आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के बारे में अलग-अलग राय है। कोई इसे डरावना बताता है, तो कोई जटिल। किसी के मुताबिक, इसे जरूरत से ज्यादा महत्व मिला है, तो कोई इसे आश्चर्यजनक बताता है। उदाहरण के लिए, सैनफ्रांसिस्को स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया के शोधार्थी इस साल सोचने और बोलने की क्षमता खो चुके लोगों में ब्रेन मॉनिटर स्थापित कर पाने में सफल हुए। इसका उद्देश्य स्ट्रोक, एएलएस या दौरों के कारण बोलने की क्षमता खो चुके लोगों को बातचीत कर पाने में सक्षम बनाना है। यह एक असाधारण उपलब्धि है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता जिस एक क्षेत्र में हमारी असंदिग्ध मदद कर सकती है, वह मानसिक स्वास्थ्य का क्षेत्र है। बीमारियों के बारे में पता करने के लिए कई तरह की जांच व्यवस्था है। लेकिन कोई भी जांच ठीक-ठीक यह नहीं बता सकती कि अमुक व्यक्ति को डिप्रेशन है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंदों के डॉक्टर इतने साधारण होते हैं कि वे किसी व्यक्ति के डिप्रेशन के बारे में नहीं बता सकते, न ही यह भविष्यवाणी कर सकते हैं कि अमुक व्यक्ति आनेवाले दिनों में डिप्रेशन का शिकार हो सकता है। हमारे आसपास बहुत-से ऐसे लोग हैं, जो आत्महत्या करने के बारे में सोचते हैं। लेकिन पहले से यह कह पाना बहुत कठिन है कि कौन-सा व्यक्ति खुद को खत्म कर देने के बारे में गंभीर है। बहुत-से लोग तब तक अपना इलाज नहीं करवाते, जब तक उनकी बीमारी गंभीर न हो जाए।