सत्ताधारी यूपीए सरकार की नेता कांग्रेस पार्टी ने नवंबर के पहले रविवार को दिल्ली में एक रैली आयोजित की। उसे महारैली की संज्ञा दी गई। वह रैली घोषित रूप से यूपीए की सरकार तथा उसकी नीतियों के समर्थन में आयोजित की गई थी। रैली में यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गांधी, कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के भाषणों में सारा जोर भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार का बचाव करने पर था।
इसके साथ ही उनके भाषणों में नव उदारवादी आर्थिक सुधारों तथा खास तौर पर खुदरा व्यापार के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) की इजाजत देने की हिमायत की जा रही थी। लेकिन किसी भी भाषण में मौजूदा सरकार द्वारा जनता के विशाल बहुमत पर थोपे जा रहे बढ़ते हुए बोझ पर पछतावे का लेशमात्र नहीं था।
भ्रष्टाचार के मुद्दे पर यूपीए अध्यक्ष ने कहा कि वे लोग अपने खिलाफ लगे भ्रष्टाचार के सभी आरोपों का मुकाबला करेंगे और दोषी पाए गए किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा।
नेहरू-गांधी राजवंश के युवराज और कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने दावा किया कि उनकी पार्टी और सरकार ही है, जो भ्रष्टाचार के खिलाफ काम कर रही है। उन्होंने गर्जना की कि भ्रष्टाचार का मुकाबला करने के लिए व्यवस्था परिवर्तन करना होगा। उनकी टिप्पणी थी कि मैंने आठ साल तक भीतर रहकर व्यवस्था को देखा है।
मैं आपको बता रहा हूं कि समस्या व्यवस्था में ही है। लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि उनका व्यवस्था परिवर्तन क्या-क्या बदलाव लाएगा और यह बदलाव कौन लाएगा। संसद के पिछले शीतकालीन सत्र में लोकपाल विधेयक के पारित न होने के लिए विपक्ष को दोषी करार देते हुए उन्होंने कहा कि हम इसे पारित कराएंगे। बस आप थोड़ा-सा इंतजार कीजिए।
लेकिन यह तो सारा देश जानता है और उसने टेलीविजन के परदे पर देखा है कि किस तरह कांग्रेस ने संसद के पिछले शीतकालीन सत्र में राज्यसभा में मध्य रात्रि को इस विधेयक के पारित होने की प्रक्रिया विफल कर दी थी। रैली में हुए भाषणों में जनता को इस मामले में भी अटकलें ही लगाते रहने के लिए छोड़ दिया गया कि राज्यसभा के सामने विचाराधीन पड़े मौजूदा विधेयक को और मजबूत व कारगर बनाने के लिए जरूरी संशोधनों के साथ संसद से कब पारित कराया जाएगा।
जहां तक ‘व्यवस्था परिवर्तन’ के ऊंचे-ऊंचे दावों का सवाल है, यह रेखांकित करना जरूरी है कि नव उदारवादी अर्थव्यवस्था और तथाकथित सुधारों की मौजूदा व्यवस्था कायम करने के लिए सबसे बढ़कर कांग्रेस ही जिम्मेदार है, मौजूदा व्यवस्था के तहत उसने ही एक के बाद के एक घोटाले के रास्ते खोले हैं।
इस नव उदारवादी यात्रापथ के अपनाए जाने से ही हमारे देश में बदतरीन किस्म का दरबारी पूंजीवाद फूट पड़ा है। इसी के चलते लाखों-करोड़ रुपये की लूट पहले ही हो चुकी है और अब भी हो रही है। व्यवस्था परिवर्तन की बात तो दूर रही, उस रैली के तीनों मुख्य वक्ताओं ने नव उदारवादी सुधारों की नीतिगत रास्ते की हिमायत ही की और यह दावा किया कि इस तरह के सुधारों के बिना भारत का विकास नहीं हो सकता।
प्रधानमंत्री ने वास्तव में अपने भाषण में कथित आर्थिक सुधारों की इस तरह हिमायत की, जैसे वह कोई चुनावी सभा रही हो। यह दलील पेश करते हुए कि कोई भी देश आर्थिक विकास के बिना अपनी सबसे बड़ी चुनौतियों को हल नहीं कर सकता है, उन्होंने यह दावा भी किया कि विदेशी पूंजी के लिए अर्थव्यवस्था के दरवाजे और खोलने से युवाओं के लिए और रोजगार पैदा होंगे। हमारी जनता के विशाल बहुमत पर और ज्यादा बोझ लादे जाने को उचित ठहराते हुए प्रधानमंत्री का यह भी कहना था कि कई बार हमें आसान रास्ते की जगह मुश्किल रास्ता अपनाना पड़ता है, क्योंकि देश के भविष्य के लिए वही बेहतर होता है।
इसी स्वर में उन्होंने पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी को यह कहकर उचित ठहराया कि सरकार का सबसिडी बिल बढ़ रहा है। उनका कहना था कि इसके चलते राजकोषीय घाटे में बढ़ोतरी होने से लंबी अवधि में देश की जनता का ही नुकसान होगा। मनमोहन सिंह एक अर्थशास्त्री हैं, और इस नाते उन्हें इतना तो पता ही होगा कि अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड केन्स की एक बहुत ही चर्चित उक्ति है-लंबी अवधि में तो हम सभी मर चुके होंगे!
क्या गरीबों के हिस्से में आने वाली सबसिडियों की वजह से राजकोषीय घाटा बढ़ रहा है? पिछले साल के बजट दस्तावेजों के अनुसार, कॉरपोरेट कंपनियों तथा उच्च आयकर दाताओं को दी गई कर रियायतों यानी अमीरों की सबसिडियों में सरकारी राजस्व में से पूरे 5.28 लाख करोड़ रुपये झोंके गए थे। सरकार के हिसाब से बहुत ऊंचाई पर चला गया कुल बजट घाटा देश के सकल घरेलू उत्पाद के 6.9 फीसदी के बराबर यानी 5.22 लाख करोड़ रुपये बैठता है। साफ है कि राजकोषीय घाटे की सबसे बड़ी वजह अमीरों को दी जाने वाली इन सबसिडियों में ही छिपी है।
प्रधानमंत्री ने खुदरा क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत देने के फैसले की यह कहकर जोर-शोर से हिमायत की कि ऐसा जनता के और खास तौर पर किसानों के भले के लिए किया गया है। लेकिन दुनिया भर का अब तक अनुभव इस तरह के दावों को सिरे से झुठलाता है। इसे देखते हुए प्रधानमंत्री की इसकी चिंता बिलकुल खोखली नजर आती है। कांग्रेस की इस रैली में हुए भाषणों के बाद तो जनता को अपना यह संकल्प और मजबूत करना चाहिए कि कथित सुधार के इस रास्ते के खिलाफ और जबर्दस्त संघर्ष छेड़ने होंगे।