भारतीय सेना की कर्मठता ने फिर साबित कर दिया है कि देशवासी उसके प्रति इतने आस्थावान क्यों रहते हैं। उत्तराखंड त्रासदी से बचकर सकुशल घर पहुंचे अनेक परिवार आज सेना का गुणगान कर रहे हैं। सेनाध्यक्ष जनरल विक्रम सिंह के गोचर में दिए गए उस बयान को लोग उद्धृत कर रहे हैं, जिसमें उन्होंने देशवासियों को आश्वासन दिया था कि जब तक आखिरी आदमी बाहर नहीं निकाला जाएगा, तब तक सेना वापस नहीं जाएगी। दूसरी तरफ सिविल प्रशासन के विरुद्ध शिकायतों की लंबी सूची है।
राज्य को इस त्रासदी से बचाने की न तो पहले कोई कोशिश की गई और न त्रासदी के समय सिविल प्रशासन या पुलिस का कोई कर्मचारी फंसे लोगों को बचाने के लिए मौके पर था। इसी कारण सेना की सहायता भी त्रासदी के दो दिन बाद शुरू हुई।
दरअसल सेना की संरचना, प्रशिक्षण, उसके काम करने का ढंग और अपने काम की जिम्मेदारी लेने का तरीका ही उसे विशिष्ट बनाता है। सेना में भर्ती दो स्तरों पर होती है, सैनिक स्तर पर और अधिकारी स्तर पर।
दोनों की भर्ती की अधिकतम आयु क्रमशः 21 और 24 वर्ष रखी गई है। इस उम्र तक ज्यादातर नौजवान अपनी प्राकृतिक मनोदशा में होता है तथा उसकी शारीरिक और मानसिक बनावट को सेना के अनुरूप बदला जा सकता है। इसके बाद शुरू होता है, सख्त प्रशिक्षण। सेना की ट्रेनिंग का सर्वोपरि उद्देश्य होता है, एक अच्छा इंसान बनाना। सेना का मानना है कि जो अच्छा इंसान होगा, वह एक अच्छा सैनिक भी बन सकता है।
इसलिए हर जवान और अधिकारी में देश के प्रति वफादारी, कर्तव्यपरायणता, ईमानदारी, मेहनत और देश पर सब कुछ बलिदान करने का जज्बा पैदा किया जाता है। एक अभ्यर्थी अफसर को पूरे दो वर्ष की प्रशिक्षण अवधि में जेंटलमैन के नाम से पुकारा जाता है। सेना में अधिकारी जो आचरण स्वयं करता है, उसी की अपेक्षा वह अपने अधीनस्थों से करता है। वर्ष 1947 से अब तक दुश्मन से टक्कर लेते हुए पहले अधिकारियों ने प्राण की आहुति दी है।
जवाबदेही सेना की एक बड़ी विशेषता है। यदि कोई सैनिक या अधिकारी सेना की गरिमा के अनुरूप बर्ताव नहीं करता, तो उसके विरुद्ध त्वरित कार्रवाई होती है। सुखना जमीन घोटाले में एक साल के अंदर सेना के दो-दो तीन सितारा जनरलों को सजा दी गई। 1971 के युद्ध में जहां वीरता के लिए पुरस्कार दिए गए, वहीं कोताही बरतने के आरोपों पर सजाएं दी गईं, यहां तक कि सिविल जेल में डाला गया। कारगिल युद्ध के कारणों की तलाश में सेना के कई अधिकारी प्रताड़ित किए गए।
लापरवाही बरतने पर त्वरित कार्रवाई होने के डर से हर सैनिक अपनी जिम्मेदारी तुरंत निभाने को अपना सबसे बड़ा कर्तव्य समझता है। इसीलिए चाहे भुज में भूकंप हो या लातूर में, दक्षिणी सागर तटों पर आई सुनामी हो या हाल में उत्तराखंड में आई त्रासदी, सेना के तीनों अंगों ने मानवता और देश की सेवा को अपना सबसे बड़ा कर्तव्य समझा।
दूसरी ओर, उत्तराखंड से वापस आने वाला हर आदमी यही कहता आ रहा है कि सिविल प्रशासन का उन क्षेत्रों में नाम-ओ-निशान नहीं था। ऐसा इसलिए कि भ्रष्टाचार ने मानवता को निगल लिया। रोजाना नए-नए घोटाले का पर्दाफाश हो रहा है। घोटालों और लापरवाहियों के कारण किसी को सजा नहीं मिलती। छत्तीसगढ़ में नक्लसियों ने बड़ा हमला किया, लेकिन वहां तैनात अर्धसैनिक बल और राज्य पुलिस उनका पता नहीं लगा पाए।
वर्ष 2007 में आपदा प्रबंधन प्राधिकरण बन गया था, परंतु अभी तक इसकी एक बार बैठक तक नहीं हुई, जबकि इस पर हर साल करोड़ों खर्च हो रहे हैं। आज देश में जवाबदेही का हाल इस प्रकार है कि चाहे बाढ़ या सुनामी की ही चेतावनी क्यों न हो, संबंधित अधिकारियों पर कोई असर नहीं पड़ता, क्योंकि वे जानते हैं कि हमारे देश में जवाबदेही तय करने की परंपरा है ही नहीं और यदि हो भी, तो सजा किसी को होनी नहीं है। ऐसे निराशाजनक माहौल में सेना देशभक्ति के जज्बे के साथ किसी मुहिम पर जुटती है और उसे अंजाम तक पहुंचाती है, तो उससे खुशी भी होती है और उम्मीद भी पैदा होती है।