वर्ष 1995 के बर्लिन सम्मेलन से लेकर कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज यानी कॉप का यह 28वां सम्मेलन है। कॉप शिखर सम्मेलन का रिकॉर्ड भव्य घोषणाओं और कार्रवाई के बीच के अंतराल से उजागर होता है। उन्नत अर्थव्यवस्थाओं ने विकासशील देशों के लिए वर्ष 2009 में 100 अरब डॉलर के कोष का वादा किया था, जिसे पूरा करने में वे विफल रही हैं। निश्चित रूप से इसमें बहुत से नेक इरादे, अध्ययन और रिपोर्ट शामिल हैं। फिर भी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन वर्ष 2022 में पूर्व-औद्योगिक युग से 50 फीसदी ऊपर था, जो वर्ष 2023 में रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गया। इसके परिणाम विभिन्न संकेतकों में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
दुनिया भर में ग्लेशियर पिघल रहे हैं, जो जलवायु परिवर्तन के विश्वसनीय चिह्न हैं। ग्रीनलैंड में 20,000 से ज्यादा ग्लेशियर हैं। तस्वीरें दर्शाती हैं कि ग्लेशियर 20वीं सदी की तुलना में दोगुनी तेजी से पिघल रहे हैं। दुनिया के दो तिहाई उष्णकटिबंधीय ग्लेशियरों का घर पेरू पिछले छह दशकों में अपने आधे से ज्यादा ग्लेशियर खो चुका है। अमेरिका में जलवायु विज्ञानियों को चिंता है कि उत्तरी कैस्केड ग्लेशियर का क्षेत्रफल कम हो रहा है और बिना वर्षा संचय के यह लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकता। आर्कटिक से लेकर अंटार्कटिका तक से आने वाले आंकड़ों में ग्लेशियरों की बुरी स्थिति दिख रही है।
नेशनल स्नो ऐंड आइस डाटा सेंटर के अध्ययन दिखाते हैं कि पिछले चार दशकों में आर्कटिक क्षेत्र में 19.9 लाख वर्ग किलोमीटर यानी करीब मैक्सिको के बराबर क्षेत्र में बर्फ का आवरण खत्म हो गया है। इस जुलाई में अंटार्कटिक बर्फ '1981 से 2010 के औसत की तुलना में तेजी से कम हुई और औसत से 26 लाख वर्ग किलोमीटर यानी लगभग अर्जेंटीना जितने बड़े क्षेत्र में कम हो गई।
हैरानी की बात नहीं कि उपेक्षा से चरम मौसमी घटनाएं बढ़ रही हैं। वर्ष 1800 के बाद से तीसरे सबसे गर्म वर्ष में इटली में प्रतिदिन 11 चरम मौसमी घटनाएं देखी गईं। यूरोप के अधिकांश हिस्सों में लू चलते देखी गई। उत्तरी अमेरिका बाढ़, रिकॉर्ड तोड़ वनाग्नि और उच्च तापमान से जूझ रहा है-फीनिक्स, एरिजोना में लगातार 54 दिनों तक 40 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान था। विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने जुलाई और अगस्त, 2023 को अब तक का सबसे गर्म महीना घोषित किया, जबकि अमेरिकी मौसम प्रशासक ने सितंबर और अक्तूबर, 2023 को 174 वर्षों में सबसे गर्म बताया। सिर्फ लू का कहर ही नहीं रहा, बल्कि बाढ़ के चलते भी कई इलाके जलमग्न हो गए।
जुलाई में भारत के कई शहर, गुजरात के जूनागढ़ से असम के जोरहाट तक ने भारी बाढ़ का सामना किया। जुलाई में मुंबई में इतिहास की सबसे ज्यादा बारिश रिकॉर्ड की गई। मूसलाधार बारिश एवं उफनती नदियों के कारण पंजाब, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली में बाढ़ आ गई। जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर समझौतों, भाषणों एवं कार्रवाई के आह्वान की कोई कमी नहीं है। पिछले पखवाड़े फ्रांस के राष्ट्रपति इमैन्युअल मैक्रों ने पेरिस पीस फोरम में दुनिया भर के करीब 'दो लाख ग्लेशियरों के स्थायी (अपरिवर्तनीय) रूप से पिघलने' का जिक्र किया और इसे 'मानवता के लिए अप्रत्याशित चुनौती' बताया। अंटार्कटिका की यात्रा पर गए संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटेनियो गुटेरस ने दुनिया से 'तत्काल कार्रवाई' करने का आग्रह किया और घोषणा की कि 'अंटार्कटिका में जो होता है, उसका असर सिर्फ अंटार्कटिका तक नहीं रहता है।'
जितना कहा जाता है, उतना शायद ही कभी किया जाता है। ग्लेशियरों के पिघलने और जोखिमों की कहानियां कई रिपोर्टों में आई हैं। वर्ष 2022 की आईपीसीसी रिपोर्ट में पाया गया कि आर्कटिक पारिस्थितिकी तंत्र में परिवर्तन उस स्थिति के करीब पहुंच रही है, जिसे पूर्व स्थिति में लाना मुश्किल है। संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा सम्मेलन (यूएनएफसीसीसी) ने नुकसान और क्षति के लिए एक कोष की स्थापना, वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री के भीतर रखने के स्पष्ट इरादे, व्यवसायों एवं संस्थानों को जवाबदेह बनाने, विकासशील देशों के लिए धन जुटाने और कार्यान्वयन के लिए धुरी बनाने को निष्कर्षों के रूप में सूचीबद्ध किया।
यूएनएफसीसीसी ने कहा कि जलवायु प्रतिज्ञाओं का तब तक कोई मतलब नहीं है, जब तक उन्हें ठोस कार्रवाई में नहीं बदला जाता। लेकिन जब आखिरी बार समीक्षा की गई, तो वे प्रतिज्ञाएं कागजों पर ही थीं। अतीत भविष्य की प्रस्तावना है। एक वैश्विक रिपोर्ट बताती है कि दुनिया पेरिस लक्ष्यों को प्राप्त करने की राह पर नहीं है और चेतावनी देती है कि पूर्व औद्योगिक स्तरों से तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का अवसर तेजी से खत्म हो रहा है।
वास्तव में सोमवार को संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) ने चेतावनी दी है कि राष्ट्रों को मौजूदा पेरिस वादों से आगे बढ़ना होगा, या 2.5–2.9 डिग्री सेल्सियस वैश्विक तापमान का सामना करना करना होगा। त्रासदी यह है कि जो लोग जलवायु परिर्तन को बढ़ाने वाले उत्सर्जन के लिए सबसे कम जिम्मेदार हैं, उन्हें सबसे ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। दुनिया के सबसे गरीब लोग जलवायु परिवर्तन के सबसे बुरे प्रभावों का खामियाजा भुगत रहे हैं। सबसे बुरी बात है कि तानाशाही और लोकतंत्रवादी समान रूप से शासन की विफलताओं के लिए जलवायु परिवर्तन का बहाना बनाते हैं।
सच है कि जलवायु परिवर्तन परस्पर विरोधी भू-राजनीतिक और घरेलू मजबूरियों के चौराहे पर है। इसके साथ ही जरूरी वैश्विक नेतृत्व कौशल के अभाव में समस्या और भी बदतर होती जा रही है। इस बीच विश्वसनीय कार्रवाई के मामले में दिखाने के लिए कुछ भी न होने के बावजूद शिखर सम्मेलन होते रहेंगे।