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दिल्ली की लड़ाई में अन्ना का चेहरा

Thu, 22 Jan 2015 11:40 PM IST
मनीषा प्रियम
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वर्ष 2012 में नरेंद्र मोदी ने गुजरात के विधानसभा चुनाव में तीसरी बार जीत दर्ज करके यह साबित किया था कि राज्य स्तरीय चुनाव प्रक्रिया में उनकी और उनकी टीम का खासा प्रभाव है। हालांकि उस वक्त यह सवाल उठा था कि विधानसभा चुनाव के 'दिग्गज' मोदी क्या राष्ट्र स्तरीय चुनाव जीत पाएंगे। मगर 2014 में लोकसभा चुनाव में भाजपा की ऐतिहासिक जीत ने यह साबित कर दिया कि मोदी के नेतृत्व में उनकी टीम में अभूतपूर्व जीत दर्ज करा सकने की क्षमता है। कई लोगों ने उन्हें और उनकी टीम को 'इलेक्टरल मशीन' का दर्जा तक दे दिया। लोकसभा चुनाव के बाद भी विभिन्न राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा के प्रदर्शन से यह स्पष्ट हुआ कि मोदी के राष्ट्रीय नेतृत्व में राज्यों के विधानसभा चुनाव जीते जा सकते हैं। चूंकि नवगठित केंद्र सरकार को राज्यों के मुख्यमंत्रियों की भी मदद चाहिए और राज्यसभा में बहुमत भी। इसलिए यह आवश्यक था कि भाजपा उन राज्यों में भी अपनी जड़ें जमाए, जहां उसका प्रभाव अपेक्षाकृत कम था। झारखंड और हरियाणा में मिली जीत उसके लिए संजीवनी की तरह ही रही। अब इस टीम के सामने अगली चुनौती दिल्ली है, जहां का सियासी आसमान साफ नहीं दिख रहा।
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सर्वेक्षण बताते हैं कि अरविंद केजरीवाल की लोकप्रियता में कमी तो आई है, पर वह सत्ता की दौड़ में कायम हैं। भाजपा और उनके बीच का अंतर ज्यादा का नहीं है। बेशक पिछली बार सत्ता जल्दी छोड़कर जाने के कारण आम मतदाताओं में उन्हें लेकर नाराजगी है, पर आम आदमी पार्टी द्वारा उठाए गए मुद्दों से वे सहमत हैं। विशेष रूप से राज्य के गरीब मतदाता और पिछले तबके के कामकाजी लोग आप को अपने बीच की ही एक पार्टी मानते हैं। जिस तरह किसी जमाने में 'दमकिपा' (दलित मजदूर किसान पार्टी) के नाम में जो जोर था, वही सम्मोहन अब 'आप' में सर्वहारा वर्ग के लिए है। ऐसे में जमी-जमाई पार्टियों के लिए आप की चुनौती से पार पाने के लिए बड़े चेहरे की तलाश स्वाभाविक है। यही वजह है कि महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड में मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम का ऐलान न करने वाली भाजपा को 'इंपोर्टेड' नेतृत्व पर भरोसा करना पड़ा और किरण बेदी को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बनाना पड़ा। दिलचस्प है कि जिस पार्टी ने महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे राज्यों में 'एकला चलो' की नीति अपनाई और चुनाव पूर्व शिवसेना जैसे पुराने साथियों को भी दरकिनार किया, उसने सामाजिक आधार होने के बावजूद दिल्ली में अपने कैडर और नेताओं पर भरोसा नहीं किया। आखिर इस विवशता की वजह क्या है? इसका जवाब अन्ना हजारे के आंदोलन से निकलता दिख रहा है।

