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कोई गांधी या भगत सिंह जैसा

Fri, 25 Apr 2014 07:38 PM IST
पीयुष मिश्रा
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लोग सामाजिक-राजनीतिक बदलावों की बातें कर रहे हैं, लेकिन मुझे ऐसा कुछ नहीं दिखाई देता है। हाल के वर्षों में हुए जिन जनांदोलनों की चर्चा है, वे कोई बहुत नई बात नहीं है। ऐसा वर्षों से होता आया है कि जनता सड़कों पर उतरी है। लोगों के मोमबत्तियां लेकर सड़कों पर उतर आने को आश्चर्यजनक रूप से प्रचार मिला है। ज्यादा समय नहीं हुआ, जब अजमल कसाब और उसके साथ पाकिस्तान से आए आतंकियों ने गोलियां चलाकर सैकड़ों लोगों को मार डाला। फिर लोग मोमबत्तियां लेकर घरों से निकल आए। गेटवे ऑफ इंडिया पर पहुंच गए। इससे क्या हुआ? घटनास्थल की सफाई करने वालों ने कहा कि लोगों के इन जगहों पर मोमबत्तियां जलाने से जो मोम इकट्ठा हो गया, उसे साफ करना खून साफ करने से ज्यादा कठिन था। मोमबत्तियों से आखिर कौन-सी क्रांति होगी?
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उस घटना के बाद मैंने आह्वान किया था कि कसम खाएं कि इस साल मुंबई का कोई व्यक्ति टैक्स नहीं देगा। अगर आप ऐसी प्रतिक्रिया देंगे, तो यह होगा आपका सरकार को जवाब है कि आपने हमें सही ढंग से सुरक्षा मुहैया नहीं कराई, तो हम आपका आर्थिक सहयोग नहीं करेंगे। ऐसी बातें करें, तो समझ आएगा कि आप प्रतिक्रिया कर रहे हैं। क्रांति की तरफ कदम बढ़ा रहे हैं। परंतु ऐसा नहीं है कि लोगों में गुस्सा नहीं है। वह तो है। देश में भ्रष्टाचार इतना बढ़ चुका है कि अब हर हाल में इसे खत्म करने की जरूरत आन पड़ी है। मुझे लगता है कि इसके खात्मे के लिए हमें किसी राजनीतिक पार्टी की नहीं, बल्कि एक व्यक्ति की जरूरत है। ऐसा व्यक्ति, जिसे यह चिंता न हो कि पांच साल बाद मैं चुना जाऊंगा या नहीं। जो किसी की न सुने। अपनी कैबिनेट की भी नहीं। वह वही करे, जो उसकी मर्जी हो। वह सिर्फ ऐसे कदम उठाए, जो सिर्फ और सिर्फ देश तथा लोगों की भलाई के लिए हों।

यह व्यक्ति आपको अच्छा लगे या ना लगे, एकबारगी जरूर उस पर आपको यकीन करना पड़ेगा। ऐसे व्यक्ति को आप तानाशाह भी कह सकते हैं। लेकिन क्या वह ऐसा होगा? नहीं, मेरी नजर में वह व्यक्ति महात्मा गांधी या भगत सिंह की तरह होगा। जिद्दी। इतिहास उठाकर देखिए। इन दोनों ने किसी की नहीं सुनी। भगत सिंह ने एक बार ठान लिया कि बहरी अंग्रेज सरकार को अपनी आवाज सुनानी है, धमाका करना है, देश पर मर मिटना है, तो बस कर दिखाया। ऐसा ही गांधी जी ने किया। वह जो चाहते थे, वही करते थे। उन्होंने कामयाबी की तरफ बढ़ते जनांदोलन वापस ले लिए। आपको लग सकता है कि आज ऐसे लोगों को समाज स्वीकार नहीं करेगा, लेकिन गांधी जी और भगत सिंह को स्वीकार किया गया या नहीं? उस वक्त हम अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रहे थे और आज हम उनके खिलाफ हैं, जो तरक्की के रास्तों पर भ्रष्टाचार के बैरीकेड्स लगाए बैठे हैं। जिस जिद्दी व्यक्ति की मैं बात कर रहा हूं, उसमें और तानाशाह में बहुत बारीक अंतर है, जिसे हमको समझना होगा। ऐसे लोग सदियों में पैदा होते हैं और जब सामने आते हैं, तो आपकी समझ में आ जाता है कि यह व्यक्ति किसी की सुनने वाला नहीं। जनता भी जान जाती है कि यह हमारी भलाई करने के लिए आया है।
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ऐसा नहीं है कि जब इस तरह के लोग आते हैं, तो आसानी से उन्हें स्वीकार कर लिया जाता है। शुरुआत में महात्मा गांधी का भी बहुत विरोध हुआ था। बाहर ही नहीं, अंदर भी। जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल ने भी उनकी बातों को आसानी से स्वीकार नहीं किया था। गांधी जी को भी बहुत संघर्ष करना पड़ा। भगत सिंह के साथियों ने भी उनकी बातों को सहजता से नहीं मान लिया था। उनके वरिष्ठ तो चकित थे कि यह लड़का हमें क्रांति करना सिखाएगा!

बदलाव की आहटें समय के साथ आने लगती हैं। किसी ने जनता को भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ खड़े होने को थोड़े कहा। हर चीज की एक सीमा होती है। मिडिल क्लास इस देश का सबसे सहज वर्ग है। अन्ना का आंदोलन हुआ, तो पूरा मध्य वर्ग जंतर-मंतर पर खड़ा नजर आया। कांग्रेस के नेतृत्ववाली सरकार ने इतने भ्रष्टाचार किए कि एक-एक कर वे आखिर सामने आने लगे। इसके साथ लोगों का गुस्सा भी निकल कर दिखाई पड़ने लगा।

दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार का मामला लीजिए। क्या उससे पहले ऐसे हादसे नहीं हुए थे? लेकिन एक वक्त लोगों के गुस्से में उबाल आ गया। उन्हें समझ में आ गया कि यह हादसा आज किसी पर गुजरा है, तो कल हमें भी इसका सामना करना पड़ सकता है। हम ऐसे समाज में हैं, जहां जब तक आदमी में यह डर नहीं जागता कि हम भी शिकार हो सकते हैं,तो वह प्रतिक्रिया नहीं करेगा। मैं देश के राजनीतिक-सामाजिक भविष्य के प्रति आशान्वित हूं। बेहतर बदलाव भले ही पांच साल या फिर दस साल बाद आए, लेकिन आएगा जरूर। चाहे वह वर्तमान राजनीतिक दलों की ओर से आए या फिर किसी नए दल की तरफ से।

इस देश के युवाओं को मैं बहुत उम्मीद की नजर से देखता हूं। मैं देखता हूं कि वे भरे बैठे हैं। वे कहते हैं कि आप हमें ‘गुलाल’ दो, नहीं तो हम ‘ग्रैंड मस्ती’ देखेंगे। तब हमें दोष मत देना। ऐसे में यह जिम्मेदारी हमारी बनती है कि हम उन्हें अच्छा सिनेमा, अच्छा साहित्य, अच्छा समाज दे रहे हैं या नहीं। हममें से कई लोगों को गलतफहमी है कि आज का युवा आत्मकेंद्रित है। लेकिन यह सच नहीं है। पूरी युवा पीढ़ी हमारे सामने है, जो अपने अंदाज में रिएक्ट करती है। उसमें जबर्दस्त जोश है। वक्त आने दीजिए, हम उन्हें प्रतिक्रिया करने के बड़े कारण भी देंगे।
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