उद्देश्य छोटा हो सकता है, समय के साथ बदल सकता है (सांकेतिक)
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कई बार हम वह जीवन जी रहे होते हैं, जिसकी कल्पना दूसरों ने हमारे लिए की होती है। इसलिए, अंत में सब कुछ हासिल करने के बाद भी मन में एक सवाल रह जाता है कि आखिर यह सब किसलिए? बोस्टन की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट एलेन हेन्ड्रिक्सन ऐसे कई लोगों से मिलती हैं, जो जीवन की दिशा या उद्देश्य को लेकर उलझन में हैं। विशेषज्ञ लोगों की इस बेचैनी को ‘पर्पज एंजाइटी’ यानी जीवन के लक्ष्य को लेकर होने वाली चिंता कहते हैं। इसकी जड़ में अक्सर यह सवाल होता है कि हम जो कर रहे हैं, क्या वह वास्तव में हमारे लिए मायने रखता है?
जॉर्ज मेसन यूनिवर्सिटी के मनोविज्ञान के प्रोफेसर टॉड बी कशदान के अनुसार, जीवन का उद्देश्य मिल जाने पर वह जीवन को दिशा देने वाले नक्शे की तरह काम करता है। इससे खुशी, संतुष्टि और शारीरिक स्वास्थ्य बेहतर हो सकते हैं, जबकि अवसाद व चिंता का जोखिम घट सकता है। मगर उद्देश्य कोई बहुत बड़ा लक्ष्य ही हो, यह जरूरी नहीं। अक्सर हम मान लेते हैं कि जीवन का मकसद कुछ असाधारण हासिल करना या दुनिया बदल देना है। यही सोच हमें बेचैन करती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, उद्देश्य छोटा हो सकता है, समय के साथ बदल सकता है और जीवन में एकसाथ कई उद्देश्य भी हो सकते हैं। शोध बताते हैं कि दूसरों के काम आने से जीवन में अर्थ बढ़ता है। हालांकि, उद्देश्य खोजना इतना आसान भी नहीं है। 2,400 से अधिक जेन-जी पर हुए एक सर्वे में करीब 45 प्रतिशत ने जीवन में सार्थकता या उद्देश्य की कमी महसूस की।
उद्देश्य खोजने का पहला तरीका है नए अनुभवों को आजमाना। अलग-अलग गतिविधियों में हिस्सा लें और सोचें कि कौन-से अनुभव आपको सबसे अधिक जीवंत महसूस कराते हैं। यह समझना भी जरूरी है कि ऐसा क्यों होता है। दूसरा रास्ता मुश्किलों में नई दिशा तलाशना है। मसलन, चोट के कारण खेल छोड़ने वाला खिलाड़ी दूसरों की रिकवरी में मदद करने का उद्देश्य खोज सकता है। तीसरा तरीका दूसरों से सीखना है। ऐसे लोगों पर ध्यान दें, जिनका जीवन आपको प्रेरित करता है। साथ ही, जिन व्यवहारों को आप गलत मानते हैं, उनसे भी सीखें कि आप कैसा इन्सान नहीं बनना चाहते। इसलिए, जरूरी नहीं कि जीवन का उद्देश्य हमेशा कोई बड़ी उपलब्धि हासिल करना ही हो।