दरअसल दिल्ली के असली नेता अन्ना हजारे हैं। राष्ट्रीय राजधानी में एक अखिल भारतीय आंदोलन करके वह इस शहर का मर्म छू चुके हैं। उनकी वजह से ही यह शहर, जिसका उच्च वर्ग खुद में मस्त था और निम्न वर्ग सवाल पूछने की हिम्मत और अवसर से जूझ रहा था, पूर्व की सभी अवधारणाओं को खंडित करने में सक्षम हुआ। अन्ना आंदोलन और फिर दिसंबर, 2012 में निर्भया को इंसाफ दिलाने को लेकर हुए आंदोलनों के बाद इस शहर में सवाल कर सकने की क्षमता उभरी है। यही कारण है कि दिल्ली विधानसभा चुनाव में दोनों महत्वपूर्ण प्रतिद्वंद्वी दलों को अन्ना आंदोलन की सबसे पहली पंक्ति के नेताओं का चयन करना पड़ा। इंडिया अगेंस्ट करप्शन आंदोलन में अन्ना हजारे के सहयोगियों में अरविंद केजरीवाल के अलावा कई अन्य लोग थे, पर आम आदमी पार्टी ने भी एक चेहरे का ही चयन किया। इसी तरह शहर की सियासी आबोहवा को देखकर भाजपा भी अन्ना आंदोलन के एक अन्य प्रमुख चेहरे को परोसने के लिए मजबूर हुई। यानी स्थानीय सामाजिक आंदोलनों का असर चुनावी राजनीतिक प्रक्रिया पर प्रभावी रूप से पड़ता दिख रहा है। चूंकि दिल्ली की भौगोलिक सीमा छोटी है और यहां सूचना का प्रचार-प्रसार भी काफी तीव्र गति से होता है। साथ ही, अन्ना आंदोलन के बाद इस सीमित भूखंड में राजनीतिक चेतना बहुत उग्र रूप से फैल गई है। इसलिए ये सभी दल जानते हैं कि पुराने पके-पकाए माल परोसने से मतदाता संतुष्ट नहीं होंगे। यही वजह है कि भाजपा ने किरण बेदी को आगे किया, ताकि जनता को यह भरोसा दिलवाया जा सके कि भले भाजपा पुराना दल है, पर उसकी सोच में नई काबिलियत है; वह पुराने ढर्रे को किनारे करने को तैयार है। सरल अर्थों में कहें, तो पुराने माल पर एक नया लेबल लगाकर भाजपा नए राजनीतिक तेवर दर्ज कराने की पहल कर रही है।
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रही बात अन्ना की, तो उन्होंने ठीक वैसे ही मुख्यधारा की राजनीति से परहेज किया, जिस तरह कभी जयप्रकाश नारायण ने किया था। जेपी की तरह ही वह राजनीति पर सवाल तो खड़े करते रहे हैं, पर सत्ता की गद्दी से दूर हैं। बेशक यह सच है कि वह राजनीतिक दलों से बात करते हैं और कई राजनीतिक नेता उनसे संपर्क में हैं, पर वह राजनीतिक प्रक्रिया से दूरी चाहते हैं। यह कहना ज्यादा उचित होगा कि कांग्रेस को छोड़कर कमोबेश सभी महत्वपूर्ण राजनीतिक दलों पर अन्ना के त्याग और उनके आमरण अनशन के हठ का बहुत बड़ा असर पड़ा। यद्यपि भारतीय लोकतंत्र में चुनाव को ही सबसे बड़ा पर्व माना गया है, मगर लोकतंत्र तभी स्थायी हो सकता है, जब लोगों की राजनीतिक चेतना बढ़े। दिल्ली की चुनावी फिजां बता रही है कि राजनीतिक चेतना अगर जागृत हो, तो राजनीतिक दल भी बदलने को मजबूर हो जाते हैं। इस लिहाज से कहें, तो लोगों के असली राजा अन्ना हैं और दिल्ली में उन्हीं की धरोहर के बंटवारे की होड़ भाजपा और आप में लगी है। हालांकि सच यह भी है कि यह धरोहर किसी राजनीतिक दल के पास नहीं, बल्कि रालेगण सिद्धि में पड़े रहने वाले एक मनुष्य के चिंतन और जीवन में निहित है।
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-दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक एवं राजनीतिक विश्लेषक
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