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कांग्रेस की दिशा तय करेंगे विधानसभा चुनाव के नतीजे  

रशीद किदवई Published by: रशीद किदवई Updated Sat, 20 Mar 2021 02:52 AM IST
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सोनिया गांधी और राहुल गांधी - फोटो : पीटीआई

दो मई, 2021 के बाद यदि कांग्रेस असम से सर्वानंद सोनोवाल और केरल से पिनरई विजयन को सत्ता से हटाने में विफल रही, तो राहुल गांधी के कांग्रेस का नेतृत्व करने की संभावनाएं कम हो जाएंगी। गांधी परिवार के इस वारिस को या तो 'स्वतंत्र और निष्पक्ष' चुनाव (जिसमें गांधी परिवार के सदस्य मैदान में नहीं होंगे) की अनुमति देनी होगी, या अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के 87 वें अध्यक्ष के रूप में पद ग्रहण करना होगा, चाहे देश की इस सबसे पुरानी पार्टी में 49वां, 50वां या 51वां विभाजन ही क्यों न हो जाए। ये दोनों ही स्थितियां गांधी परिवार के वर्चस्व और उनके राजनीतिक नेतृत्व में आई कमजोरी को दिखाती हैं। इस पर शरद पवार की बारीक निगाह है, जिन्होंने दो बार कांग्रेस छोड़ी और दो बार वापसी की। यूपीए के अध्यक्ष या संयोजक बनने में विफल रहने के बाद पवार ने अब तीसरे मोर्चे के गुब्बारे को आजमाया है। पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि 'देश को तीसरे मोर्चे की जरूरत है और इसके गठन को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों के साथ बातचीत चल रही है। यहां तक कि माकपा नेता सीताराम येचुरी ने भी कहा कि तीसरे मोर्चे की जरूरत है, जिसे आकार लेना बाकी है।' 



पवार एक चतुर राजनेता हैं। वह इस बात का जवाब नहीं देंगे कि वर्ष 2004-14  का यूपीए अभी है या नहीं। तमाम व्यावहारिक उद्देशों की दृष्टि से देखें, तो यूपीए, जिसका नेतृत्व कभी सोनिया गांधी ने किया और डॉ. मनमोहन सिंह दस वर्षों तक प्रधानमंत्री रहे, कहीं नजर नहीं आता। करीब सात वर्षों से यूपीए की कोई औपचारिक बैठक नहीं हुई है, जबकि सहयोगी दल आए और अपनी इच्छा से चले गए। हालांकि राहुल और सोनिया के नेतृत्व में कांग्रेस ने अपने तईं कोशिशें की हैं, फिर वह उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा चुनावों के लिए अखिलेश यादव के साथ विनाशकारी गठजोड़ हो या बिहार 2020 में राजद के साथ बना महागठबंधन या झारखंड और महाराष्ट्र में सरकार में सफल भागीदारी, लेकिन गठबंधन के मामले में कांग्रेस की कहानी बिखरी रही है और वैचारिक के बजाय तात्कालिक राजनीतिक जरूरतों पर केंद्रित रही।


अभी सबकी निगाहें असम पर लगी हुई हैं, जहां कांग्रेस ने बदरुद्दीन अजमल के साथ गठबंधन किया है। 71 वर्षीय इत्र व्यापारी अजमल एक मौलाना और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के नेता हैं, जो असम के बांग्लाभाषी मुसलमानों का नेतृत्व करते हैं। दक्षिणी असम के कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में अत्यधिक प्रभावशाली अजमल का अपने अनुयायियों पर भारी प्रभाव है। दशकों से असमी लोगों ने सीमावर्ती क्षेत्रों में बांग्लाभाषी हिंदुओं और मुसलमानों, दोनों के प्रभुत्व का विरोध किया है, क्योंकि वे मानते हैं कि यह अहोम और अन्य स्वदेसी संस्कृतियों को लील लेगा। इसलिए, असम विधानसभा के चुनावी नतीजों का अल्प और दीर्घकालीन राजनीति पर काफी असर पड़ेगा। कांग्रेस की दिलचस्पी असम में बढ़ी है, खासकर तबसे, जब खबरों और जनमत सर्वेक्षणों से यह संकेत मिला कि पार्टी केरल में सत्ता छीनने में असमर्थ है। राहुल गांधी के समर्थक चिंतित हैं कि केरल में नुकसान का असर राहुल की छवि पर पड़ेगा, जो वायनाड से लोकसभा सांसद भी हैं। राहुल केरल और तमिलनाडु में डेरा डाले हुए हैं। 


