तकनीक और वित्तीय ताकत के मोरचों पर अभूतपूर्व तरक्की कर चुकी हिंदी पत्रकारिता गणेशशंकर विद्यार्थी के महत्व की अनदेखी नहीं कर सकती। वह हिंदी प्रदेश के उन थोड़े लोगों में से थे, जिनके वैचारिक मानस में स्वाधीनता संग्राम और भारत के सामाजिक-सांस्कृतिक निर्माण का स्पष्ट खाका अपना स्वरूप ग्रहण कर रहा था।
इसीलिए वह गांधीवादी असहयोग के रास्ते के साथ सशस्त्र क्रांतिकारी राजनीति को भी साधने की कोशिश कर रहे थे। वह पत्रकारिता का राष्ट्रीय प्रगतिशील मोरचा बना रहे थे और क्रांतिकारी संगठनों को मजबूत बनाने के लिए भी प्रयत्नशील थे।
वह कर्मयोगी और स्वराज से होते हुए आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की सरस्वती में पहुंचे थे, लेकिन उस पत्रिका का साहित्यिक-सांस्कृतिक रुझान गणेशशंकर विद्यार्थी जैसे अग्निधर्मी वैचारिक मेधा के तालमेल के अनुकूल नहीं था, क्योंकि सरस्वती की अपनी सीमाएं थीं। इसलिए विद्यार्थी ने मदन मोहन मालवीय के राजनीतिक पत्र अभ्युदय में काम करना शुरू किया।
उन्होंने अभ्युदय को नए संस्कार दिए, हालांकि वह सिलसिला लंबा नहीं चला। इसकी वजह थी प्रताप की योजना। नारायण प्रसाद अरोड़ा, शिव नारायण मिश्र वैद्य और यशोदा नंदन शुक्ल के सहयोग से प्रताप की योजना बनी। एक-सवा महीने की तैयारी में नौ नवंबर, 1913 को कानपुर से इसका साप्ताहिक प्रकाशन शुरू हो गया।
1920 में प्रताप का दैनिक संस्करण निकलना शुरू हुआ। इसका प्रकाशन किसान आंदोलन और ताल्लुकेदारों द्वारा किए जा रहे किसानों के जुल्म का घोषणापत्र था। जनवरी, 1921 के रायबरेली किसान विद्रोह और मुंशीगंज गोलीकांड की विस्तृत रिपोर्ट प्रताप ने प्रकाशित की। इसमें 13 जनवरी, 1921 को 'डायरशाही और ओडायरशाही' शीर्षक से लेख लिखा गया।
विद्यार्थी और उनका प्रताप सिर्फ ब्रिटिश साम्राज्यवाद-विरोध की लड़ाई नहीं लड़ रहे थे, बल्कि उस सामंतवाद के खिलाफ भी अलख जगा रहे थे, जो नौकरशाही और पुरोहितवाद का संयुक्त सरगना था। इस तरह प्रताप ब्रिटिश सत्ता की बर्बरता का भी विरोधी था और देशी रजवाड़ों के कुकृत्यों का भी।
किसान प्रश्न, जन शोषण और किसान आंदोलन संबंधी अपनी टिप्पणियों के कारण एक तरफ प्रताप को सरकार का कोप झेलना पड़ा, तो दूसरी तरफ रायबरेली के ताल्लुकेदार वीरपाल सिंह ने प्रताप को अपमानजनक मानकर मानहानि का मुकदमा चला दिया।
यहां से मानहानि के मुकदमे और जेल यात्राओं का दौर शुरू होता है। मानहानि के मुकदमे में प्रताप की हार हुई, लेकिन वह अपने लक्ष्य में सफल रहा। रायबरेली किसान विद्रोह और मुंशीगंज गोलीकांड प्रकरण में ब्रिटिश सरकार और सामंती शक्तियों का गठजोड़ जनता के सामने स्पष्ट हो चुका था।
वर्ष 1924 में प्रताप के एक संपादकीय में विद्यार्थी जी ने लिखा कि धर्म और ईमान पर किए जाने वाले भीषण व्यापार को रोकने के लिए दृढ़ता के साथ आगे बढ़ना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक भारतवर्ष में नित्य प्रति बढ़ते जाने वाले झगड़े कम न होंगे। कहना गलत नहीं कि विद्यार्थी सीमित अर्थों में लेखक-पत्रकार नहीं थे, बल्कि हिंदी प्रदेश में सामाजिक-सांस्कृतिक और आर्थिक प्रश्नों को राजनीति के साथ जोड़ने वाले क्रांतिकारी विचारक भी थे।
वर्ष 1915 से 1930 के बीच का हिंदी प्रदेश का कोई राजनीतिक, सशस्त्र क्रांतिकारी, सांस्कृतिक अथवा साहित्यिक अध्याय ऐसा नहीं है, जो गणेशशंकर विद्यार्थी के संदर्भ के बिना पूरा होता हो। वह हिंदी पत्रकारिता के संघर्षशील योद्धा थे, जो योद्धा की तरह जिए और लड़ते-लड़ते मरे। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु की फांसी की शोकाकुलता में डूबे विद्यार्थी जी कानपुर में हिंदू-मुसलिम दंगे की भयंकर लपटों को बुझाने में भी क्रियाशील रहे।
उनके प्रयासों से दंगों की लपटें कम होने लगी थीं, लेकिन 25 मार्च, 1931 को कानपुर के चौबे गोला इलाके में कुछ परिवारों को बचाने की कोशिश करते समय वह दंगाइयों के हाथों शहीद हो गए। उनकी शहादत भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की क्रांतिकारी परंपरा की महत्वपूर्ण कड़ी है।