दरअसल कर्जदारों को आज इस बात का दुख नहीं है कि ईएमआई नहीं घटी। उन्हें इस बात की खुशी है कि फिर से नहीं बढ़ी। पिछली कई समीक्षा बैठकों में एक के बाद एक छह बार ब्याज दरें बढ़ाई गई थीं। देखते-देखते वित्त तंत्र की आधार ब्याज दरों में ढाई फीसदी का इजाफा हो गया था। हर बार खुदरा महंगाई के डरावने आंकड़े जारी होते रहते थे और ब्याज दरें बढ़ जाती थीं।
विगत अप्रैल में हुई समीक्षा बैठक में इस क्रम को तोड़ते हुए ब्याज दरें जस की तस रखने का निर्णय हुआ, तो लोगों को लगा था कि महंगाई में संयोग से एक अस्थायी गिरावट आ गई है। पर अब आठ जून की दूसरी बैठक में भी जब महंगाई के आंकड़े नियंत्रित मिले और फिर ब्याज दरों को बख्श दिया गया, तो लोगों ने राहत की सांस ली।
केंद्रीय बैंक के गवर्नर ने यह उम्मीद बंधा दी है कि सब कुछ ठीक रहा, तो दिवाली के आसपास ईएमआई में पहली कटौती का तोहफा लोगों को मिल सकता है। सामान्य मानसून और यूक्रेन-रूस में उलझे अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में बड़ी उठा-पटक न होने जैसी शर्तें लगाकर उन्होंने कहा है कि एक छमाही के बाद देश में महंगाई और काबू में होगी, जिससे ब्याज दरों में कटौती का सिलसिला आरंभ हो सकता है। पहले कोविड के दंश और फिर महंगाई जनित सख्त मुद्रा नीति को झेलते आ रहे उद्योग जगत को ऐसे मीठे दिलासों का ही तो इंतजार था।
केंद्रीय बैंक की मौद्रिक समीक्षा को केवल ईएमआई के लेंस से परखना अलबत्ता तंग नजरिये की मिसाल होगा। मौद्रिक नीति समिति इससे भी कहीं बड़े दायित्व निभाती है। विराट भारतीय वित्त तंत्र की महासागरीय जलधाराओं को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरों के साथ-साथ दूसरे कई नीति-निर्णयों की जरूरत होती है। फुटकर कर्जों के साथ प्रतिभूति बाजार के कर्ज, अंतरराष्ट्रीय कारोबार के लिए रुपये की विनिमय दर का प्रबंधन, आभासी वित्त बाजारों की आभासी मुद्राएं, क्रिप्टो की वास्तविक चुनौतियां, सहकारी व व्यावसायिक बैंकों का नियमन, आईएमएफ-विश्व बैंक के साथ विभिन्न मुल्कों के केंद्रीय बैंकों के साथ कदमताल-ये सब मुद्रा नीति के ही पहलू हैं। इसलिए डिजिटल कर्ज, रुपे प्रीपेड फॉरेक्स कार्ड और डिजिटल करेंसी को यूपीआई से जोड़ने जैसे बेहद अर्थवान निर्णय मौद्रिक समीक्षा को महत्वपूर्ण बना रहे हैं।
एक बात का श्रेय गवर्नर दास को देना ही होगा। महंगाई पर काबू रखने के लिए हर हाल में ब्याज दरों को बुलंद रखने का जो काम पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने केंद्र सरकार से छत्तीस का आंकड़ा बनाते हुए किया था, वही काम उन्होंने सुगमता से बिना कोई बड़ा राजनीतिक विवाद पैदा किए कर दिखाया। याद रहे, कर्ज सस्ते रखने के लिए और विकास दर को फुलाने के लिए ब्याज दरों को कम रखने का आग्रह चुनाव जीतने की कामना करने वाली सरकारें हमेशा से करती रही हैं। लेकिन ब्याज दरें घटाकर महंगाई डायन को जगाने का जन विरोधी काम न करने का जवाबी आग्रह करना रिजर्व बैंक के गवर्नरों का ही कर्तव्य होता है। इसीलिए केंद्रीय बैंक को पर्याप्त स्वायत्तता देने की मांग होती रही है। रिजर्व बैंक के अपने अनुभवों से खिन्न रघुराम राजन ने अपनी चर्चित किताब आई डू व्हाट आई डू में गवर्नर के दर्जे की अस्पष्ट स्थिति पर एक जगह लिखा भी है, 'यह एक खतरनाक बात है कि हकीकत में गवर्नर एक बहुत ताकतवर ओहदा है, लेकिन कानूनी रूप से उसकी मान्यता बहुत कम है।'
आप चाहें, तो इस बात के लिए भी मौजूदा मौद्रिक नीति समिति की सराहना कर सकते हैं कि उसने अगले छह माह में महंगाई की निगरानी को सर्वोच्च वरीयता देने की बात समीक्षा में कही है। यह एहतियात जरूरी है, क्योंकि हाल में फसलों के बढ़े समर्थन मूल्यों के कारण बाजार में नकदी का नया सैलाब आ सकता है, जिससे महंगाई का खतरा बढ़ सकता है। अनिश्चित मानसून के बीच यह तलवार की धार पर चलने जैसी चुनौती होगी।
याद रहे, एक अन्य पूर्व गवर्नर बिमल जालान ने मुद्रास्फीति और विकास दर के द्वंद्व पर एक कीमती बात अपनी किताब इंडिया आफ्टर लिबरलाइजेशन में लिखी है, 'रिजर्व बैंक जैसे विनियामक संस्थान और उसके तहत विनियमित संस्थान-सबको यह मूल मंत्र याद रखना होगा कि विकास और वित्तीय स्थिरता के लिए शाश्वत निगरानी का मूल्य चुकाना ही पड़ता है।'
आखिर में बात फील गुड फैक्टर की। इस पर मतभेद निश्चित तौर पर हो सकता है कि जीडीपी विकास के बीच संपदा और रोजगारों का समानतापूर्ण बंटवारा हो रहा है या नहीं। लेकिन इस पर अब विवाद की गुंजाइश नहीं कि विकास हो रहा है। जीएसटी कर संग्रह में लगातार बढ़ोतरी और कच्चे तेल के दाम में भारी गिरावट का सरकार ने बखूबी लाभ उठाया है। यहां आईएमएफ (अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष) का अप्रैल, 2023 में जारी वैश्विक आकलन गौरतलब है कि, विश्व की औसत विकास दर वर्ष 2022 के 3.4 प्रतिशत से गिरकर 2023 में 2.8 फीसदी रह सकती है और अमेरिका-इंग्लैंड जैसे विकसित देशों में तो यह वर्ष 2024 तक घटकर एक फीसदी मात्र रह जाएगी।
इसी तरह विश्व भर में औसत महंगाई दर के सात फीसदी रहने का अनुमान है। ऐसे में, वर्ष 2023-24 में 5.1 प्रतिशत मुद्रास्फीति और 6.5 फीसदी विकास दर के रिजर्व बैंक के अनुमान आश्वस्त करते हैं। वैश्विक मंदी और क्रिप्टो संकट जैसी वित्तीय आपदाओं से देश को बेअसर रखने का श्रेय भी केंद्रीय बैंक को मिलेगा। आखिर वर्ष 2022 में हमने श्रीलंका, लेबनान, जाम्बिया, सूरीनाम जैसे मुल्कों को बाकायदा दिवालिया होते देखा है और अपने पड़ोसी पाकिस्तान के हालात भी सब देख ही रहे हैं।