केरल, असम और पुडुचेरी में कांग्रेस के खराब प्रदर्शन से राहुल गांधी पर और ज्यादा दबाव बढ़ने की आशंका है, जबकि असम या केरल में चुनावी सफलता उनके पार्टी अध्यक्ष बनने की संभावना को बढ़ाएगी। इस बारे में लगभग सहमति है कि तमिलनाडु में अच्छे नतीजे का श्रेय कांग्रेस की तुलना में सहयोगी द्रमुक को जाएगा, क्योंकि कांग्रेस वहां कनिष्ठ सहयोगी है। बंगाल में भी कांग्रेस-वाम गठबंधन के कोई बड़ा उलट-फेर करने की संभावना नहीं है। मूलतः शरद पवार और कांग्रेस के असंतुष्टों के बीच कोई प्रत्यक्ष या स्पष्ट संपर्क नहीं है, जिसे जी-23 भी कहा जाता है। लेकिन यह खुला रहस्य है कि जी-23 के पास एक प्लान-बी भी है। दो मई को अगर कांग्रेस विफल रहती है, और बंगाल में टीएमसी सत्ता बरकरार रखती है, तो कांग्रेस के असंतुष्टों का ध्यान शरद पवार और ममता बनर्जी पर केंद्रित हो सकता है।


जी-23 के कुछ नेता चाहते थे कि द्रमुक नेता एम के स्टालिन अभी इंतजार करें और नए कांग्रेस संगठन के साथ तालमेल बनाएं, जिसमें पार्टी छोड़कर सफलतापूर्वक अलग समूह चलाने वाले लोग शामिल होंगे। वास्तव में करने की तुलना में कहना हमेशा आसान होता है। लेकिन दो मई के बाद महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा, कर्नाटक और कुल मिलाकर कांग्रेस की राजनीति वही नहीं रहेगी, जो अभी है। पवार की योजना के अनुसार नए तीसरे मोर्चे में क्षेत्रीय दल शामिल होंगे और पवार उसका राष्ट्रीय स्तर पर नेतृत्व कर सकते हैं। राकांपा वर्तमान में महाराष्ट्र में शिवसेना और कांग्रेस के साथ एक असहज सत्ताधारी महा विकास आघाड़ी गठबंधन का हिस्सा है। राकांपा केरल में वाम गठबंधन का हिस्सा है, जबकि पवार के तृणमूल प्रमुख ममता बनर्जी के साथ बेहतर समीकरण हैं। इसके अलावा समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी से उनका तालमेल अच्छा है। वह तीसरे मोर्चे में शामिल होने के लिए तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस), जेडी-एस और वाईआरएससीपी को भी मना सकते हैं, बशर्ते कि उनके क्षेत्रीय हित राकांपा से न टकराएं।


78 वर्षीय पवार फिलहाल भारत के हर तरह के नेताओं में बड़े कद के नेता हैं। उन्हें हमेशा प्रधानमंत्री बनने लायक नेता के रूप में देखा गया-मनमौजी, व्यावहारिक और चतुर। 1976 से पवार कभी चुनाव नहीं हारे। कई अर्थों में वह पूर्व प्रधानमंत्रियों-इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी के कद के नेता कहे जा सकते हैं। राजनीति और क्रिकेट में अपनी पारी खेलने के बाद क्या पवार विभिन्न राजनीतिक दलों के इंद्रधनुषी गठबंधन के प्रमुख के रूप में 2024 में नरेंद्र मोदी को टक्कर देने का मन बना रहे हैं? उनके कट्टर समर्थकों को भी इस पर संदेह है। बहुत साल पहले मिर्जा गालिब ने लिखा था-हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान, लेकिन फिर भी कम निकले। गालिब का यह शेर पवार के व्यक्तित्व के करीब है। 

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