पर्व एवं त्योहार वास्तविक अर्थों में हमारे सांस्कृतिक जीवन के पड़ाव होते हैं। पर्व शब्द मूलतः पोर से बना है। जिस तरह ईख में कई पोर होते हैं, उसी तरह विभिन्न त्योहार हमारे सामाजिक जीवन के विभिन्न पड़ाव हैं। ये हमारी शिथिल हो चुकी संवेदना में नए उत्साह का संचार करते हैं। दशहरा का पर्व आज हमारे लिए प्राचीनता एवं नवीनता के बीच का सेतु बना है, जो हमें अपनी सांस्कृतिक परंपरा और उसके महत्व की याद दिलाता है।
हमारे देश में ज्यादातर पर्व-त्योहार हमारी कृषि संस्कृति से जुड़े हुए हैं। दशहरे का पर्व भी तभी मनाया जाता है, जब धान की नई फसलें पकने को होती हैं। बरसात की समाप्ति और शरद ऋतु की शुरुआत में मनाया जाने वाला यह पर्व वास्तव में शिथिलता से सक्रियता की ओर उन्मुख होने का सूचक है। पहले बरसात के समय में नदी-नाले पानी से भर जाते थे। आने-जाने के रास्ते बंद हो जाते थे और लोगों का बाहरी कार्य-व्यापार एक तरह से ठप हो जाता था।
बरसात के चार महीनों, जिसे चतुर्मास कहा जाता है, के दौरान लोग केवल कृषि कार्यों में व्यस्त रहते थे। गांव की सीमा से लोगों का बाहर निकलना मुश्किल हो जाता था। वर्षा ऋतु की समाप्ति के बाद दशहरे के दिन ही लोग अपनी सीमा से बाहर निकलते थे। इसलिए दशहरे के दिन को देश के कई हिस्सों में यात्रा का दिन भी कहा जाता है और लोग नया काम शुरू करने के लिए इसे शुभ मानते हैं। क्षत्रिय कुलों में इस दिन शस्त्र पूजा की भी परंपरा है।
नवरात्रि और दशहरे का शक्ति की देवी दुर्गा एवं पुरुषोत्तम राम से गहरा संबंध है। कहा जाता है कि शक्ति की उपासना के बाद दशहरे के दिन ही रामचंद्र जी ने दशानन रावण का संहार किया था। इस अवसर पर मुझे महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कालजयी कविता राम की शक्ति पूजा याद आ रही है। निराला के राम काफी संशयग्रस्त और दुविधा में हैं। दरअसल शक्ति के दो रूप होते हैं-एक मंगलकारी और दूसरा अमंगलकारी। इस कविता में एक पंक्ति आती है-अन्याय जिधर है उधर शक्ति।
जब अन्यायी दुराचारी के पक्ष में शक्ति होती है, तो सत्य और अच्छाई की जीत को लेकर एक दुविधा बनी रहती है। हमारे समकालीन जीवन में एक बार फिर यह संकट गहरा गया है। ऐसे में निराला जी की इसी कविता की एक पंक्ति फिर याद आती है, शक्ति की करो मौलिक कल्पना। आज हमें ऐसी शक्ति का संधान करना होगा, जो मंगलमय एवं न्यायकारी हो।
नवरात्रि के अवसर पर होने वाली रामलीला काफी समय से हमारे सामाजिक जीवन का हिस्सा है। देश के विभिन्न हिस्सों में रामकथा अलग-अलग ढंग से गाई और कही जाती है, इसलिए रामलीला के भी विविध सांस्कृतिक रूप हमें देखने को मिलते हैं। लेकिन ज्यादातर रामलीला तुलसीकृत रामचरितमानस पर आधारित होती हैं।
कहा जाता है कि तुलसीदास ने रामचरितमानस का सृजन रामलीला के लिए ही किया था। हालांकि इसका कोई लिखित साक्ष्य नहीं है, लेकिन रामचरितमानस की संरचना नाट्यात्मक जरूर है। यह भी कहा जाता है कि सांस्कृतिक शहर बनारस में रामलीला की शुरुआत तुलसीदास ने ही करवाई थी। लेकिन समय के साथ-साथ जैसे हर चीजों के साथ होता है, उसी तरह रामलीला के मंचन में भी काफी परिवर्तन आया है। पहले लोग स्वतःस्फूर्त रामलीला का मंचन करते थे और इसके जरिये अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक भावनाओं का इजहार करते थे।
लेकिन अब रामलीलाएं आयोजित की जाती हैं, जिसके पीछे बाजार की शक्तियां होती हैं। आज नवरात्रि के अवसर पर शहरों में, मोहल्लों में होने वाली रामलीलाओं में फिल्मी गीतों का प्रचलन देखने में आता है। इसके आयोजकों में ज्यादातर ठेकेदार, बिल्डर, स्थानीय नेता आदि होते हैं, जिनके अपने-अपने निहित स्वार्थ भी होते हैं। बहरहाल, बाजार की शक्तियां चाहे जितनी भी हावी हों, दशहरे का त्योहार हमें यह याद तो दिलाता ही है कि यह बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व है। इतना ही नहीं, सांस्कृतिक विविधता के बावजूद यह आज भी देश के लगभग सभी हिस्सों में मनाया जाता है, जो हमारी उत्सवधर्मिता का परिचायक है।