे पहले एक सुरक्षा विभाग बनाया जाना चाहिए, जिसमें पद और उसकी भूमिका स्पष्ट रूप से परिभाषित हो। ऐसा करने पर ही लापरवाही या तकनीकी मुद्दों के कारण दुर्घटना की जवाबदेही स्पष्ट रूप से सामने आएगी। नैतिक आधार पर रेल मंत्री द्वारा इस्तीफे की पेशकश अतिनाटकीयता से ज्यादा कुछ नहीं है। हर दुर्घटना के बाद एक गलती के लिए कुछ कमजोर रेलवे बोर्ड के सदस्य या डिविजनल रेलवे अधिकारी पर गाज गिरती है, जो पूरी तरह से उनकी नहीं होती। फिलहाल रेल मंत्रालय भविष्य की दिशा में काम कर रहा है, पर यात्रियों की सुरक्षा में वह विफल साबित हो रहा है। यात्रियों के हित में रेल मंत्रालय को भविष्य के गुलाबी सपने के लिए उनके वर्तमान से समझौता नहीं करना चाहिए।