दो कंपनियों द्वारा ऐस्टरॉइड खनन की घोषणा के बाद खरबों डॉलर के इस व्यवसाय के प्रति जहां लोगों में कौतूहल है, वहीं वैज्ञानिकों में इस कठिन और खर्चीली महत्वाकांक्षी योजना के प्रति संशय है। ऐस्टरॉइड (क्षुद्र ग्रह) सौरमंडल में विचरण करने वाले ऐसे खगोलीय पिंड हैं, जो आकार में ग्रहों से छोटे एवं उल्का पिंडों से बड़े होते हैं।
ऐतिहासिक रूप से उन्हें बृहस्पति की कक्षा के भीतरी धूलकणों के रूप में जाना जाता है। बड़े आकार वाले ऐस्टरॉइड को प्लानेट्यॉड्स कहा जाता है। हर वर्ष लगभग 900 नए ऐस्टरॉइड्स पृथ्वी के पास से गुजरते हैं। प्लानेटरी रिसोर्सेस और डीप स्पेस इंडस्ट्रीज नामक दोनों कंपनियों की नजर इन क्षुद्र ग्रहों पर है।
प्लानेटरी रिसोर्सेस जहां परिक्रमा करने वाले दूरबीन के जरिये खनन के लिए उपयुक्त ऐस्टरॉइड की पहचान करना चाहती है, वहीं डीप स्पेस एस्टेरॉइड दोहन की संभावनाओं का पता लगाने के लिए अंतरिक्ष यानों का एक बेड़ा भेजना चाहती है।
ऐस्टरॉइड के खनन से सोना, प्लेटिनम एवं दुर्लभ धातुएं मिल सकती हैं। लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि खनन से मिलने वाले बर्फ के टुकड़ों का रॉकेट ईंधन एवं तरल ऑक्सीजन के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ऐस्टरॉइड से 60 ग्राम सामग्री लाने पर एक अरब डॉलर का खर्च पड़ेगा।
एस्टेरॉइड खनन की बात सुनने में भले ही विचित्र लगती हो, पर यह विचार दशकों पुराना है। सबसे पहले 1898 में अमेरिकी खगोलशास्त्री एवं लेखक गैरेट पी सर्विस ने एडिसन कांक्वेस्ट ऑफ मार्स नामक विज्ञान फैंटेसी में इसका उल्लेख किया था। उसके बाद भी कई लोगों ने ऐस्टरॉइड खनन के बारे में लिखा।