मैं बचपन से देख रहा हूं। राजनीति और फिल्मों की एक ही कहानी है। सवाल सब खड़े कर देते हैं, मगर जवाब कोई नहीं देता। हिंदी फिल्मों में भी नायक सवाल पूछता चला जाता है, मेरे सवालों का जवाब दो, दो न, दो न... नायिका पहले सकुचाती है, फिर नाचती और मुस्कराती है, पर नायक को कतई गंभीरता से नहीं लेती। उसके सवालों का जवाब नहीं देती।
यही हाल कमोबेश राजनीति का है। कोई भी पार्टी या नेता किसी से भी सवाल पूछ बैठता है। चुनावों के दौरान सवालों का औसत और बढ़ जाता है। लेकिन सवालों से कभी किसी पर कोई फर्क पड़ते नहीं देखा है मैंने। एक पार्टी सवाल पूछती है, सामने वाली पार्टी इठलाती है, मुस्कराती है, पर उसका जवाब नहीं देती। फिर वह जवाब देने की जगह स्वयं कुछ सवाल प्रश्नकर्ता की ओर उछाल देती है। सामने वाली पार्टी भी गंभीर है, वह भी जवाब नहीं देती। दोनों नए-नए सवाल ढूंढकर एक-दूसरे पर उछालते हैं, पर जवाब किसी को नहीं मिलता। सवालों का यह सिलसिला राजनीति के पटल पर लगातार दोहराया जा रहा है।
जनता हमेशा की तरह बीच में खड़ी है। वह सिर्फ सवालों का फुटबॉल एक-दूसरे के पाले में जाते हुए देखती रहती है। वह मूक-बधिर-सी खड़ी सवालों का मैच देखती रहती है। उसके पास भी ढेरों सवाल हैं। न जाने कितने वायदे और आश्वासन हैं उसकी झोली में। न जाने कितने मन गरीबी और महंगाई से छुटकारे के सपने देख रहे हैं। न जाने कितने लोग विकास की गंगा के सपने देख रहे हैं। उनके सवाल यह भी हैं कि नेता ईमानदारी के सागर में कब डुबकी मारेंगे। आखिर कब भ्रष्टाचार का अस्तित्व मिटेगा? कमरतोड़ महंगाई से उन्हें कब मुक्ति मिलेगी?
मगर जनता को सवाल दागने का अधिकार है ही कहां! एकपक्षीय व्यवस्था है बस। जनता के नसीब में तो केवल सुनना ही है। उसे सत्ता पाने के लिए एक-दूसरे पर उछाले गए सवालों के सौंदर्य को देखना है। कितना ही पूछ लो कि मेरे सवालों को जवाब दो, दो न। लेकिन जवाब कोई नहीं देगा। कम से कम इस जन्म में तो नहीं।